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टिहरी के उस गाँव में-2

देवेंद्र मेवाड़ी, दिल्ली ....
एकदम साफ आसमान के रंगमंच पर तारे उगने लगे। दक्षिण-पूर्व के आसमान में एक और हीरा चमकने लगा। नजरें उससे ऊपर उठीं तो वहाँ कतार में त्रिकांड के तीन तारे नजर आ गए। ओह, तो यह व्याध यानी ओरायन तारामंडल है! और, यह चमकता छोटा हीरा है- सिरिअस यानी लुब्धक नक्षत्र। फिर तो कई और सितारे भी पहचान में आने लगे-बेतलग्यूज यानी आद्र्रा नक्षत्र, राइगेल, अल्देबरान यानी रोहिणी नक्षत्र, प्लेइडीज यानी कृत्तिका पुंज। दूसरी ओर मिथुन राशि के तारे और उनसे ऊपर कैस्टर और पोलस्क यानी पुनर्वसु नक्षत्र। धीरे-धीरे पूरा आसमान सितारों से भर गया और दुधिया आकाशगंगा आरपार फैल गई।
हम आग तापते रहे। आगे से हाथ-पैरों में आँच की चिसकाटी लगती तो पीठ बर्फ हुई जा रही थी। लगता था, तापमान शून्य से नीचे जा चुका है। मनु सामने जुते हुए खेतों की ओर देख रहा था। अचानक चैंक कर बोला, ”अरे वह क्या है?“ अभी-अभी बेटी पूछ रही थी कि यहाँ जंगल में बाघ तो नहीं होते? पता लगा, अंधेरे में चुपचाप कोई बाघ चला आया। देख कर खुश होगा कि आज तो भून कर खाने का भी इंतजाम है!
लेकिन, मनु और अपर्णा ने खेत में क्या देखा? मैंने पूछा, ”क्या था?“ तो मनु ने बताया, ”मोरू के पेड़ की तरफ से तैरती हुई सी कोई चीज आई और खेत में थोड़ी दूर तक पैरों पर चलने के बाद उड़ गई। (बात कर ही रहे थे कि उसने कहा-) वह देखो, वही तो है।“ पलट कर देखने तक वह चीज पेड़ की तरफ जा चुकी थी। सवाल था कि आखिर वह था क्या? उस ओर मेरी पीठ थी, इसलिए मैं नहीं देख पाया लेकिन वर्णन सुन कर मैंने कहा, ”वह फ्लाइंग फाक्स हो सकता है। पहाड़ों में होते हैं वे, मैंने बचपन में देखा है।“ जो आकार मनु ने बताया, उसके अनुसार वह चमगादड़ या उल्लू नहीं हो सकता। बहरहाल, वह जो कुछ भी था, अब अंधेरे में मोरू के पेड़ में समा चुका था।
रसोई की झोपड़ी के बाहर से किसी ने आवाज दी, ”आइए, खाना तैयार है।“ वहाँ पहुँचे तो मनीश ने परिचय कराया, ”आपके लिए खाना ये बनाते हैं- खुशाल सिंह राणा। ये लोग मेरे साथी हैं। खेती के मेरे काम में भी मदद करते हैं।“ राणा जी से पता लगा, इस गाँव में राणा लोग रहते हैं। यह भमौरी गाँव की चोटी यानी डांडा है-थुनेर, जहाँ 15-20 परिवार रहते हैं। बाकी परिवार नीचे मुख्य गाँव में रहते हैं। भमौरी खाल गाँव तिखोन ग्राम सभा में आता है।
”कई परिवार यहाँ छोड़ कर देहरादून या दिल्ली भी जा बसे हैं।“ मनीश ने कहा,”कोई जमीन बेच कर चला गया, तो कोई यों ही छोड़ कर या कोई बच्चों की नौकरी लग जाने के कारण उनके साथ चला गया। यहाँ कई जगह आपको उजड़ी हुई झोपड़ियाँ और मकान दिखाई देंगे। छोड़ कर गए हुए लोगों में कई तो कहते हैं- उनके खेतों में भी खेती कर ली जाए ताकि खेत उपयोग में रहें।“
”हमारे पूरे पहाड़ की यही दुःखद कहानी है मनीश जी, गाँव-गाँव में यही हो रहा है।“ मैंने कहा।
भरत राणा ने खाना लगा दिया था। मोटे तने के ऊँचे टुकड़ों की मेजें और उससे कम ऊँचे टुकड़ों की कुर्सियाँ। थाली, कटोरी, गिलास पीतल के, खाना रखने के डोंगे घड़े जैसी मिट्टी के। चम्मच, पलटा लकड़ी के और ताँबे का वाटर फिल्टर। ठंड में कँपकँपाते बातें करते हुए खाना खाया। बाहर आए तो झोपड़ी के पीछे उत्तर के आकाश में अंग्रेजी के ‘डब्लू’ आकार का कैसियोपिया यानी शर्मिष्ठा तारामंडल दिखाई दे गया। मैंने कहा, ”मनीश जी, आइए आपको ध्रुवतारा दिखाता हूँ। ‘डब्लू’ के बीच के तारे से उत्तर की ओर काल्पनिक लकीर खींचिए। और, लीजिए धुर उत्तर में वह रहा ध्रुवतारा।