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ज्ञान पीठ पुरस्कृत महादेवी वर्मा एवं कुमाऊँ

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -                                             छायावाद काल - हिंदी कविता में प्राकृतवाद को दर्शाते हुए युग में प्रमुख कवियों में से एक, महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फरुखाबाद में सन् 1907 को हुआ था। सन् 1929 में वह पहली बार कुमाऊँ में नैनीताल के समीप ताकुला में ठहरे गांधी जी से मिलने आई थीं। गांधीवादी दर्शन ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया था तथा शिक्षा और समाज सेवा की दिशा में भी वे उन्हीं से प्रेरित हुईं थीं। आरोग्यलाभ हेतु सन् 1930 में उन्होंने नैनीताल की अपनी अगली यात्रा की तथा वहाँ से लौटने के पश्चात उन्होंने प्रयाग में पहली बार ‘आॅल इंडिया कवियित्री सम्मेलन’ का आयोजन किया एवं महात्मा गांधी की प्रेरणा से प्रभावित होकर सन् 1932 में उन्होंने हिंदी में महिलाओं की शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की।
स्वतंत्रता के पश्चात वह सन् 1952 में नैनीताल आ गयीं तथा एक प्रख्यात लेखक राजेंद्र लाल साह के अनुसार ”उन्होंने अपनी कविताओं का पाठ नैनीताल के पहले शरद ऋतु महोत्सव - जो अब एक राष्ट्रीय आयोजन है, में किया। उसके अगले वर्ष ताकुला में उन्होंने ‘उत्तरायणी’ संगठन की स्थापना की। वह इस संगठन की संस्थापक अध्यक्ष तथा प्रसिद्ध नाटककार गोविंद बल्लभ पंत इसके सचिव थे।“ संगठन की कार्यकारी समिति में दिग्गज राजनेता जैसे पंडित गोविंद बल्लभ पंत तथा गणमान्य लेखकों और कवियों में मैथिली शरण गुप्त, हेम चंद्र जोशी, राय कृष्णा दास, सुमित्रा नंदन पंत, इला चंद्र जोशी, तारा पांडे, वासु देव शरण अग्रवाल और अन्य लोग थे। सन् 1955 में उन्होंने एक बड़ी उपलब्धि के रूप में तथा जिसने कई वर्षों तक साहित्य की दुनिया को प्रभावित किया, ऐसी ‘अंतर-राज्य राइटर्स शिविर’ का आयोजन ताकुला में कराया था। सन् 1954 में वह साहित्य अकादमी की संस्थापक सदस्य भी रहीं।
प्रख्यात लेखिका प्रोफेसर नीरजा टंडन दृढता से कहती हैं, ”हिमालय के प्रति उन्हें एक निश्छल प्रेम था एवं सन् 1934 में जब वह केवल 27 वर्ष की थीं बद्रीनाथ की तीर्थ यात्रा पर चली गयीं। उन दिनों कोई मोटर सड़क नहीं होती थी और तीर्थयात्रियों को काठगोदाम रेलवे स्टेशन से पैदल ही मंदिर के लिए कठिन यात्रा कर जाना पड़ता था। तीर्थयात्रा के दौरान वह रामगढ़ - गांव जो सेब के बगीचों तथा चाय बागानों के लिए प्रसिद्ध था, में भी रहीं।“ यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और ऊँचे हिमालय पर्वतों को देख वह मंत्रमुग्ध हो गयीं। उन्होंने वहाँ एक छोटा सा घर बनाने की योजना बनाई और यात्रा में लौटते वक्त रामगढ़ में देवीधार की धार पर जमीन का एक टुकड़ा खरीदा लिया। तत्पश्चात सघन वन एवं देवी धार की दिव्य शांति के मध्य गर्मी में आवास हेतु सन् 1938 में यहाँ अपना घर बना दिया एवं अपनी प्रियपात्र कवयित्री मीरा बाई के नाम पर उन्होंने अपने घर का नाम ‘मीरा कुटीर’ रखा। आज यह एक संग्रहालय के रूप में उनके विशिष्ट योगदान और हिमालय के प्रति प्रेम को परिदर्शित करता हुआ दिखता है । यह ‘महादेवी सृजन पीठ’ के रूप में भी प्रसिद्ध है तथा कवयित्री और उनसे सम्बंधित वस्तुओं की जानकारी का संग्रह-केंद्र है। महादेवी वर्मा 1937 से 1960 के दशक में प्रत्येक गर्मियों में रामगढ़ की यात्रा पर आती रहती थीं। सन् 1939 में वह दूसरी बार बद्रीनाथ और केदारनाथ यात्रा पर भी गयीं। साथ-साथ रामगढ़ में उन्होंने गांव की महिलाओं के उत्थान हेतु भी बहुत काम किया। सन् 1942 में उन्होंने रामगढ़ में अपनी साहित्यिक प्रतिभा का प्रदर्शन कविताओं के प्रसिद्ध संग्रह ‘दीपशिखा’ से किया। एवं अपने द्वारा बनाये गए चित्रों से इन्हें और जीवंत बना दिया। ‘महादेवी सृजन पीठ’ रामगढ़ के मोहन सिंह रावत के अनुसार, ”उनकी प्रसिद्ध रचना ‘दीपशिखा’ से पहले चार और संग्रहों ‘निहार’ (1930) ‘रश्मि’ (1932), ‘नीरजा’ (1935) और ‘संध्या गीत’ (1936) का प्रकाशन हो चुका था, जो दुबारा ‘यम’ नाम से सन् 1936 में प्रकाशित की गयी।
वहीं मीरा कुटीर ने भी उनकी दो महत्वपूर्ण रचनाओं ‘अतीत के चलचित्र’ (1941) और ‘स्मृति की रेखाएँ’ (1943) को मूक दर्शक की भाँति टकटकी लगाकर देखा है। उनकी दिव्य उपस्थिति के कारण, यह लेखकों एवं ज्ञानियों के लिए एक तीर्थ स्थल बन गया था। विभिन्न क्षेत्रों और देश के विभिन्न भागों से दिग्गज जैसे मैथिली शरण गुप्त, सुमित्रा नंदन पंत, वासु देव शरण अग्रवाल, धरमवीर भारती, अज्ञेय, नरेन्द्र शर्मा, गोविंद बल्लभ पंत एवं अन्य उनसे भेंट करने लिए यहाँ आया करते थे। एवं धीरेंद्र वर्मा, बाबू राम सक्सेना, गंगा प्रसाद पांडेय, प्रीति अडवाल यहाँ रहकर अपनी रचनात्मक लेखनी भी किया करते थे। महान उपन्यासकार इला चंद्र जोशी ने सन् 1968 में यहीं ‘मीरा कुटीर’ में अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘रितु चक्र’ लिखा। सुमित्रा नंदन पंत ने अपनी प्रकृति से जुड़ी कविताएँ एवं धरमवीर भारती ने अपनी यात्रा का संस्मरण भी यहाँ ही लिखा।
महादेवी सृजन पीठ के संस्थापक अध्यक्ष प्रोफेसर बटरोही बताते हैं, ”महादेवी वर्मा की रचनात्मक प्रतिभा ने उन्हें साहित्यिक जगत में एक उच्च स्थान प्रदान किया था तथा वह कई पुरस्कारों से भी सम्मानित की गयीं जैसे सेक्सरिया पुरस्कार (1934) एवं पद्म भूषण (1956)। लेकिन सरकार का हिन्दी के प्रति उदासीन रवैये के विरोध प्रदर्शन में उन्होंने सन् 1968 में यह पुरस्कार लौटा दिए। उन्हें बाद में भारत भारती (1982) और ज्ञान पीठ पुरस्कार (1983) से भी सम्मानित किया गया। जिसके पश्चात् 11 सितंबर 1987 को उनका निधन हो गया।“
लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित