संस्कृति

गौ माता - भगवान शिव की गौवंश निष्ठा

गौ माता - भगवान शिव की गौवंश निष्ठा

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -

संसार को शिक्षा देने के लिये भगवान शिव ने एक लीला की रचना की। एक बार ब्रह्म तेज युक्त मुनियों ने भगवान शिव को घोर शाप दे दिया। शाप से मुक्त होने के लिए भगवान शंकर गौलोक पहुँचे और ऋषि स्वरूपा गौमाता की निम्न प्रकार स्तुति की-

या त्वं रसमयैर्भावैराप्याययसि भूतलम्।
देवानां च तथा संघान पितृणामपि वै गणान।।1।।

हे गौ! तुम रस एवं रसमय भावों से समस्त पृथिवी वासियों, देवता व पितरों को तृप्त करती हो।

सर्वैज्र्ञात्वा रसाभिज्ञैर्मधुरास्वाददायिनी।
त्वा विश्वमिदं सर्वं बलस्नेहसमन्वितम्।।2।।

रसों से जानकर विद्वानों ने बहुत विचार करके यही निर्णय किया कि सम्पूर्ण विश्व को तुमने ही बल और स्नेह का दान दिया है।
इस प्रकार नाना प्रकार से प्रार्थना करते हुए शंकर जी परिक्रमा करके सुरभि (गौ) की देह में प्रवेश कर गए और माता ने उन्हें अपने गर्भ में धारण कर लिया। उधर शिवजी की अनुपस्थिति में ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। तब देवों ने स्तुति करके शाप देने वाले ऋषियों को प्रसन्न किया और उनसे पता लगाकर गौलोक में पहुँचे। गौलोक में उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी सुरभि के बछड़े को देखा जो कि साक्षात शिवस्वरूप था। वह वहाँ की गायों के मध्य क्रीड़ारत था तथा अत्यन्त सुन्दर था। वह चारों पैरों वाले धर्म का स्वरूप था। ऋषियों ने बताया कि इस वृषभ के दर्शन पुण्यशाली हैं। उसकी पूजा से व ग्रास देने से जगत तृप्त होता है।

वृषस्त्वं भगवान देव यस्तुभ्यं कुरूते त्वघम्।
पदा स्पृष्टः स तु नरो नरकारिषु यातनाः।।

हे देव! तुम वृषरूपी भगवान हो। जो तुम्हारा अपमान करता है, वह बन्धनों में बँधता है और भूखा प्यासा रहता है।
इस प्रकार ऋषियों की स्तुति से वह शिवरूपी नील वृष प्रसन्न हो गया तथा वरदान दिया कि जो शिव के नाम पर वृष (सांड) को स्वतन्त्र विचारणार्थ छोड़ेगा, उससे समस्त देवता प्रसन्न होंगे। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वृषभ को अपना वाहन बनाया और अपनी ध्वजा पर भी उसको स्थान प्रदान किया। तबसे भगवान शिव का एक नाम वृषभध्वज पड़ा। विभिन्न पशुओं के मध्य रहने के कारण देवताओं ने उन्हें ‘‘पशुपति’’ नाम दिया।
भगवान राम की लीला में गौ का स्थान रावणदि असुरों के अत्याचार से आकुल पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर ब्रह्मादि देवों ने भगवान विष्णु को अपनी व्यथा सुनाई जिससे द्रवित होकर उन्होंने महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के घर अवतरित होने का आश्वासन दिया। उधर जब दशरथ जी की चैथी अवस्था प्रारम्भ हो गयी तथा कोई सन्तान नहीं हुई तब गुरू वशिष्ठ के परामर्श से ऋषि से यज्ञ कराया। कहा है -गावो यज्ञस्य हि फलं गोषु यज्ञः प्रतिष्ठताः। अर्थात गौओं से ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है और यज्ञ फल का कारण है। महाराज दशरथ ने इस यज्ञ के अवसर पर दस लाख गौ का दान किया। गवां शत सहस्त्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः। स्वयं अग्नि देव दिव्य गौ के दूध से बनी खीर को लेकर प्रकट हुए जिसे खाकर रानियाँ गर्भवती हुई और भाइयों सहित अवतरित हुए। इस अवतरण के उपलक्ष में पुनः महाराज दशरथ ने गौदान किया - हाटक धेनु बसन मनि नृप विप्रन्ह कहँ दीन्ह।
श्री रामदि भाइयों के विवाह के अवसर पर महाराज दशरथ ने चार लाख गौओं का दान किया। गवां शतसहस्त्रमाणिं चत्वारि पुरूषर्षभ। भगवान श्री राम ने वनगमन के समय गुरूजनों को हजारों गायोें का दान किया-तर्पयस्व महाबाहों गोसहस्त्रेण राघव। सूतश्रेष्ठ सचिव चित्ररथ को भी एक हजार गायों का दान किया। ब्रह्मचारियों को बारह सौ बैलों व एक हजार गायों का दान किया-

