दिशा तथा दशा

जनता कहिंन...निराशा में आशा की किरण है..चुनाव...

-संजय नागपाल नैनीताल...
लोकतांत्रिक तरीको से GST के विरोध में देश के बहुत से व्यापारिक ट्रेड यूनियनों ने अपना जबरदस्त विरोध दर्ज करवाया परंतु केंद्र सरकार के कान में जूँ नही रेंगी..अब आ गए गुजरात व अन्य राज्यों में चुनाव..एन.डी.ए सरकार में प्रभुत्व शाली व प्रमुख नेता अरुण जेटली को आखिर इन जन समस्याओं की याद आ गई..और ले.. घोषणाओं की झड़ी..कि 2 लाख तक सोने की खरीद पर पैन कार्ड की आवश्यक नही..समाधान योजना में अभी तक 75 लाख से कम का व्यापार करने वालों पर तीन माह में रिटर्न दाखिल करने के आदेश को बढ़ा कर उक्त रकम एक करोड़ कर दी गई..अन्यथा एक व्यापारी को एक साल में 37 रिटर्न दाखिल करने का शासनादेश कर दिया गया था..मतलब ये कि देश के सभी व्यापारियों को बिन मांगे राहत का ऐलान कर दिया गया..जबकि राहत की माँग करने पर देशवासियों को ठेंगा ही दिखाया गया..शुक्र है.. लोकतंत्र में जनता का मुहँ देखने का डर इन नेताओं को सताने लगता है..और फिर शुरू हो जाती हैं..घोषणाओं की झड़ी...
कुलमिलाकर सरकार में कोई भी राजनीतिक दल सत्तासीन रहे..कार्यशैली बिल्कुल एक सी ही रहती है..हालांकि पिछली सरकारों को लोकतांत्रिक ढाँचे के अंतर्गत हिलाना आसान था..धरने व प्रदर्शनों की गूंज सरकारों के कान में जरूर पड़ जाती थी..किन्तु ये पूर्ण बहुमत की सरकार तो ज्यादा बेलगाम हो गई है..केवल मनमानी पर ही उतारू हो गई है..जैसे ही गुजरात चुनावों की घोषणा अमित शाह ने की..तभी उन्हें समाज के एक बड़े तबके की नाराजगी की सूचना उन्हें मिली..और तभी से शुरू हो गया..जनता को रिझाने के तरीके..यहाँ यह कहना बिल्कुल अनुचित नही होगा..बिन माँगे मोती मिले..माँगे मिलत न भीख...मतलब ये कि लोकतंत्र में कुछ वर्ष कार्पोरेट के हिसाब से चल लें..लेकिन अंततोगत्वा आना जनता की शरण मे ही पड़ता है..वृहद लोकतंत्र की जय...