“ मनीश के साथ ही श्रीमती जी और बच्चों ने भी ध्रुवतारा देखा। हालाँकि, मैं और लक्ष्मी तो अपने विवाह के अवसर पर सेंतालीस वर्ष पहले भी उसे देख चुके थे। ”एक और तरकीब है ध्रुवतारे को पहचानने की।“ मैंने कहा, ”उसमें सप्तर्षि के आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींचें तो वह भी ध्रुव तारे के पास पहुँचती है।“ अभी सप्तर्षि उग ही रहे थे। फिर भी अगले चार तारे नजर आ रहे थे। मैंने आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींची और ध्रुवतारा खोज लिया। उसके एक ओर आसमान में कैसियोपिया का ‘डब्लू’ लटका था तो दाहिनी ओर सप्तर्षि की पतंग आसमान में ऊपर उठ रही थी। हम ठंड से ठिठुर रहे थे, इसलिए फिर काॅटेज के आंगन में कैम्पफायर के पास आकर आग तापने लगे। ऊपर तारों भरा आसमान था और नीचे रात के अंधेरे में सोई धरती पर हम। थके-मांदे थे, जल्दी ही सोने चले गए।
मैं जमीन पर लगे बिस्तरे में लेट गया। पास के जंगल में कहीं काकड़ बोल रहा था- काँक...काँक्..काँक्! इसकी तेज आवाज सुन कर ही अंग्रेजों ने इसका नाम ‘बार्किंग डियर’ रख दिया होगा। बाहर बीच-बीच में सिहराने वाली सर-सर हवा बहने लगती। भरपूर बिस्तर के बाव़जूद मैं ठंड से सिहर रहा था। लक्ष्मी ने कहा भी था, नीचे ज़मीन और दीवारों से ठंड लगेगी, लेकिन मैं नहीं माना। कहा, ”जमीन में सोना ज्यादा आरामदेह है।“ अब समझ में आ रहा था। वाशरूम में नल का पानी छूते ही बरछी की तरह लग रहा था। सिहराती-ठिठुराती रात थी। निराला जी की ‘शिशिर की शर्वरी’ कविता याद आ गई जो हिंस्र पशुओं-सी आक्रामक हो उठी थी। डरने लगा कि कहीं हाइपोथर्मिया न शुरू हो जाए। रजाइयों में प्यूपा बनकर दुबक गया और धीरे-धीरे मुझे भी टुकड़ा-टुकड़ा नींद आने लगी।
पौ फटने से पहले उठना चाहता था, इसीलिए अलार्म लगा लिया। पाँच बजे उठा लेकिन बाहर गहरा अंधेरा और सन्नाटा था। झाँक कर देखा तो सामने अंधेरे में पहाड़ों पर बिजली की रोशनियाँ चमक रही थीं और पहाड़ों से ऊपर तारों भरा आसमान जगमगा रहा था। मैं फिर रजाई में दुबक गया। छह बजे से पहले फिर उठा। सामने जैसे किसी चित्रकार ने क्षितिज के आर्ट पेपर पर हिमालय की चोटियों का साफ्ट पेंसिल से रेखाचित्र बना दिया था। पूर्व के आकाश में हँसिए-सा पतला फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी का चाँद चमक रहा था।
मैं सूर्योदय का इंतजार करने लगा। मैं सूर्योदय के बदलते रंग देखना चाहता था, इसलिए टकटकी लगाए हिमालय को देखता रहा। कनखियों से पूर्व में पहाड़ों के ऊपर बढ़ती उजास को भी देख लेता था। अचानक हिमालय की चोटियों पर शेडिंग होने लगी। प्रकाश और छाया का प्रभाव दिखाई देने लगा। सहसा चोटियों पर सफेदी पुतने लगी। और, पूर्व दिशा में पहाड़ों के बीच से आती स्वर्णिम उजास ने चोटियों पर भी सुनहरा रंग फेर दिया। फिर जल्दी ही उन पर सफेदी पुतने लगी और हिमालय की धवल चोटियाँ चमक उठीं। साथ ही उस रंगरेज सूरज ने पूर्व की पर्वतमाला से धीरे से अपना मुँह निकाल कर झाँका।
सूरज क्या निकला कि चारों ओर धूप की चादर फैल गई। चराचर जगत जाग उठा। मोरू के पेड़ों और आसपास की झाड़ियों पर नन्हीं चिड़ियाँ प्रभाती गाने लगीं। गौरेयों की टोली खनकते घुंघरूओं की आवाज में चहचहा रही थीं तो धानी रंग की नन्हीं चिड़िया अपनी साथिन के साथ गाने लगी- स्वीट....स्वीट...स्वीट! खेतों की मेंड पर झाड़ पर फुदकती स्ट्रीक्ड लाफिंग थ्रस यानी मुसिया चड़ी भी मधुर तान छेड़ने लगी। एक और चिड़िया गाती थी- स्वीहू...स्वीहू...स्वीहू! सूरज और उसकी धूप देख कर कितनी खुश थीं वे। तभी सामने की पहाड़ी पर दो-एक चकोर बोले- चाकुर....चाकुर...चाकुर!
