दिशा तथा दशा

जनता कहिंन..."वोट ठगोत्सव" बन रहा एक परम्परा...

संजय नागपाल नैनीताल... आज अयोध्या बाबरी विध्वंस मामले को 25 वर्ष पूरे हो गए हैं..6 दिसंबर 1992 को बीजेपी नेताओं की शय पर उक्त विवादित स्थल को ढहा दिया गया था.. पर हमारी न्यायपालिकाएँ अभी तक मामले में पूर्ण निर्णय तक नही पहुंच सकी हैं..कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने तो 2019 लोकसभा चुनावों तक इस मामले की सुनवाई न किये जाने की वक़ालत भी कोर्ट से की है..देश मे कानून अपने हाथ मे लेने का अधिकार किसी को भी नही है..न तो मज़हबी फैसले स्वयं लेने का और न ही उन पर अपनी इच्छा के मुताबिक़ जबरदस्ती कार्यरूप देने का..किन्तु संविधान को जानते बुझते भी कांग्रेस व बीजेपी दोनों ही बड़े दल उनको तोड़ने की योजनाएं भी बुनते रहते हैं..और न्यायपालिकाओं की उक्त के संबंध में भूमिका को भी ठीक नही कहा जा सकता..क्योंकि राजनीतिक पार्टीयों की ओर से जो भी अपील मुद्दों में की जाती है उस पर तुरंत संज्ञान लेकर उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है..आखिर राजनेताओं की शय पर मुद्दों को जीवंत रखने का काम क्या..? चारों स्तंभ बखूबी कर रहे हैं..
वास्तव में यह लोकतंत्र का बहुत दुःखद पहलू है..कि चारों स्तंभ मिल कर इस तंत्र को चला रहे हैं..जबकि न्यायपालिकाओं को स्वयं ही सभी छोटे-बड़े मामलों को निपटाने के लिए समय सीमा निश्चित की जानी चाहिए..चौथे स्तंभ का मुख्य कार्य भी यही है कि लंबित व मामलों पर समयानुसार जनहित में प्रसारण किया जाता रहे कि कौन-कौन से मामले अभी तक लंबित चल रहे हैं..किन्तु राजनीतिक दलों की कठपुतली बन कर सत्ता व सरकारों को सहयोग करना इन लोकतंत्र के स्तंभों को नही सुहाता..हालांकि देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस्.ठाकुर ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्यायविदों की नियुक्ति के संबंध में प्रार्थना की..और उनकी यह सोच कि न्यायपालिकाओं में लंबित मामलों को एक निश्चित समय मे निपटाया जा सके..बहुत अधिक प्रसंशनीय रहा..पर इस लोकतांत्रिक प्रणाली के कानों में जूँ नही रेंगी..क्योंकि मामलों को अधिक से अधिक संख्या में लंबित व जीवंत रखा जाए व लोगों को जल्द न्याय न मिल पाए..ऐसी सोच हमारे तंत्र की है..मामलों में पारदर्शिता न रहे..और केवल विरोधियों को कैसे पानी पी,पी कर कोसा जाए..बस इसी जुगत में राजनीतिक दल अपना कार्यकाल पूरा कर लेते हैं..और एक दूसरे के कार्यकाल में हुए घोटालों पर भी तटस्थ बने रहते हैं..
कुलमिलाकर जब तक देश का प्रतिनिधित्व कर रहे राजनीतिक दल मामलों में पूरी ईमानदारी नही बरतेंगे तब तक लोकतंत्र के अन्य स्तंभों से ईमानदारी की कल्पना भी बेईमानी ही लगती है..और हक़ीक़त में चुनावों में बेहिसाब व बेबुनियाद जनता से वादे करने वालें राजनीतिक दलों पर भी कभी अंकुश लग पाये.. ये तो बड़ा सवाल है..पर इससे बड़ा सवाल यह है कि देशवासियों को लंबित मामलों में न्याय मिल पाए..? हमारे लोकतंत्र में प्रयास होंगे तो बस.."वोट ठगोत्सव" के जिसके तहत जनता को दिग्भ्रमित कर केवल अपना मक़सद हासिल किया जा सके...