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जड़ों की ओर लौटना

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
पिथौरागढ़ के सीमावर्ती जिले के जोहार घाटी के आदिवासी समुदायों द्वारा लोकप्रिय ‘ग्रीष्म महोत्सव‘ या गर्मियों का त्योहार के रूप में माना जाने वाला एक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव 29 मई को मुनस्यारी में शुरू हुआ जो 15 जून तक चलेगा। इसी क्षेत्र से आने वाले एक उल्लेखनीय शिक्षाविद् एवं इतिहासकार डा0 एस.एस. पांगती कहते हैं, ”जोहार क्षेत्र तिब्बत में कैलाश पर्वत के दक्षिण-पश्चिम दिशा पर स्थित है। इस छोटे से भू-भाग में निवास करने वाले लोगों को जोहारी अथवा शौका के रूप में जाना जाता है।” सन 1962 में चीनी आक्रमण होने के बाद से जोहारीयों का तिब्बत में मुख्य व्यवसाय - व्यापार जब बंद हो गया, तब सरकार ने सन 1967 में जोहारीयों को विकास पथ पर शैक्षिक और आर्थिक लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्रदान कर दिया था।
जोहारीयों का नाम देश के उन कुछ जनजातियों में आता हैं जिन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी है। ‘ग्रीष्म‘ महोत्सव का आयोजन करना सिर्फ एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान को बनाए रखना ही नहीं है, अपितु युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने और आने वाली पीढ़ी के लिए शौका की एक समृद्ध विरासत को समझने हेतु दिशा देने का एक अभिनव प्रयास है। साथ-साथ इसका आयोजन उनके जीवन से जुडी तिब्बती व्यापार के समय की संघर्ष-गाथा तथा चीनी आक्रमण के बाद से सामाजिक-आर्थिक उथलपुथल और विस्थापन के दिनों की स्थिति का बखान करना भी है। सन 1962 में भारत-तिब्बत व्यापार के बंद होने तथा विकट परिस्थितियों से उनका जीवन टूट के बिखर सा गया। इसी क्षेत्र के एक दूरदर्शी, लेखक एवं महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू राम सिंह ने पूर्व में ही तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार की समाप्ति परिकल्पित कर, जोहार के लोगों को ऐसी स्थिति से पहले कार्यप्रणाली में विविधता लाने के लिए सचेत कर दिया था।
एक प्रख्यात इतिहासकार और उत्तराखंड राज्य के पूर्व मुख्य सचिव डा0 आर.एस. टोलिया ने दूरस्थ, जंगली, बीहड़ इलाके और अप्रत्याशित मौसम की स्थिति होने के बावजूद अपने जड़ों की ओर लौटकर तथा मुनस्यारी में बसकर दर्शनीय प्रतीक प्रस्तुत किया है। वह कहते हैं, ”जोहार के युवाओं को अपनी जड़ों के प्रति आकर्षित करने के लिए यह आवश्यक है कि जोहार वासियों के हर पहलू से संबंधित एक अच्छी प्रलेखित इतिहास को बनाया जाए। यह भी प्रसन्नता की बात है की जोहरी संस्कृति और समाज के बारे में जानकारी का प्रसार करने के लिए ‘महोत्सव‘ में कार्यशालाओं और व्याख्यानों का आयोजन किया गया।”
सदियों से जोहारी व्यापारियों ने पश्चिमी तिब्बत में स्थित विभिन्न तिब्बती बाजार जैसे ज्ञानिमा, दार्चिन, छाकरा एवं गरहतोक के पड़ाव पर आने वाले तिब्बती पठार तक पहुँचने के लिए एक ही दिन में ऊंटाधुरा (5377 मीटर), कुंगरी बीनगरी (5123 मीटर) और जयंती (5407 मीटर) जैसे उच्च पहाड़ी दर्रों को पार किया। वे ऊनी कपड़ा, अनाज, मसाले, घी और चीनी के बदले में तिब्बत से घोड़े, पशु, बोरेक्स, नमक, ऊन एवं सोने का व्यापार करते थे। जोहारी व्यापारियों ने पूर्व में तिब्बती सामानो का व्यापार लाहौर, अमृतसर और कोलकाता, आदि तक भी किया करते थे। यही वह व्यापारी थे जिन्होंने मोटर सड़कों की कमी के कारण दुनिया से अछूत रहने वाले कुमाऊं के लोगों को कांग्रेस और गांधी जी की गतिविधियों के बारे में अवगत कराया था। लेकिन अदम्य साहस दिखाने के बावजूद उन्हें उसके लायक मान्यता नहीं दी। कम आबादी वाले जोहार घाटी में 1920 के दशक में 27 स्वतंत्रता सेनानियों एवं सन 1942 में 45 स्वतंत्रता सेनानियों ने भाग लिया। अन्य क्षेत्रों में भी इस क्षेत्र ने रोल माडल के रूप में अंतरराष्ट्रीय खोजकर्ता नैन सिंह और किशन सिंह, एवेरेस्ट पर्वतारोही हरीश रावत, लवराज सिंह धर्मसत्तू, हुकुम सिंह पांगती एवं सविता मर्तोलिया जैसे महानुभाव पैदा किये।
कार्यक्रम समन्वयक नरेंद्र सिंह पांगती ने कहा, ”युवाओं को उत्साहित करने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है, जिसमे देश के विभिन्न भागों की आदिवासी टीमें भाग ले रही हैं। प्रतियोगिता त्रिस्तरीय है जो पुरुषों, चैदह से नीचे लड़कियों और लड़कों के लिए खुला है। कार्यक्रम को अविस्मरणीय बनाने के लिए 5 जून को विभिन्न गांवों की महिलाओं द्वारा ‘गेल पातल‘ योजना के अंतर्गत चार दुराग्राही क्षेत्रों में पेड़ लगाए गये। स्थानीय भाषा में ‘गेल पातल‘ का अर्थ, एक जीवंत जंगल है जिसका मिशन हरा और स्वच्छ जोहार बनाना है। वृक्षारोपण कार्यक्रम में देशी प्रजातियों को बढ़ावा दिया गया और घास को मिट्टी बाँधने एवं कटाव को रोकने के लिए फैलाया गया। समन्वित रूप से गांव की महिलाओं ने जोहार की समृद्ध विरासत पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया।” इसके साथ जोहार-मुनस्यारी डाक्टरस एसोसिएशन ने फोर्टिस,दिल्ली और बृज लाल अस्पताल,हल्द्वानी से आये डाक्टरों की टीम की मदद से निः शुल्क चिकित्सा शिविरों का मुनस्यारी, दरकोट, नमजला तथा चोरी बाजार में आयोजन किया। डाक्टरों की टीम में नेत्र विशेषज्ञ, हृदय रोग विशेषज्ञ, न्यूरो सर्जन, दंत शल्य चिकित्सक, चिकित्सकों, प्लास्टिक सर्जन, बाल चिकित्सा और स्त्रीरोग विशेषज्ञ शामिल थे। पशु चिकित्सकों के दल ने ग्रामीण क्षेत्रों का गहन सर्वेक्षण के साथ पशुओं का इलाज कर ग्रामीणों को नए उद्यम शुरू करने के लिए भी प्रेरित किया। ग्रीष्म महोत्सव में आये आगंतुकों राजा साह और चंद्रेख बिष्ट ने आयोजकों का एक अनोखे और अभिनव प्रयास करने पर प्रशंसा की।