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जंगल में बुराँस की तरह

रहूंगी नदी में जल, जंगल में बुराँस की तरह
गीता गैरोला, देहरादून
कितने लोग है यहाँ अस्पताल में, नीली आँखों वाली लड़की को कीमो चढ़ाते देख आँखें भर आई। नई शादीसुदा लगती है। सिरहाने बैठा पति लगाव से उसका सर सहला रहा था। अभी तो जीना शुरू ही किया है इसने और कैंसर जैसा घातक रोग। क्या उसका पति हमेशा ऐसे ही लगाव से गंजे सिर को भी सहला पायेगा? ये तो सिलसिला है रोग का।
छोटी उम्र की गरीब सी माँ अपनी 18-19 वर्ष की कमजोर, चमकीली आँखों वाली बिना बालों के सिर ढकने की नाकाम कोशिश करती बेटी को ले कर रजिस्ट्रेशन की लाइन में खड़ी है। बेटी कैसी तो निरीह, कातर आँखों से हमें देख रही है। कहाँ से करवाती होगी ये माँ अपनी बेटी का इतना मंहगा इलाज। मेरा हाथ अपने पर्स में रखी रुपयों की गड्डी को तलाशने लगा। मन इन दोनों लड़कियों के लिए दुआ करने लगा।
क्या कैंसर जैसा घातक रोग बहुत फैल गया है। पर क्यों?
दो छोटे गंजे बच्चों को खेलते देख मैं मुस्कराने लगती हूँ। सारे दुनिया जहान के षडयंत्रों से दूर एक-दुसरे की चाँद को छू-छू के दौड़ रहे थे।
ये कौन सी दुनिया है, एक आम दुनिया से दूर। उस दुनिया से जिसे हम जीते हैं, जिंदगी समझते हैं। जहाँ प्यार है नफरत है। नजदीकियां हैं दूरियां हैं , षडयंत्र हैं, राजनीति है, धर्म नीति है। रीतिरिवाज हैं, त्यौहार हैं और उनका ग्लैमर है। दर्द है, पीड़ाएँ हैं, हंसी है और आंसू भी हैं। गरीबी है, अमीरी है, गर्व है, अहम् हैं, और है जीने की उठापटक।
और एक ये दुनिया है जहाँ हर कोने में डोलते मौत के साये हैं, रोग से झींकती कराहती आशाएं हैं, निराशाएं हैं। दवाइयों की बदबू है। अस्पताल में काम करते कर्मचारियों की ऊब से उपजी उपेक्षायें हैं। रोगियों से मिलने आने वालों की लाचार निगाहें हैं, रोगियों के घरवालों की थकान है। गरीबों की मुफलिसी है, अमीरों की फलों से लदे लिफाफों की गर्वीली खसर-फसर है। नर्सों, डाॅक्टरों के संवेदनहीन चेहरे हैं।
मै वाक...वाक उल्टियाँ करती एक महिला को पानी की बोतल पकडाती हूँ और बांह से कुर्ते की आस्तीन को ऊपर कर कीमो लगाने के लिये कैनूला लगवाने लगती । नसों में चढ़ती दवाई की गंदी सी बदबू मेरे दिल दिमाग को जकड़ लेती है। मंै दाहिने हाथ को दिल पे रखती हूँ और आमिर खान के स्टाइल में मन ही मन दोहराती हूँ- ‘आल इज वेल’। मुझे उल्टी नहीं आ रही, आल इज वैल, मुझे उल्टी नहीं आ रही।
पूरा माहौल दवाई की गंध और मौसम की चिपचिपाहट से बोझिल है। मैं कब घर जाउंगी दिल के कोने से आहट आती है। आँखंे सलाइन पर अटकी हैं जिसमंे ललाई लिए गाढ़ा चिपचिपा तरल बूँद-बूँद नसों में घुलता जा रहा है। मेरा सिर जैसे किसी ने लोहे के शिकंजे में जकड़ लिया है। आँखें मुंदने को हंै। सुना है कैंसर की दवाई कोबरा के जहर से बनाई जाती है। अच्छा तो जो बूँद एक जगह मौत है, दूसरी तरफ जिंदगी होती है।