शालिवाहसहस्त्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा।
व्यंजनार्थं च सौभिन्ने गोसहस्त्रमुपाकुरू।।वा0रा0।

उस समय त्रिजट नामक एक दीन ब्राह्मण से भगवान श्री राम ने कहा कि हे विप्रवर! आप अपनी लाठी जितनी दूर फेंक सकें वहाँ तक कि सारी गायें आपकी हो जायेंगी। इस प्रकार हजारों गायें प्राप्त कर वह दीन ब्राह्मण प्रसन्न हो गए-गवामनीकं प्रतिगृहृय मादितः। श्रीराम ने मुख्यतः गौ रक्षा हेतु ही राक्षसी ताड़का का वध किया- गोब्राह्मण

हितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्।
गोब्राह्मण हितार्थाय देवस्य च हिताय च।
तव चैवाप्रमेयस्व वचनं कत्र्तुमुद्यतः।। व0 राव।।

रावण के सैनिक जिस देश में गाय आदि पवित्र प्राणियों को देखते थे वहाँ आग लगा देते हैं। जेहि-जेहि धेनु द्विज पावहिं , नगर गाऊँपुर आग लगावहिं। और भगवान ने तो गौरक्षा हेतु ही अवतार धारण किया था। विप्र धेनु सुर संत हित, मीन्ह मनुज अवतार।। मानस।।
भगवान श्रीराम की राजलीला का भी शुभारम्भ गौओं की भूमिका से होता है-

अक्षतं जातरूपं च गावः कन्याः सहद्विजाः।
नरा मोदकहस्ताश्च रामस्य पुरतो ययुः।।

वनवास से लौटने पर जब भगवान श्रीराम का स्वागत समारोह हुआ तो उस समूह में गायें सर्वप्रथम चल रहीं थीं। अपने राज्याभिषेक के अवसर पर भगवान श्रीराम ने एक लाख दुधारू गायें व एक सौ साँड दान में दान दिये थे-

सहस्यशतमश्वानां धेनूनां च गवां तथा।
ददौ शतवृषान पूर्वं द्विजेभ्यों मनुजर्षभः।।वा0 रा0।।

भगवान श्रीराम ने अनेक गोसव यज्ञ किये थे। एक गोसव यज्ञ की दक्षिणा दस हजार गायें हैं, तो इन अनेक गोसव यज्ञों में कितनी गायों का दान किया गया होगा कल्पनीय है। इसीलिए भगवान श्रीराम के राज्य में गौओं की कृपा बनी हुई थी- मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं। मानस।
आनन्द रामायण में कहा गया है कि श्रीराम प्रातः उठते ही कामधेनु का स्मरण किया करते थे तथा भगवती सीताजी नित्य कामधेनु की पूजा किया करती थी। इस प्रकार भगवान श्रीराम की लीलाओं के गौ सम्बन्धी अन्य अनेक प्रसंग भरे हुए हैं।