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चैराहे का बुद्धिजीवी भाग 1

चैराहे का बुद्धिजीवी
बसन्त लाल वर्मा, हल्द्वानी-
‘‘कुछ कीजिए साहब’’ उनमें से एक ने गर्दन झटकते कहा।
‘‘क्या करूँ?’’ इंसपैक्टर ठहाका लगाकर हँसते हुए बोला ‘‘कमाल है। एक अदने से आदमी से डर गए। खैर, आप रपट दर्ज कीजिए।’’
‘‘रपट-वपट क्या करना है साहब’’ उनमें से एक इज्जतदार आदमी अपने दोनों हाथों की हथेली को मलते हुए, खुशामदी हँसी की फुलझड़ी सी छोड़ते हुए बोला, ‘‘थाने में बुलाकर उसे जरा डाँट-डपट और दो-चार हंटर-वंटर लगाकर सख्त हिदायत दे दीजिए तो हमेशा के लिए बदतमीजी करना भूल जाएगा।’’
इंसपैक्टर ने अपने दाएँ हाथ की तीन अँगुलियों में डन्डा घुमाते हुए कहा,‘‘किस गुनाह पर पकडँू? बदतमीजी का कोई सबूत? पागल होने का कोई सबूत? आप बताइए कि क्या करता है? कोई तोड़-फोड़? कोई दंगा फसाद?’’ या कोई चोरी-डकैती? मार-पीट? कोई हथियार? चरस? शराब? या किसी गिरोह का है?“
शिकायत करने वालों को लगा कि इंसपैक्टर का मूड ठीक नहीं है। उनके सामने समस्या यह आ गई कि अब कौन सा हथकंडा अपनाया जाय जिससे इंसपैक्टर उनकी मन की कर दे। लेने-देने की बात करने की यकायक किसी में हिम्मत भी नहीं हो रही थी। अगर बात भी करे तो कौन करें? फिर, पैसा देगा तो, देगा कौन? साफ है कि जो शख्स ऐसी बात करेगा, वही अपनी जेब हल्की करेगा। ये बात पहले से तो तय थी नहीं तो फिर ऐन मौके पर बिल्ली के गले में घन्टी बाँधेगा कौन? लिहाजा किसी ने भी इस बात का जिक्र करना मुनासिब नहीं समझा।
वे सोचने लगे कि इंसपैक्टर को अपनी बात मनवाने के लिए कैसे कहा जाय? इंसपैक्टर की सहानुभूति पाने की नीयत से उन्होंने एक बार फिर कोशिश करके कहा, ”इंसपैक्टर साहब, हमारे कहने का मतलब यह है कि हम लोगों को निशाना बनाकर, वह बीच चैराहे में ताने-मारकर अनाप-सनाप बकता है। उससे कहें तो, क्या कहें? डर तो उसे किसी का है नहीं। बिल्कुल आजाद हो गया है। शायद, आप भी उसकी हरकतों से वाकिफ होंगे?“
इंसपैक्टर ने उन लोगों की नब्ज टटोलते पूछा, ”अच्छा ये बताइए कि क्या ताने मारता है? कभी नाम लिया है उसने आप में से किसी का? या आपके परिवार में किसी का? माँ-बहिन की गाली देता है आपको? सुना तो मैंने भी है उसे कई बार पर ऐसा लगा नहीं कि पकड़ कर बन्द कर दूँ थाने में उसे।“
”जी, सीधे नाम लेकर तो कुछ नहीं बकता, लेकिन इशारा तो हमारी ही ओर होता है“ संभलते हुए एक ने अपनी सफाई देते कहा।
”कमाल है“ इंसपैक्टर ने उन्हें आगाह करते कहा,”चेयरमैन के लिए कहता है। है ना? तो चेयरमैन तो कोई भी हो सकता है। म्युनिस्पल बोर्ड का, जिला परिषद् का, टाउन एरिया का, किसी कारपोरेशन या कमेटी का, किसी संस्था का या बैंक का। हो सकता है या नहीं?बताइए? लेकिन वह न तो किसी आफिस का नाम लेता है और न आफिसर का और न ही किसी आदमी का। क्यों? ठीक कह रहा हूँ या नहीं?“ इंसपैक्टर ने सवालों की फुलझड़ी जलाते कहा, ”सुनिए, वो भ्रष्टाचार की बात कहता है। नेताओं की बात कहता है। काले धन्धों और घोटालों की बात कहता है।इसी किस्म की बातें ही तो करता है। बताइए, क्या गलत कहता है?“
”जी आप ठीक कह रहे हैं।“ एक ने दबी आवाज में कहा, ”पर...................“
”पर-वर कुछ नहीं “ इंसपैक्टर ने उसे टोकते हुए कहा, ”किसी व्यक्ति का, जगह या डिपार्टमैन्ट का नाम-वाम लेता है तो बताइए?“
”जी नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है“ खिसियाते हुए एक ने इंसपैक्टर को फिर से अपनी गिरफ्त में लाने की कोशिश करते, पटाते हुए कहा, ”साहब, आप जरा हमारी बात को समझने की कोशिश तो कीजिए, दरअसल................“
”सुनिए, आप मेरी बात समझिए,“ इंसपैक्टर ने आँखें तरेर कर उसकी बात काटते हुए कहा, ”वो जो कुछ कहता है, उसकी कुछ बातों को तो हमारे अफसर भी, हमें समझाते हैं। नेता कहते हैं। अखबार वाले लिखते हैं। आज तो लोग बाकायदा नारे लगाकर जुलुस निकालते हैं। आप मानते हैं इस बात को?“ इंसपैक्टर ने जबर्दस्त तर्क दिया।
”जी हाँ“
”अच्छा ये बताइए, वो जो कुछ कहता है, जिसे लोग कह रहे हैं कि बकता है तो क्या आप लोगों को लगता है कि उसकी बातें आप पर लागू होती हैं?“
”जी नहीं, ये बात तो नहीं है“
”तो फिर उसे देखकर, उसकी बातें सुनकर, आप लोगों को मिर्च क्यों लग रही है? क्यों आप लोग तिलमिला रहे हैं?“ इंसपैक्टर ने उन्हें फटकारते हुए कहा, ”जाइए, अपना काम कीजिए। आप शरीफ लोग हैं, शरीफों की तरह रहिए। इस तरह अब से दोबारा आने की जुर्रत न करें।“