विज्ञान जगत

ग्रीष्म - ग्रसते रसान्

ग्रीष्म ऋतु
ग्रीष्म - ग्रसते रसान्
जो वनस्पतियों के तथा प्राणियों के रस का आहार करे अर्थात् उन्हे स्वयं में समा कर उनकी क्षति करे, उस ऋतु काल को ग्रीष्म कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु यह आदान काल की अंतिम ऋतु है। अंग्रेजी दिनदर्शिका के मई एवं जून का काल तथा हिंदू दिनदर्शिका के ज्येष्ठ एवं आषाढ़ मास का काल ग्रीष्म ऋतु का समझना चाहिए।
ग्रीष्म ऋतु में बाह्य वातावरण अत्यन्त उष्ण होता है। सूर्य की किरणें तीक्ष्ण अर्थात् बलवान होती हैं। बढ़ी हुई उष्णता के कारण नदियों का जलस्तर कम हो जाता है। वृक्ष, लताएँ आदि बढ़ी उष्णता एवं जल की कमी के कारण नष्ट हो जाते हैं। उत्तरोत्तर इस ऋतु में सभी प्राणियों का बल क्षीण हो जाता है।

जिस तरह सूरज की किरणें संसार के द्रव्यों तथा प्राणियों के जलीय सार भाग का अत्यधिक शोषण करती रहती हैं, उसी तरह शरीर में स्थित जलीय अंश (कफ धातु) का भी शोषण होता है, जिसके कारण शरीर की रूक्षता बढ़ती है और वात दोष का संचय होने लगता है। वातावरण की बढ़ी उष्णता के परिणाम से पित्त भी बलवान होकर, शरीर में वातपित्तात्मक लक्षण उत्पन्न होते हैं। इसलिए ग्रीष्म ऋतु में अम्ल, लवण, कटु रस-प्रधान पदार्थाें का सेवन छोड़ मधुर, शीतल, स्निग्ध पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
इस ऋतु मेें मनुष्य का बल स्वाभाविकतः कम होता है और पाचन शक्ति भी मध्यम स्वरूप की होती है, इसलिए मनुष्य को ऐसे आहार का सेवन करना चाहिए जो मधुर हो, लघु हो अर्थात् पचने में आसान हो, स्निग्ध हो, शीतल पेय द्रव्यों से युक्त हो जिससे शरीर में बढ़ी रूक्षता और उष्मा कम हो सके। यह आग्नेय काल होने केे कारण मद्ययपान नहीं करना चाहिए।