संस्कृति

गौ माता पंचगव्य

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
आध्यात्मिक रूप से सभी पापों को समाप्त करने के लिए तथा भौतिक रूप से शरीर के दूषित पदार्थों को बाहर करने के लिये आयुर्वेद सम्मत धार्मिक कार्याें में प्रयोज्य एक सूत्र (formula) अत्यन्त लोकप्रिय है। जब भी सनातन धर्मियों का कोई धार्मिक व कर्मकाण्डीय आयोजन होता है, पुरोहित पंचगव्य का निर्माण करते हैं। आयोजन से पूर्व यजमान के सभी परिवारजनों को पंचगव्य पिलाया जाता है तथा घर में सर्वत्र छिड़का जाता है। इस पंचगव्य के विषय में शास्त्रों में कहा है-
यत्त्वस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पंचगव्यस्य दहग्निरिवेन्धनम्।
पंचगव्यपान करते समय पानक व्यक्ति इस श्लोक/मंत्र का उच्चारण करता है अर्थात् जो भी पाप अथवा दूषित तत्व मेरे शरीर में हों और चाहे वे मेरी हड्डियों के अन्दर तक घुस गए हों, वे भी इस प´चगव्य के पान करने से उसी प्रकार नष्ट हो जाए जैसे अग्नि सूखी लकडि़यों को जला देती है।
दूध (Cow Milk)
देवी देवताओं की पूजा में गाय का दूध ही प्रयोग में लाया जाता है। गोदुग्ध से बुद्धि की भी वृद्धि होती है।
एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा कि कौन सा दूध सर्वश्रेष्ठ है? बीरबल के द्वारा उत्तर में बकरी का दूध बताने पर अकबर ने कहा कि तुम हिन्दू तो गाय का दूध सर्वश्रेष्ठ बताते हो। तब बीरबल ने उत्तर दिया- जहाँपनाह! गाय का दूध तो अमृत है। उसकी दूध में गिनती करना बेवकूफी है। अर्थात् पूज्या गोमाता का दुग्ध अन्य पशुआंे के समान साधारण दूध नहीं है। गोदुग्ध की तो बड़ी अद्भुत विलक्षण महिमा है।
योगग्रन्थों में गोदुग्ध के विषय में कहा गया है कि छः माह तक श्रद्धाभक्ति पूर्वक नित्य पूज्या गोमाता की अपने हाथों से सेवा व उसका दुग्धपान करें तो समाधि सुगम हो जाती है, गोदुग्ध में ऐसे दिव्यगुण हैं।
कलयुग के प्रभाव से आज के मनुष्य गाय व उसके दुग्ध की ऐसी महिमा को भुलाकर भैंस/बकरी डिब्बे का दूध पी रहे हैं जो हमारे घोर अधरपतन का मार्ग है।
गोमाता के परम पवित्र अमृतसम गोदुग्ध पीने से अनेक रोग व शोक शान्त हो जाते हैं तथा लोक परलोग सुध: जाते हैं।