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जल संरक्षण

रीतेश साह, नैनीताल-

जल, जीवन के सारभूत पंचतत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्व है। इसके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल जिसका इतिहास मानव जीवन से प्राचीन है, उसकी अनदेखी करना नितान्त असम्भव है। मानव सभ्यता ने अपने जीवन के विकास क्रम से ही इसकी महत्ता को स्वीकार किया और हमने पाया कि विश्व की सभी प्रमुख सभ्यताओं का उदय जल क्षेत्रों के समीप ही हुआ। यहीं से जल व सिंचाई प्रणालियों का जन्म हुआ था। जल प्रबंधन की सटीक व्यवस्था का उदाहरण हम हड़प्पा सभ्यता के स्थल मोहनजोदड़ो, लोथल व धौलीवीरा तथा मेसोपोटामिया सभ्यता के स्थल नौसस व कीट अवशेषों से ले सकते हैं।
वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख घटक कृषि क्षेत्र व विद्युत क्षेत्र की क्षमता का भरपूर दोहन करने व देश के विकास के लिये राष्ट्रीय जल नीति 1987 में इसे सर्वाेपरि प्राकृतिक संसाधन और मूल्यवान प्राकृतिक सम्पत्ति माना गया है। इस संसाधन की महत्ता को स्वीकार करते हुए संविधान के अनुच्छेद 51 ;एद्ध के भाग 7 में मौलिक कत्र्तव्य के रूप में इसके संर्वधन व रक्षा की बात कही गई है। अतः जल संसाधनों का महत्तम विकास और प्रभावकारी उपयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्रबन्धन वर्तमान समय में एक ऐसे तकनीकी अस्त्र के रूप में सामने आया है जिसके द्वारा संसाधनों का अधिकतम दोहन किया जा सकता है। इस तकनीक के द्वारा इस महत्वपूर्ण प्राड्डतिक संसाधन का उपयोग कर हम भविष्य को जीवन का अमूल्य उपहार प्रदान कर सकते हैं। इतनी विस्तृता लिये होने के बाद भी यह क्षेत्र उपेक्षित ही है। जल प्रबन्धन के कानूनी ढांचे के अध्ययन द्वारा भविष्य में नई दिशा नीति का निर्धारण किया जा सकेगा। आज हम परिकल्पित वैश्विक ग्राम के उस साइबर युग में पहंुच रहे हैं जहां सारी दुनिया सिमटकर एक हो रही है। यहां कोई भी समस्या सामूहिक हो सकती है। इन परिस्थितियों में जल संकट विकराल आकार ग्रहण करता जा रहा है। इस महत्वपूर्ण संसाधन में जिस तरह कमी होती जा रही है उस पर आने वाले समय में जल आधारित महत्वपूर्ण भूमिका में होगी। अभी जल को तीसरे विश्वयु( का कारण माना जा रहा है। विभिन्न राष्ट्र व राज्यों में जल विवाद का कारण बना हुआ है। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक व तमिलनाडु के मध्य कावेरी जल विवाद, दिल्ली व हरियाणा, सतलुज-यमुना नहर जल विवाद के मध्य यमुना जल बटवारा, भारत व नेपाल के मध्य कोसी व शारदा जल विवाद, भारत व बांग्लादेश के मध्य गंगा नदी जल विवाद प्रमुख हैं। यह स्थिति इस क्षेत्र की भी हो सकती है। इस उदाहरण में एक नदी उत्तरांचल की सीमा निर्धारक है। यदि शीघ्रता से इस दिशा में कदम नहीं उठाये गये तो संकट की विभीषिका तीसरे विश्व यु( के रूप में प्रकट हो सकती है।
