विचार विमर्श

जब भी देश में कहीें साम्प्रदायिक घटना

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
जब भी देश में कहीें साम्प्रदायिक घटना घटित होती है, कुछ राजनैतिक दल हिन्दुओं और मुसलमानों को आमने-सामने खड़ा करने में सफल हो जाते हैं। एक विशेष राजनैतिक दल और उसके कुछ नेताओं को भारत में मुसलमानों का दुश्मन ठहराकर ‘वोट बैंक’ की राजनीति को गरमा दिया जाता है। धर्म निरपेक्षता पर सड़क से संसद तक गरमा-गरम बहसें होने लगती हैं। आज भी यही हो रहा है। केवल गुजरात के दंगों को छोड़कर देश में साम्प्रदायिक सौहार्द का वातावरण है। यदि भारत के सारे हिन्दू या सारे मुसलमान अथवा अन्य लोग साम्प्रदायिक होते तो सम्पूर्ण भारत की स्थिति भिन्न होती।
संयोग से आज जिस राजनैतिक दल को मुसलमानों का कट्टर दुश्मन ठहराया जा रहा है (या ठहराया जा चुका है) उसके मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी संसद की सबसे कद्दावर शख्सियत का नाम है। राजनैतिक विचाराधारा की विषमताओं और भिन्नताओं ने उनकी सहृदयता को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। उसका मानवीय मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण पूर्व की भाँति आज भी व्यापक है। दिल, दिमाग और आचरण की समानता के कारण उनकी छवि हिन्दूवादी पार्टी का मुखिया होने के पश्चात् भी उदारवादी नेता की मानी जाती है। उनकी उदारवादिता के कारण जनसाधारण उन्हें ‘आधा हिन्दू-आधा मुसलमान’ समझते हैं। साम्प्रदायिकता के भयावह वातावरण में भी लोग उन पर भरोसा करते हैं। उनके अनुसार ‘सेक्यूलर वाद का मतलब है देश के भीतर सभी धर्मों को समान समझना और मजहब को राजनीति से अलग रखना।’
उनके इस दृृष्टिकोण को लोक सभा में दिये गये उनके 17 नवम्बर 1969 के भाषण से विस्तार से समझा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था,‘‘भारत में मुसलमान रहते हैं। उनकी काफी संख्या है। वे समान नागरिकता के अधिकारों का उपयोग करते हैं। मजहब के आधार पर हम जनता में कोई भेदभाव नहीं करते। हमने भारत में एक असम्प्रदायिक राज्य स्थापित किया है।’’
22 मार्च 1998 को जब वह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था- ‘‘हमारी सभ्यता प्राचीन है, यह समन्वय पर आधारित है। यह समझाने-बुझाने पर जोर देती है केवल सहन करने पर नहीं। इसका निर्माण सभी उपासना पðतियों के प्रति गहरे और सक्रिय आदर पर हुआ। हमारे )षियों ने कहा है कि सभी स्थानों पर गिरने वाली वर्षा की बूँदें जैसे अलग-अलग धाराओं में बहती हुई अन्त में एक ही समुद्र मंे जा मिलती हैं उसी तरह सभी लोगों की पूजाऐं एक ही ईश्वर को प्राप्त होती हैं।’’
यह उðरण उनके व्यापक दृष्टिकोण और अन्तःकरण का परिचायक है। भारत में इस्लामी साहित्य उर्दू में होने के कारण अधिकांश मुसलमान उर्दू को इस्लाम की भाषा समझ बैठे हैं। अनेक मुस्लिम संस्थाओं का आचरण भी यही दर्शाता है परन्तु यह एक महान भूल है। उर्दू भारत की गंगा-जमुना तहजीब की पहचान है और विद्वानों ने इसे मिल-जुलकर परवान चढ़ाया है। अटल जी का भी यही मत है कि वह भी उर्दू को देश की भाषा मानते हैं, उन्होंने उर्दू को तथाकथित सेक्यूलर वादियों की भाँति मुसलमानों से नहीं जोड़ा। उनका कहना है-‘भाषाओं के विवाद में उर्दू का विवाद भी चल रहा है। उर्दू भारत में पैदा हुई है। उर्दू भारत की जबान है, उर्दू हर तरह से फले-फूले और विकसित हो, ऐसी हमारी इच्छा है। परन्तु उर्दू को पाकिस्तान या मुसलमानों से जोड़कर आप उर्दू के मामले को खराब मत कीजिए। यह उर्दू का सवाल है, मुसलमान का नहीं।’ (अटल जी द्वारा राज्यसभा में 6 मई 1965 के भाषण का अंश)।
उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि का ही प्रभाव था कि 1996 के लोक सभा चुनाव के दौरान लखनऊ की सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं ने उनकी सफलता के लिए उनकी दाहिनी भुजा पर इमाम-जामिन ;पवित्र ताबीजद्ध बाँधा था। इसी क्रम मंे एक और महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख किया जाना आवश्यक है-
‘समय छः बजकर पांच मिनट, स्थान लखनऊ का मुंशी पुलिया चैराहा। हजारों इंसानों की भीड़ अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण सुन रही थी। वह अपने खास अंदाज में भाषण दे रहे हंै। अचानक मंच के पीछे की मस्जिद में अजान शुरू होती है और अटल जी ‘अल्लाहो-अकबर’ की आवाज गूंजते ही अपना भाषण रोककर शांत मुद्रा में खड़े रहते हैं। कुछ धर्म-धुरंधर जय श्री राम का नारा बुलन्द करने की फिराक में हैं। लेकिन अटल जी ने भांप कर हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया। चुप रहने के संकेत से भीड़ गदगद हो गयी, अजान पूरी होने के पश्चात् उन्होंने अपना भाषण फिर आरम्भ किया।’ देखिए दैनिक जागरण 22 सितम्बर 1996।
संघ परिवार के आँगन में पले बढ़े श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 4 अप्रैल, गुजरात मंे गोधरा स्टेशन पर 27 फरवरी को जलाकर राख कर दी गयी साबरमती एक्प्रेस से लेकर शाह आलम कैम्प अहमदाबाद में जाकर स्थिति का आंकलन करने के पश्चात भावुक होकर इंसानियत का जो संदेश उन्होंने व्यक्त किया वह इन सब घटनाओं से कहीं ज्यादा बड़ा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा-
‘‘पागलपन का जवाब पागलपन से नहीं तथा आग को आग से नहीं बुझाया जा सकता। गुजरात के ये साम्प्रदायिक दंगे न केवल हिन्दू-मुस्लिम बल्कि इंसानियत के नाम पर कलंक हैं, जिसके कारण आज विदेशों में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। ’’
उक्त विचार उनके एक सच्चे इंसान और भारत के निष्पक्ष प्रधानमंत्री होने का सजीव प्रमाण हैं।
1996 में जब वह 13 दिन के लिए प्रधामंत्री हुए तो उन्होंने 19 मई 1996 को अपने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था-
‘साम्प्रदायिकता क्या है? सैक्यूलरवाद का सही अर्थ क्या है? इन प्रश्नों पर खुले दिमाग से बहस करने और इनके सही उत्तर ढूँढने के बजाय एक जुनून जगाने का विफल प्रयास हो रहा है। भारत एक प्राचीन राष्ट्र है, इसमें अनेक पंथ, उपासना पðतियां तथा पूजा के तरीके प्रचलित हैं। हम एक देवता या एक पैगम्बर या एक पुस्तक तक अपनी आस्थाओं को सीमित नहीं रखते। यह बहुधर्मी देश है, हम सभी धर्मोें की समानता में विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि यहाँ कभी इस बात को लेकर संघर्ष नहीं हुआ कि ईश्वर की प्राप्ति का सच्चा रास्त कौन सा है? ‘सर्व धर्म सम्भाव’ भारत की घुटटी में मिला है। हमारा सेक्युलरवाद हमारी जीवन शैली का एक अंग है। भारत कभी मजहबी राज्य नहीं रहा और न कभी भविष्य में मजहबी राज्य बनेगा। हम एक दंगा मुक्त समाज और सद्भावनायुक्त वातावरण बनाने के लिए प्रतिबð हैं। .... विभिन्न आस्थाओं के उपासना स्थल हमारी सेक्यूलर परम्पराओं के जीवंत प्रतीक हैं। हम इन परम्पराओं को बनाए रखेंगे।