विचार विमर्श

जनता कहिंन...हड़प लो राजनीतिक चंदा..

संजय नागपाल, नैनीताल

देश व निवासियों को सुधारने का बीड़ा उठाने वाले राजनीतिक दल आखिर खुद उस परिधि में क्यों नही आना चाहते..राजनीतिक दलों को मिल रहे चंदे पर ए.डी.आर की रिपोर्ट में पिछले चार सालों में पाँच राजनीतिक दलों को 957 करोड़ का चंदा मिला है..जिसमें सत्ताधारी बीजेपी को 705.81 करोड़ का चंदा औद्योगिक घरानों से मिला है..जिसमें लगभग 384 करोड़ का चंदा उन्हें बेनामी प्राप्त हुआ है.. कांग्रेस पार्टी को 198 करोड़ का चंदा मिला है.. आपको बता दें कि 8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी इस आशय से की गई थी कि आमजन के पास ज्यादा धन ही न रहे..जब देश के आम नागरिक के पास ज्यादा धन नही रहेगा तो राजनेताओं के फैसलों का विरोध करना जनता के लिए कठिन हो जाएगा..इसीलिए पिछले वर्षों में खाद्य पदार्थों के मूल्य भी बेतहाशा बढ़ा दिए गए.. गरीब व मध्यम वर्ग तो रोजी व रोटी के बीच तालमेल को बैठाने में ही व्यस्त हो गए.. हैरानी यह कि चुनावों में नेताओं के पास पर्याप्त धन गरीबों को राशन व नगद बाँटने के लिए था..आखिर जनता यह सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या संबंधित कानून अपने देश के राजनेताओं पर लागू नही होता..कहने को तो नोटबंदी के दौर में राहुल गाँधी सहित प्रधानमंत्री की वृद्ध माँ भी छोटी-छोटी रकमों के लिए लाइनों में लगे थे..पर कहीं न कहीं देश के राजनैतिक दल जनता को ठगने की जुगत में ही रहे..राजनीति में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के दौर तो चलते ही रहते हैं पर बड़ा सवाल यह है कि "एक देश के भीतर सबके लिए एक कानून नही है" आमजनता को तो एक-एक पैसे का हिसाब व्यवस्था को देना पड़ता है..पर राजनीतिक दलों को अपनी इस व्यवस्था पर शायद यकीन नही है..दरअसल काले धन का बड़ा स्रोत राजनेता ही होते हैं..वह कालाधन चाहे देश के भीतर जमा हो या विदेशों में..
कुलमिलाकर जब तक देश के राजनीतिक दलों को उक्त चंदे का हिसाब आम नागरिकों की तरह देने की व्यवस्था अमल में नही लायी जाती..तब तक मामले चाहे राज्यों में बहुमत के बिना सरकारें बनाने का हो या विधायकों की खरीद-फरोख्त के..कभी हल नही हो सकते..और राजनेता बात भ्रष्टाचार मिटाने की करते हैं..आप ही बताएं कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का यदि वे हिसाब न दें..तो क्या..?सिस्टम पारदर्शिता से चल पाएगा.. अगर आपको व्यवस्था में सुधार करना है तो पहले आपको स्वयं सुधारना होगा..बिना सुधरे यदि आप व्यवस्था सुधारने की बात करते है तो आप खुल्लम-खुल्ला लोकतंत्र का मज़ाक बना रहे हैं.. कहने का मतलब यह कि पहले आप खुले में संडास करना बंद करें..तभी बेहतर संदेश जनता के बीच जाएगा..सोच बदलो..तभी देश बदलेगा...