यह माना जाता है कि इतिहस खुद को दोहराता है। जिस तरह आंग्ल भारत में औपनिवेशक शोषण के द्वितीय चरण में यहां के संसाधनों का शोषण किया गया वर्तमान बाजारवादी व्यवस्था भी उसी मार्ग पर चल रही है। विनाश व शोषण को बढ़ावा देकर अपने संसाधनों की सुरक्षा व परम्परागत ज्ञान वृ(ि से मुंह मोड़ लिया गया है। यही घातक प्रवृत्ति उत्तराखण्ड में भी परिलक्षित हो रही है। जिस तरह से यहाँ के परिस्थितिकी तंत्र से खिलवाड़ किया जा रहा है उसकी परिणति जल संकट के रूप में सामने आ रही है। उत्तराखण्ड के अधिकतर शहर, कस्बे और गांव जल संकट का सामना कर रहे हैं। कुमाऊँ मण्डल के छह जिलों में से दो जिला मुख्यालय क्रमशः अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ तो भीषण जल संकट से जूझ ही रहे हैं। जल प्रबंधन की समृ( परम्परा होने के बाद भी यह प्रदेश जल संकट का सामना कर रहा है। विकास और जल सुरक्षा के नाम पर भी यहां की परम्परागत जल प्रणाली को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
पारंपरिक जल संरक्षण का भारत में समृ( इतिहास रहा है। पारंपरिक जल संरक्षण पद्यतियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्थानीय लोगों को अपनी प्राड्डतिक परिस्थितियों के अनुसार खुद इनका निर्माण करने और प्रबंधन करने का अधिकार है। देशभर में इस बात की गवाह कई पारंपरिक जल प्रणालियां हैं जो कि ऐतिहासिक रूप में जल-तंत्रों के प्रबंधन, यहां तक यदि वे तत्कालीन शासन की सहयोग से निर्मित हों तो भी, एवं उनके जल के प्रबंधन की पूर्ण जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की थी।
वर्तमान में मौसम विभाग द्वारा अच्छे मानसून की घोषणा की गयी है। इसका लाभ उठाकर पर्वतीय क्षेत्रों में जल संरचनायें बनाकर धरती में जलसंभरण क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है। परंपरागत रूप से इन संरचनाओं को उत्तराखंड में चाल-खाल के नाम से जाना जाता है। यहाँ के किसानों का खेती के साथ पशुपालन मुख्य आधार रहा है। ग्रामीणों द्वारा परंपरागत लोक ज्ञान का प्रयोग कर जंगलों में पशुचारण के दौरान स्वयं के उपयोग एवं विशेषकर पशुओं के पेयजल के लिए चाल-खाल बनाये गये थे। देखरेख के आभाव में इनका अस्तित्व संकट में है। चाल-खाल पहाड़ की पारंपरिक जल प्रबंधन की व्यवस्था है। क्षेत्रवासी खत्तों में पशुओं को लेकर निवास की अवधि में जंगल में उपलब्ध ढलवा भूमि में मिट्टी खोद कर छोटा सा हल्का गहरा गड्ढा बना लेते थे जिसे खाल के नाम जाना जाता है। इनमे वर्षाकाल में पानी की मात्रा बढ़ जाती थी और पालतू पशु एवं जंगली जानवर उसमें पानी पीते थे। खाल, चाल का ही विस्तृत रूप है। इसी तरह चुपटौले व ढाण भी परंपरागत जल प्रबंधन व्यवस्था के भाग हैं। चुपटौले भी जलकुंड के तरह की एक अन्य व्यवस्था होती है। इसे उन स्थानों पर बनाया जाता है जहाँ पर पानी की मात्रा अधिक होती है। इसका पानी भी जानवरों के पीने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। ढाण का निर्माण इधर-उधर बहने वाले छोटे-बड़े नालों को एकत्रित करके किया जाता है और उसे तालाब का आकार दे दिया जाता है। इसका इस्तेमाल नहरें निकाल कर सिंचाई करने में भी किया जाता है और पशुओं को नहलाने में भी
जंगलों में बढ़ते दबाव के कारण, चैड़ी पत्ती के जंगलों की कमी के कारण प्राड्डतिक जल स्त्रोतों में कमी आई है। पहाड़ियों पर चैड़ी पत्तियों के जंगलों में भी पिछले कुछ समय से उल्लेखनीय कमी आई है। चाल-खाल के माध्यम से जंगलों में नमी लायी जा सकेगी और जंगल बदहा तो जल स्त्रोत भी क्योंकि दोनों में अनन्य तारतम्य है। वनों और जल का आपस में एक गहरा अंतसंबंध है, जो जमीन को मजबूती तो देते हैं ही साथ ही जल स्त्रोतों को निरंतरता प्रदान करते हैं। जंगलों में जलग्रहण संरचनायें चाल-खाल के कारण जलस्रोतों की जलराशि में वृ(ि होगी ।