छह कीमो में कितना जहर चला जायेगा मेरे अंदर। मुझे विष कन्याएं याद आ गयी। ओह मैं एक जहर को मारने के लिये दूसरा जहर पी रही हूँ। अचानक मुझे शगल सूझने लगा। अधमुंदी आँखों से देखती हूँ- रजनी और सुनीता कुर्सी पर बैठी पावर नैप ले रही हैं। उनकी नींद में खलल डालते हुए जोर से कहती हूँ, ‘‘देखो अब मुझसे लड़ाई-झगड़े में जरा बच के रहना। कोबरा का जहर पी रही हूँ कीमो में, नोच लिया तो खैर नहीं। दोनों जोर से हंसती हैं।
हम तीनो की नींद रफूचक्कर हो जाती है। दवाई की तीखी बदबू मेरे नाक-मुंह में घुली जा रही है। कीमो खत्म होने के बाद मै अपने डगमगाते पैरांे को स्थिर करती बेड से नीचे उतरती हुई चप्पल पहनती हूँ और खुद को सामान्य दिखाती दरवाजे की तरफ बढ़ती हूँ। रजनी और सुनीता मेरा हाथ पकड़ने आगे बढ़ते हैं, पूरे विश्वास से उनकी तरफ देखती रोज की तरह लंबे डग भरती, अस्पताल के कारी डोर में चलने लगती हूँ।
मुझे घिसटना नहीं है। सांसों को गिनना मेरे लिए नहीं है, ये सजा मै खुद को नहीं भुगतने दूंगी। एक शानदार,जानदार अपनी पसन्द की जिंदगी जीने के बाद अब मुझे ताकत से जीना होगा। सारे अन्तद्र्वन्दों के बाद खुद को पछाड़ा कम से कम मुझे मौत का खौफ नहीं है। एक निडर, बहादुर औरत हूँ और ऐसे ही जिऊंगी।
मेरी जिंदगी का भी आकार है और जिंदगी के बाद भी मुझे आकार लेना है। मुझे जीना ही है दूसरों के साथ। और मैंने फैसला किया कि घर जाते ही आँख दान किये जाने वाला सार्टिफिकेट ढूँढूँगी। अगली बार अपना पूरा शरीर अस्पताल को देने वाला फार्म भरना भी बाकी है। सड़ा भी होगा तो क्या मेडिकल के स्टूडेंट बीमारी ही ढूँढ लेंगे।

हूँ। क्या मैं डर रही हूँ, मन में ये बात सोचते ही सुनीता से कल आये एक घरलू हिंसा के मुद्दे पर बात करने लगती हूँ।
मैं, रजनी और बबली (संध्या) डा, के केबिन के बाहर बाकी ढेर सारे मरीजों के साथ अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं। आज कीमो है और डाॅ, से दवाई लिखवानी है। मैं एक नजर सारे मरीजांे और उनके साथ आये लोगों पर फिराती हूँ। कुछ कमजोर, कुछ स्वस्थ से गंजे सिरांे को देख कर गिनती करती हूँ। कुल 26 मरीज बैठे हैं जिनमंे 19 औरतें है। वास्तव में ये गिनती अनजाने में ही हो जाती है। रजनी को यही बात बताती हूँ, देखो कैंसर के मरीजों में औरतों की संख्या जादा है। मैं तय करती हूँ कि ये जानना बहुत जरूरी है कि इन औरतों को किस तरह का कैंसर है।
हम दोनों मुस्कराते हुए एक उदास मुरझाई सी महिला के पास जाती हैं।
