संपादकीय

जागो - जागो कहीं आपदाऐं नियति ना बन जाये उत्तराखण्ड की

जागो - जागो कहीं आपदाऐं
नियति ना बन जाये उत्तराखण्ड की
भूगर्भीय हलचल हो या फिर कोई भी प्राकृतिक या अप्राकृतिक आपदाऐं, उत्तराखण्ड इस दृष्टि से एक संवेदनशील राज्य है और इसके प्रभाव व मार को यहाँ के लोगों ने नजदीक से महूसस भी किया है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, वनों पर निर्भरता, नदियों से खनिज सम्पदा हो या अन्य किसी रूप में प्रकृति का दोहन, जब इसकी अति हो जाती है तो उसके दुष्परिणामों से रूबरू भी होना पड़ता है। हाल ही मेें आई केदारनाथ आपदा ने हमें अपने रौद्र रूप से परिचित भी कराया। उसे दुनिया करे या न करे उत्तराखण्ड के लोग सदियों तक जरूर महसूस करेंगे। कुछ आपदायें भले ही मनुष्य के नियन्त्रण में ना हो लेकिन सूझबूझ से उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। यहाँ के लोगों को यह तो मानना ही होगा कि आपदा आई, सतर्कता और सावधानी नहीं रखी गई तो प्रभावित होने वाले लोग भी यहीं के होंगे। जंगलों का क्षेत्रफल कम हो रहा है। पहाड़ों में आज भी जंगलों में निर्भरता अधिक है। नदियों, नालों से पानी का स्तर गिर रहा है । मानव व वन्य जीवों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। भूकम्परोधी निर्माण प्रणाली अव्यवस्थित है। कालिदास के जीवन में तो एक ही बार में परिवर्तन आ गया था। लेकिन हम कब कालिदास बन अपने को मिटाने की कोशिश करते रहेंगे। इसे तो अनजाने में कहना भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

प्रकृति के दोहन की कला में हमने जो दक्षता हासिल कर ली है। जंगलों में हमारी निर्भरता अभी भी काफी है। जंगलों के दोहन में हमारा योगदान जितना ज्यादा है, उसके वर्धन व संवर्धन में अपेक्षता काफी कम है। जंगलों का दोहन चाहे चारे के लिए हो, लकड़ी के लिए, खनन के लिए या दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए हो, यदि इन कार्यों को हम अपना नैतिक अधिकार मानते हैं तो अब समय इस क्षेत्र में सुधार करने का आ गया है। ऐसे पेड़ पौधे जो जंगल का विस्तार करने में मद्द करते हैं, हमारे जल स्रोतों को जीवन  प्रदान करते हैं, उन्हें जल संरक्षण देने का यही सही वक्त है। जल, जंगल और जमीन के प्रति हमारी जो नैतिक जिम्मेदारी है उसके निर्वाहन का। यदि यहाँ की सम्पदा का उपयोग करना हमारा अधिकार है तो संवर्धन करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है। आपदाओं को नियंत्रित करने में भी हमारी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
जंगलों को आग से बचाना, नदियों को अवैध खनन से बचाना, जंगलों में ऐसे पेड़ों का विस्तार करने में सरकार का सहयोग जो कि वन्य जीवों को जंगलों में ही भोजन उपलब्ध करा सके। सरकार व सरकारी प्रतिनिधियों से जनहित की जानकारियाँ लेकर उसका विस्तार करना जिसमें यदि कोई दिशा भ्रमित हो रहा है तो उसका विरोध करना भी शामिल है। ऐसे भवनों का निर्माण व उनकी जानकारी जो कि यहाँ की भौगोलिक दशा को देखते हुए आदर्श हो। आपदा के प्रकार, आपदा की दशा में अपना व साथ वालों का बचाव तथा आपदा चाहे मानव द्वारा जनित हो या फिर प्राकृतिक, इनसे कैसे बचा जाये, इस ज्ञान का प्रचार - प्रसार भी आवश्यक है। सरकार और सभी जन इस दशा मेें मिलकर काम करें तो जिस आपदा का दंश हमने झेला है, हमारे सालों की मेहनत जो कि एक झटके में ध्वस्त हो गई, उसकी इस पुनरावृत्ति से बचा जा सकता है।

आपदा के कई रूप होते हैं और यह बता कर भी नहीं आती। बस सक्रियता, संयम, साहस, जानकारी व इसका कारण ना बनकर इससे बचा जा सकता है। यदि हम यहाँ के संसाधनों की रक्षा के प्रति जागरूक रहे, इसका बेहतर उपयोग करना सीख लें, सरकार की ओर से सकारात्मक प्रयासों में तेजी लाई जाय, लोगों की भागीदारी बढ़े तो निश्चित ही जन-धन की जो हानि होती है , उसमें कमी आयेगी और यदि सब कुछ आँख बन्द करके चलता रहा तो आपदा, उत्तराखण्ड की नियति बन जायेगी इसमें कोई संशय नहीं है। आपदा से बचाव व इसकी जानकारी के बीज फैलाने में हमें एक दूसरे की सहायता करनी होगी ताकि उत्तराखण्ड का विकास हो और वह स्वरूप निकलकर आये जिसकी परिकल्पना की गई। इसका ठेका सरकार या प्रतिनिधियों का ही नहीं है, यह हर उत्तराखण्ड के निवासी की जिम्मेदारी है। ऐसा मेरा मानना है बाकी यह तो देव भूमि है ।

जाकि रहि भावना जैसी, प्रभु मुरत तीत पाई वैसी।।