इस महत्वपूर्ण संसाधन में जिस तरह दिन-प्रतिदिन कमी आती जा रही है उसके लिए हमारी नीतियां, गलत प्रबंधन, स्वार्थ व तेजी से हो रहा वनों का विनाश प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। वनों के कम होने से भूमिगत जल श्रोतों व जल स्तर में कमी आई है। ऐसी परिस्थिति में हम एक तरफ विद्यमान जल श्रोतों की उपेक्षा करते आए हैं वहीं दूसरी तरफ इसके जल के उपयोग पर भी समुचित ध्यान नहीं दिया है। यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम भूमिगत जल स्तर में वृ(िकर सकते हैं।
अब वर्तमान में अच्छे मानसून की संभावना को देखते हुए आवश्यक है कि गाँव के स्तर पर लोगों के द्वारा बरसात के पानी को इकट्ठा करने की शुरुआत करनी चाहिये। उचित रख-रखाव के साथ छोटे या बड़े तालाबों को बनाने के द्वारा बरसात के पानी को बचाया जा सकता है। युवा व विद्यार्थियों को अधिक जागरुकता की आवश्यकता है। विकासशील विश्व के बहुत से देशों में रहने वाले लोगों को जल की असुरक्षा और कमी प्रभावित कर रही है। आपूर्ति से बढ़कर माँग वाले क्षेत्रों में वैश्विक जनसंख्या के 40 प्रतिशत लोग रहते हैं और आने वाले दशकों में ये परिस्थिति और भी खराब हो सकती है क्योंकि सब कुछ बढ़ेगा जैसे जनसंख्या, ड्डषि, उद्योग आदि। ऐसा आकलन किया जाता है कि 1 प्रतिशत से भी कम पानी पृथ्वी पर पीने के लायक है। अगर हम पीने के पानी और विश्व की वर्तमान जनसंख्या का पूरा अनुपात निकालें, ये होगा, हर दिन पानी के 1 गैलन पर एक बिलियन से भी अधिक लोग पूरी दुनिया में जी रहे हैं। ऐसा भी एक आंकलन है कि लगभग 3 बिलियन से भी ज्यादा लोग 2025 तक पानी की कमी से जूझेंगे।
हालांकि लोग अब स्वच्छ जल का महत्व समझना शुरु कर चुके हैं पर पूरी तरह से जल को बचाने की कोशिश अभी भी नहीं हो पा रही है। पानी को बचाना एक अच्छी आदत है और जीवन को धरती पर जारी रखने के लिये हरेक को अपना सबसे बेहतरीन प्रयास करना चाहिये। कुछ साल पहले, कोई भी दुकानों पर पानी नहीं बेचता था हालांकि अब समय बहुत बदल चुका है और अब हम देख सकते हैं कि सभी जगह शु( पानी की बोतल बिक रही है। पूर्व में तो प्याउ लगाने की परंपरा भी थी लेकिन अब बोतलबंद पानी का जमाना है। हम हर क्षण अपनी परम्परा को विस्मृत करते जा रहे हैं। वर्तमान में जल की कमी का सबसे बड़ा कारण वर्षा-जल के संरक्षण की कमी तो है ही भूजल का पुनर्भरण कम व दोहन अधिक भी बड़ी समस्या है। साथ ही सिंचाई व तराई में अधिक उपयोग और जीवनशैली में जल संरक्षण की परम्परा को दरकिनार करना है ।
जल प्रड्डति की अनमोल धरोहर है, यदि वर्षाकाल में जल व्यर्थ बहेगा तो आने वाली गर्मियों के समय में पानी की कमी एक गहन संकट बन जाएगी। जल का उपयोग समझदारी से करें तो जल की उपलब्धता लम्बे समय तक बनी रहेगी।
जल संरक्षण की परम्परागत विधिया कम खर्चीली और टिकाऊ तो हैं ही साथ ही साथ हमारे प्राड्डतिक परिवेश के लिये भी अनुकूल हैं। इनके प्रबंधन के लिये किसी भी तरह की अतिरिक्ति संपत्ति और प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती है और यह हमेशा हर परिस्थिति में काम करती हैं, बस जरूरत है तो इन्हें बचाने की। पहाड़ों में पानी संग्रहण करने की कई पारम्परिक पर वैज्ञानिक विधियां हैं जो आज तेजी से लुप्त हो रही हैं। यदि उनके बारे में अच्छे से समझा जाये और उन्हें आज फिर अपनाया जाये तो पानी की समस्या का दीर्घकालिक समाधान मिल सकता है।