कहाँ से आयी हैं आप। महिला अपने सिर पर बंधे स्कार्फ को ठीक करते हुए हमें ऐसे देखती है जैसे हमसे बात करने में उसे कोई रुचि न हो। अनमने ढंग से मेरे गंजे नंगे सिर को देखते बोली, ‘‘औरतों का गंजा सर अच्छा ना लगता, कपडा बांधा करो।’’ मै फिर बोली, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’ ‘‘जसपुर से और तुम।’’ रजनी ने बताया, ‘‘हम देहरादून में रहते हैं।’’
उस महिला को यूट्रस का कैंसर है। आठ कीमो करवा चुकी है। अब डा. रेडियो थैरेपी करने की बात कह रहे हैं। अपनी बीमारी से बेजार है। पैसा बहुत खर्च हो गया है। तभी उनके पति कहते हैं, ‘‘जी हम तो बड़े परेशान हो गए। अब बस थोड़े दिन और देखते हैं।’’ अपनी बारी आने तक हम अधिकांश ओरतों से बात कर चुके थे। ये सब बच्चेदानी, ओवरी, ब्रेस्ट, लीवर कैंसर से पीड़ित हैं। सोचती हूँ अरे यहाँ भी जबरदस्त जेंडर गैप दिखाई दे रहा है।
हम तीनों तय करते हैं कि हमें सर्वे करना चाहिए पिछले तीन वर्षों में इस अस्पताल में कितने पुरुष और कितनी महिलायंे इलाज करवाने आई। उन्होंने किस तरह के कैंसर का इलाज करवाया।
औरतों की संख्या ज्यादा देख के मन में सवाल आता है वो कौन सी व्यवस्थाएं हैं जो जीवन की धुरी कहने के बावजूद औरतों के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हैं।
तभी मेरी बारी आ गयी।
मैंने पूछा, ‘‘डाॅ, लोग पूछते हैं कि मेरा कैंसर कौन सी स्टेज में है।’’ लिखना छोड़ डाॅ, ने मुझे सर से पैरों तक देखा और बोले, ‘‘अरे गीता जी- लोग सोचते हैं, अरे मरीज अभी यहीं घूम रही है, ऊपर नहीं गयी। अरे आप बिंदास कहिये मेरे कैंसर की कोई स्टेज नहीं है।’’ हम तीनों दवाई लिखवा कर हंसते हुए केबिन से बाहर निकल आये।
डे केयर में कीमो करवाते मरीजों को देख दिमाग फिर गिनती करने लगा। बीस बेड लगे हैं, सब भरे हुए। मुझ सहित 13 औरतें और 7 पुरुषों को कीमो चढ़ रही है।
ओ यहाँ पर भी औरतों की भरमार है। क्यों? कहीं कुछ तो गड़बड़ है। अधिकतर रोग के दर्द से उकताए चेहरे। अपने सामने वाले बैड पर अधलेटी औरत को देख कर बहुत अच्छा लगा। सलीके से कानों के नीचे तक लाल काली धारियों वाले स्कार्फ से सर बंधा है। आँखों के ऊपर खल्वाट भौं को काजल की पेन्सिल से खूबसूरत कर्व दिया है। पलक विहीन आँखों में खूब काला काजल आंजा है। हल्की गुलाबी लिपस्टिक लगे होंठ मुझे देख के मुस्करा रहे हैं। मैंने जोर से हाथ हिलाया- ‘‘हाय कैसी हैं?’’ बिंदास बोली, ‘‘मस्त चल रहा है।’’ और मैंने उसकी बात रट ली। बस मुझे जिंदगी का सूत्र मिल गया।
मै रजनी और संध्या से कहती हूँ, शाम को घर जाने से पहले हम पता करेंगे कि कैंसर के मरीजांे के साथ हम क्या और कैसे काम कर सकते हैं। रजनी आई,टी,बी,पी, में असिस्टेंट कमाण्डेंट की पोस्ट से रिटायर हुई हैं। मैं रजनी से कहती हूँ रजनी हम प.ज.इ.च. के कमांडेंट से कह कर यहाँ बैंड का कोई प्रोग्राम मरीजों के लिए करवा सकते हैं । हम तीनों ही तय करते हैं कि मेरी कीमो पूरी हो जाने के बाद हम अस्पताल मैनेजमेंट से मिल कर बात करेंगे।