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चैराहे का बुद्धिजीवी भाग 2

चैराहे का बुद्धिजीवी
बसन्त लाल वर्मा, हल्द्वानी -
सचिव की नजर में नजर डाल कर वह तैश में बोला, ‘‘इंतजाम? खाक इंतजाम किया है? मंच से फिल्मी धुन बज रही है। एक-दो बेनर लगे हैं। दो चार पोस्टर चिपके हैं। इसी के लिए आपको पैसा दिया गया है क्या? क्या दकियानूसी किस्म के आदमी हो।’’ उसने सचिव को झिड़कते पूछा,‘‘कुछ देर बाद विरोधी पार्टी की मीटिंग होने वाली है। उस वक्त क्या करोगे? बोलो? इस फिल्मी धुन पर डान्स करोगे क्या?’’
उसकी बातें सुनकर सचिव ग्लानि से मर गया। उसे अपनी मिट्टी पलीत होते नजर आने लगी। उसकी हथेली पसीने से गीली हो गयी। वह घबराने लगा। जब उसे कुछ न सूझा तो गिड़गिड़ा कर बोला, ‘‘अब क्या होगा, सर?’’
‘‘जूते खाओ। और क्या होगा?’’
‘‘ऐसा न कहिए सर। कुछ सोचिए, कुछ कीजिए।’’
‘‘क्या करूँ?’’
‘‘कुछ भी। वरना गजब हो जाएगा।’’ सचिव की सूरत रोनी जैसी हो गई थी।
कुछ देर पहले सचिव सीना-तर कर अकड़ से बोल रहा था, लेकिन अब उसके चेहरे में हवाइयाँ उड़ रहीं थीं।
वह मुख पर फीकी मुस्कान पोतता, हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाता बोला, ‘‘सर, आप ही अब कुछ कीजिए। वर्ना मेरा तो कैरियर ही चैपट हो जाएगा। धन्य मेरे भाग जो इस घड़ी में आप मुझे मिल गए।’’
‘‘लेकिन मुझे तो कहीं और जाना है। उसने सचिव की नब्ज टटोलते कहा।
‘‘वहाँ का प्रोग्राम कैंसिल कीजिए, सर। पहले यहाँ की झोंक सम्भाल दीजिए, वहाँ फिर देखा जाएगा’’ सचिव को लगा जैसे उसने कटी पतंग की डोर पकड़ ली है।
सचिव के मायूस चेहरे को देखकर उसे मजा आ गया। वह अपनी हँसी को रबड़ी की तरह निगल गया लेकिन चिड़चिड़ाहट की डकार निकालते बोला,‘‘आपको तो पका-पकाया खाना चाहिए, वो भी चटपटा। खैर, कोई बात नहीं है। आज के प्रोग्राम के लिए कितने पैसे का जुगाड़ हुआ?’’
‘‘बीस हजार का’’
‘‘नेताजी ने कितने दिए?’’
‘‘दस हजार’’
‘‘बकाया कहाँ से इंतजाम किया?’’
‘‘कुछ चन्दा किया और कुछ पार्टी से लिया’’
‘‘शाबाश। ऐसे मामले में तुम तो छुरी की तरह तेज लगते हो। अभी तक कितना खर्च किया है?’’
‘‘दस हजार’’
‘‘बकाया कहाँ है?’’
‘‘मेरे पास’’
‘‘मेरे पास’’
‘‘इन्हें रखे रखो। अब एक धेला भी खर्च मत करना। नेताजी आएँ तो पाँच हजार और माँग लेना। समझे?’’ उसने सचिव को आश्वस्त करते हुए उसके दिमाग में जंग सा लगा दिया ताकि वह उसकी बातों को तर्क-वितर्क करके काट न सके।