संस्कृति

चीनी सीमा की निगरानी करते एक बाबा - बाबा जसवंत सिंह

मनुज पांडे, देहरादून -
उत्तराखण्ड हमेशा से वीर जवानों की शौर्यता एवं वीरता की कहानियों से पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बनाये हुए है। हर युद्ध में यहां के वीरों की वीरगाथाओं से आने वाली पीढि़याँ रोमांचित होती रहती हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही वीर की वीरगाथा से रूबरू करा रहे हैं। यह कहानी है रायफल मैन जसवन्त सिंह रावत की। जिन्हें नूरानंग की लड़ाई में मरणोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। राइफल मैन जसवन्त सिंह नम्बर 4039009 गढ़वाल रायफल की चैथी बटालियन में नियुक्त थे। चीन के लगातार आक्रमणों के कारण 10 नवम्बर को इस बटालियन को मोर्चे पर भेजा गया। एक चीन मध्यम मशीनगन, जो कम्पनी लाईन के बहुत निकट स्थित थी, भारतीय सेना के लिए जबरदस्त भय पैदा कर रही थी। जसवन्त , लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और रायफल मैन गोपाल सिंह गुंसाई चीनी मध्यम मशीन गन के 12 मीटर निकट तक पहुँच गये और बंकरांे में ग्रेनेडों से आक्रमण किया। जिसमें कई चीनी सैनिक हताहत हुए। जसवन्त ने मध्यम मशीन गन पर आक्रमण किया और इसे लेकर भारतीय सीमा तक घिसटते हुए लाए, लेकिन उन्हें और त्रिलोक पर चीन की स्वचालित मशीनों से जान लेवा आघात लगा। जब वह सुरक्षा लाईन के निकट पहुँच गये थे, तो उस समय गोपाल गुंसाई घायल था, लेकिन मध्यम मशीनगन को भारतीय चैक पोस्ट तक लाने में सफल रहे। इस घटना ने इस युद्ध की दिशा को बदल दिया और चीनी सैनिक पीछे हटने लगे। तीन सौ मृत सैनिकों को पीछे छोड़कर जसवन्त सिंह को मरणोपरान्त ‘महावीर चक्र’ तथा त्रिलोक व गोपाल को ‘वीर चक्र’ प्रदत्त किया गया। जसवन्त सिंह रावत के साथ उस दौरान रहे बालावाला, देहरादून उत्तराखण्ड निवासी हयात सिंह बिष्ट इस घटना व इससे जुड़ी रोचक कहानी को बड़े विस्तार से बताते हैं। वे कहते हैं कि उस जगह पर एक लोकप्रिय और स्थानीय कहानी इस प्रकार कही जाती है -नवम्बर 1962 में चीन और भारत युद्ध का अन्तिम चरण था। चीनी सेना ने भारतीय सेना की कम्पनी को पीछे हटने के लिए कहा, लेकिन जसवन्त सिंह 10 हजार फीट की ऊँचाई में अपनी चैकी पर बने रहे और तीन दिन तक चीनी सैनिकों को पीछे हटाते रहे। इस दौरान दो स्थानीय मोनपा लड़कियों सेला और नूरा ने उनकी सहायता की। उन्होंने हथियारों को भिन्न-2 जगहों पर स्थापित किया और इस प्रकार गोलियों के अद्यतन वेग को बनाए रखा। इससे चीनी सेना ने समझा कि उन पर सेना आक्रमण कर रही है। अखिरकार चीनी सैनिकों ने उस आदमी को पकड़ लिया जो जसवन्त सिंह को रसद सामग्री दे रहा था और उस आदमी ने यह खुलासा किया कि केवल एक आदमी ही उनका सामना कर रहा है। चीनी सेना उस पर आक्रमण किया। ग्रेनेड फटने पर सेला नामक लड़की मर गई और नूरा को पकड़ लिया गया। जसवन्त जब अनुभव किया कि उसे पकड़ लिया जायेगा तो अपनी अन्तिम कारतूस से स्वयं को गोली मार ली और वीरगति को प्राप्त हो गये। यह आरोप लगाया जाता है कि चीनी सेना ने जसवन्त सिंह के सर को काट लिया और इसे चीन वापस ले गए। युद्ध विराम के बाद फिर भी चीनी कमांडर जसवंत की वीरता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जसवंत के सिर को पीतल की मूर्ति के साथ भारतीय सेना को वापस कर दिया। जसवन्त की यह प्रतिमा वीर भारतीय सिपाही को सम्मानित करने के लिए चीन में निर्मित हुई और अब इस युद्ध के क्षेत्र में स्थापित है। वह स्थान जहाँ पर उन्होंने युद्ध किया, उस स्थान का नाम जसवन्तगढ़ युद्ध स्मारक, जसवन्तगढ़, अरूणाचल प्रदेश में पड़ा और उस स्थान पर एक छोटा मंदिर उनके और उनके कई सहयोगियों के व्यक्तिगत प्रभावों के साथ विद्यमान है। संगमरमर की शिला में उनकी और उनकी बटालियन के एक सौ इकसठ वीरों के जो नूरानंग के युद्ध में शहीद हुए, की यशोगाथा का वर्णन अंकित है। अपनी मृत्यु के चालीस साल बाद भी भारतीय सेना का यह रायफलमैन नियम पूर्वक समयावधि मेें गैर सरकारी प्रोन्नति पाकर मेजर जनरल के पद पर प्रोन्नत हुआ और अभी भी यह विश्वास किया जाता है कि भारतीय पूर्वी सीमा पर चीन के साथ लगी दुर्गम ऊँचाई पर स्थित भारतीय सेना की टुकड़ी का निर्देशन करता है। सेना के जवानों द्वारा जसवन्त सिंह को बाबा व संत का स्थान दिया गया है। इस मार्ग से जाने वाले भारतीय सेना के अधिकारी मंदिर में जाकर बाबा को अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। भले ही उनका कोई भी पद क्यों न हो। बाबा जसवन्त सिंह के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो कि वह अभी जीवित हों। यह भी विश्वास किया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति जसवन्त को आदर देना भूल जाता है तो मंदिर के पास से जाने पर वह दुर्भाग्य से घिर जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एक मेजर जनरल जब इस मार्ग से जा रहे थे तो उन्होंने इस मंदिर में श्रद्धांजलि नहीं दी क्योंकि उनका मानना था कि यह महज एक अंधविश्वास है और कुछ नहीं। इस घटना के बाद यहाँ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उनका एक रहस्यमय सड़क हादसा हुआ और वह मर गए। आज गढ़वाल रायफल के यूनिट के एक दर्जन कर्मचारी बाबा जसवन्त सिंह रावत के मंदिर की देखरेख करते हैं। यह कहानी भारतीय वीरों की शहादत की वह कहानी है जिसे हर भारतीय को सुनाया जाना चाहिए और बताना चाहिए कि विकट मौसम की परिस्थितियों व उपकरणों की प्रतिकूलता के बावजूद कैसे ये भारतीय सैनिक लड़े और हमारे जीवन को बचाया।