संस्कृति

गौ माता - गौ-रक्षा व हमारा कत्र्तव्य

गौ माता
गौ-रक्षा व हमारा कत्र्तव्य
के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
गौ महिमा का वर्णन प्राचीन काल से ही विशेषकर भारतवर्ष में रहा है तथा विभिन्न साहित्य में विद्वानों की वाणी, ऋषि महर्षियों के अनुभवों में गोरक्षा के लिये संकल्प लिये गए हैं। भारतीय संविधान में भी गोरक्षा के सम्बन्ध में संकल्प लिया गया है। सभी व्यक्ति गोरक्षा के विषय में जानते भी हैं, विश्वास भी करते हैं, लेकिन उसके लिये अपेक्षित प्रयास नहीं करते। आधुनिक काल में भी महात्मा गाँधी व विनोबा भावे जैसे महात्माओं ने भी भारतवर्ष में गोहत्या बन्दी के लिये प्रयास किये। लगातार अन्य सन्त भी प्रयत्नरत हैं परन्तु पूर्णरूपेण भारतवर्ष में गोहत्या बंद नहीं हो सकी। यदि सभी गोभक्त इसी प्रकार अपने कत्र्तव्यपालन में लग जायें, तभी गोरक्षा सम्भव है। इसीलिये हम सभी को जागरूक रहने की आवश्यकता है तथा अपने कत्र्तव्यों का पालन भी जरूरी है।
सर्वप्रथम कत्र्तव्य गौ के महत्व को समझने का है और तभी हम अन्य लोगों को उसे समझा सकते हैं । ‘‘गावो विश्वस्य मातरः’’ वेदों का वाक्य है अर्थात् गाय सम्पूर्ण विश्व की माता है क्योंकि वह बिना किसी पक्षपात के सभी व्यक्तियों का पोषण करती है। उसके पोषण में किसी धर्म, राष्ट्र, समाज व सम्प्रदाय विशेष के लिये भेदभाव नहीं है। हिन्दू, मुसलमान, इसाई सभी गौमाता के कल्याण के पात्र हैं।
गोदुग्ध मातृदुग्ध जैसा होता है अतः गौ की सही उपयोगिता हम पूरे गोवंश की उपयोगिता से ही आँक सकते हैं। हजरत मोहम्मद पैगम्बर ने कहा है कि ‘‘तुम गाय का दूध पीने के पाबंद हो जाओगे। गाय के दूध में सभी वनस्पतियों का सत्व है। यह दवा है। गाय का घी बीमारी दूर करता है। उसके गोश्त से बचो चूँकि उसका गोश्त बीमारी है।’’। कुरान।
महात्मा गाँधी ने कहा था ‘‘मैं गाय को सम्पन्नता और सौभाग्य की जननी मानता हूँ।’’
अतः हमें गाय से प्राप्त होने वाले लाभों को समझना व समझाना चाहिये। गोधन की सुरक्षा व संवर्धन हमारा राष्ट्रीय कत्र्तव्य है। चूँकि गोवंश आज भी हमारी अर्थव्यवस्था का मूलाधार है, क्योंकि विभिन्न लाभों के अतिरिक्त हमारे पर्यावरण की भी रक्षा सुनिश्चित होती है।