दिशा तथा दशा

जलागमों में छेड़छाड़ से कैसे बचेंगी जीवन दायिनी झीलें

जलागमों में छेड़छाड़ से कैसे बचेंगी जीवन दायिनी झीलें
कमल बिष्ट, नैनीताल -

नैनीताल व भीमताल के जलागमों में हो रहा अंधाधुंध निर्माण
भू-वैज्ञानिकों की बार-बार चेतावनी के बावजूद जिले की जीवनदायिनी झीलों के जलागम क्षेत्रों में छेड़छाड़ जारी है। भीमताल व नैनीताल के जलागम क्षेत्रों में इसी तरह हरियाली नष्ट कर अंधाधुंध निर्माण कार्य जारी रहे तो इन झीलों का अस्तित्व बचना मुश्किल हो जाएगा। मानव जनित गलतियों से जिले की खुर्पाताल, नौकुचियाताल, सातताल आदि झीलों में भी प्रभाव पड़ रहा है। इस छेड़छाड़ का सर्वाधिक असर भीमताल व नैनी झील में देखा जा सकता है।
नैनी व भीमताल के जलागम क्षेत्र ही 50 प्रतिशत तक झीलों को रिचार्ज करते हैं। भीमताल के प्रमुख जलागम डोब क्षेत्र व नैनीताल के सूखाताल क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण के कारण भूवैज्ञानिक अत्याधिक चिन्तित है। दोनों झीलों के जलागम में लगातार छेड़छाड़ से इनका जल स्तर तेजी से घट रहा है। नैनीझील का जल स्तर इस समय 13 फिट नीचे पहुंच गया है। जबकि भीमताल में जल रिचार्ज की कमी व गौला में पानी छोड़े जाने के दोहरे दबाव से झील आधे भाग में मैदान के रूप में तब्दील हो गई है। इसी तरह खुर्पाताल, सडि़याताल व नौकुचियाताल व सातताल क्षेत्र में भी निरन्तर जल स्तर घट रहा है। भू वैज्ञानिकों का कहना है कि नौकुचियाल व खुर्पाताल के जलागम क्षेत्रों को अधिक खतरा नहीं है, लेकिन इन स्थानों में ट्यूबवैल स्थापित करना खतरा पैदा कर सकता है।
जलागमों से छेड़छाड़ सख्ती से बंद हों:
नैनीताल, भीमताल व अन्य झील के जलागम क्षेत्रों का भूगर्भीय शोध कर चुके यूजीसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बहादुर सिंह कोटलिया का कहना है कि इन जलागम क्षेत्रों में अधांधुंध निर्माण व शेष अन्य झीलों के आस पास ट्यूबवैल स्थापित किए जाने पर सख्ती से रोक लगानी होगी। इन झीलों को बचाने के लिए शासन व प्रशासन को दृढ़ता दिखाने की जरूरत है। नैनीताल व भीमताल झीलों के लिए सूखाताल व डोब महत्वपूर्ण है।
भूगर्भशास्त्री कोटलिया की भूवैज्ञानिक रिपोर्ट के बाद खुर्पाताल में लगाए जा रहे ट्यूबवैल को प्रशासन ने निरस्त कर दिया। मालूम हो कि सैनिक कल्याण समिति द्वारा खुर्पाताल में निर्मित आवासीय कालोनी में पेयजल आपूर्ति के लिए ट्यूबवैल स्थापित किया जा रहा था। यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन था। ग्रामीण इसका विरोध कर रहे थे। भूवैज्ञानिक कोटलिया की रिपोर्ट कोर्ट में पेश होने पर इसको निरस्त कर दिया गया।