संस्कृति

गौ माता - महान विभूतियों का गोसम्बन्ध

भारतवर्ष महान विभूतियों की कर्मस्थली रहा है। उनमें से कुछ प्रसिद्ध महान आत्माओं को गोसेवा से ही पुरूषार्थों की प्राप्ति हुई थी। उनमें श्री राम व श्री कृष्ण महावतारों के विषय में पिछले अंकों में उल्लेख किया जा चुका है। कुछ का वर्णन संक्षिप्तरूपेण निम्नवत् हैं-
1. जबालापुत्र सत्यकाम को ब्रहमज्ञान की प्राप्ति पूर्वक शिक्षा- गुरूकुल में ब्रहमचर्य प्राप्त करने के लिए जाने पर तथा पिता का नाम व गोत्र न ब ता पाने पर महर्षि गौतम ने सत्यकाम को चार सौ दुर्बल गाऐं सौंपी और वन में चराने हेतु भेजा। कहा कि ‘‘जब इन गायांे की संख्या एक हजार हो जाय तभी वापस आना।’’ सत्यकाम गायों को लेकर वन में गया, कुटिया बनाकर रहने लगा व तन मन से गौओं की सेवा करने लगा। धीरे-धीरे जब गायों की संख्या एक हजार हो गई तब एक वृषभ (बैल), अग्नि, हंस व कुक्कुट रूपी देवों के माध्यम से उसे ब्रहमज्ञान हो गया। आचार्य गौतम ने उसे ब्रहमज्ञानी की उपाधि दी और पुनः सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ज्ञान कराया।
2. गोसंरक्षक सम्राट दिलीप का गोप्रेम- सन्तान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि वशिष्ठ से प्रार्थना करने पर उनके आदेशानुसार दोनों पति पत्नी ने गौ की पूजा प्रारम्भ की। सम्राट दिलीप नित्य नन्दिनी गौ को चराने ले जाया करते तथा वन में उसके रूकने पर रूकते, चलने पर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीने पर जल पीते। रघुवंश (कालिदास कृत) देखें-
स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः।
जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिनन्वगच्छत।।2/6।
रात्रि मंे उसे पुनः हरा चारा खिलाते उसकी सेवा करते और उसके सोने पर शयन करते। एक दिन वन मंे एक सिंह ने नन्दिनी पर आक्रमण कर कहा कि यह मेरा प्रकृतिक आहार है अतः मैं इसे नहीं छोड़ सकता। राजा ने कहा -
स त्वं मदीयेन शरीरवृत्ति देहेन निर्विर्तयितुं प्रसीद।
दिनावसानोत्सुक बालवत्सा विसृज्यतां धेनुरियं महर्षिः।। 2/45
कि हे सिंह! तुम मेरे शरीर से अपनी भूख मिटाओ। बछड़े वाले इस नन्दिनी गाय को छोड़ दो।
क्षतात् किल भयात इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दों भुवनेषु रूढः।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरूपक्रोश मलीमसैर्वा।।2/53
हे सिंह! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियों का कत्र्तव्य है कि वे क्षत (विनाश) से औरों की दक्ष से औरों की रक्षा करते हैं। निन्दामलिन राज्य व प्राणों को भी वे तुच्छ वस्तुओं के समान त्याग देते है। ऐसा कह कर राजर्षि दिलीप जो कि मर्यादापुरूषोत्तम भगवान राम के पूर्वज थे अपना शरीर मांसपिण्ड की तरह खाने के लिए डाल दिया। तभी उन पर आकाश से पुष्टिवृष्टि हुई और नन्दिनी ने कहा हे महापुरूष ! यह मेरी माया औरआपकी परीक्षा थी। तुम्हें सन्तान की प्राप्ति होगी। इस वरदान स्वरूप सम्राट दिलीप को रघु जैसे यशस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई जिसके नाम से उनके वंश का नाम ही रघुवंश या रघुकुल पड़ गया।
3. पाण्डुपुत्र सहदेव की गोचर्या- मत्स्यराज राजा विराट विशाल गोसम्पदा के लिये प्रसिद्ध थे। अज्ञातवास के समय पाण्डव वहाँ रहे। साक्षात्कार के समय पाण्डुपुत्र सहदेव ने पाण्डवों की गौओं के पालक के रूप में अपना परिचय दिया। गौओं की व्यवस्था पद्धति का जैसा विशद वर्णन सहदेव ने किया है उससे ज्ञात होता है कि गौ पालन के लिये एक अलग विभाग होता था। उनके पालक का नाम तन्तिपाल हुआ करता था। गायों की चिकित्सा आदि का उन्हंे सूक्ष्म ज्ञान था। ऐसे बैल की भी उन्हें पहचान थी जिसका मूत्र सूँघ लेने मात्र से बाँझ स्त्री भी गर्भ धारण करने योग्य हो सकती थी। ऋषभांश्चापि जानामि राजन पूजित लक्षणान।
येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते।। महाभारत 10/14