अब तक हम सभी जाग चुके थे। अपर्णा कैमरा लेकर सामने की पहाड़ी की ओर निकल गई। वहाँ से आरपार पूरा हिमालय दिखता होगा। राणा जी के हाथ की बनाई चाय पीकर हम भी उस ओर निकले। आगे-आगे मैं था। सुबह की गुनगुनी धूप से शरीर में नई जान आ गई। खुद को विश्वास नहीं हो रहा था कि रात को कितनी ठंड थी। मैं चलता रहा। सामने स्लेटों की ढालू छत वाला, सफेदी पुता एक छोटा-सा घर दिखा। थोड़ा और ऊपर धार यानी चोटी थी। वहाँ पहुँचा ही था कि देखा मनीश भी आ गए हैं। चोटी पर उस घर के बारे में पूछा तो बोले, ”एक बुजुर्ग महिला का है। आजकल वे नीचे गाँव में रह रही हैं।“
”यहाँ अकेली रहती हैं?“
”हाँ। घर के आसपास खेती भी करती हैं।“ उन्होंने कहा तो मैं बोला, ”मनीश जी, यह शांति और सुरक्षा यहीं हमारे पहाड़ों में संभव है, प्रकृति की संगत में।
शहरों में तो उम्रदराज लोगों की कोई सुरक्षा ही नहीं है और न वे ‘बैठे ठाले’ की जिदगी में कोई शारीरिक मेहनत ही कर सकते हैं। पार्कों में नकली हँसी हँसते और ताली बजाते कितने दिन कट सकते हैं?“
हम दोनों उस समय अकेले थे। मैंने पूछ लिया, ”आप कह रहे हैं कि गाजियाबाद के रहने वाले हैं। फिर, आपने यह कठिन जीवन क्यों चुना?“
”सच पूछिए तो मुझे लगा मुझे अपना पूरा मानसिक और शारीरिक रूपांतरण करना होगा। इसके लिए मुझे प्रकृति की गोद में लौटना होगा। मैंने यही किया। यहाँ आया, लोगों से मिला। शुरू में मैं ‘बाहरी’ और ‘देसी’ आदमी माना गया। यह स्वाभाविक भी था। लेकिन, जब मैं यहाँ थोड़ा जमीन खरीद कर यहीं के लोगों की तरह, उनके साथ जीने लगा तो लोगों ने मुझे अपना लिया, अपना मान लिया।“ मनीश ने बताया।
”आप यहाँ क्या करना चाहते थे?“
”खेती और ग्रामीण पर्यटन।“ उद्देश्य एक ही रहा और रहेगा कि जो लोग प्रकृति से दूर हो गए हैं, शहरों में फ्लैटों के बंद कमरों में रह रहे हैं, उन्हें फिर प्रकृति में लाने की कोशिश करूँ। भले ही, कुछ ही दिन सही, लेकिन उन्हें लगे कि प्रकृति की गोद में रहने का अर्थ क्या है। यहाँ जीए हुए उनके दिन, उन्हें सदा प्रकृति की याद दिलाते रहेंगे। वे प्रकृति से प्रेम करते रहेंगे।“ मनीश ने कहा।
”इसीलिए जीरो-स्टे नाम दिमाग में आया कि शहरों की आपाधापी से जीरो डाउन करके कुछ दिन प्रकृति की गोद में आइए। यहाँ आकर शहरों की भौतिक सुविधाओं से दूर न्यूनतम प्राकृतिक सुविधाओं में रहिए। प्रकृति का स्नेह, उसकी याद लेकर लौटिए।“
ऊपर चोटी में पथरीली मिट्टी और पत्थरों का एक अनगढ़ सा, आधा खोदा गया गड्ढा दिखाई दिया। पता लगा, किसी सरकारी योजना का रेन हार्वेस्टिंग पिट है। कागजों पर हो सकता है पक्का और भरपूर गड्ढा हो। चारों ओर पहाड़ों पर दूर-दूर माचिस की डिबिया जैसे मकान दिखाई दे रहे थे। चोटी से ठीक नीचे भमौरीखाल गाँव के सीढ़ीदार मगर अधिक चैड़े और चपटे खेत तथा मकान भी दिखाई दे रहे थे। हम चीड़, अँयार, बाँज, बुराँश के छोटे-छोटे पेड़ों और किलमोड़े की झाड़ियाँ पार कर थोड़ा नीचे उतरे और सामने का दृश्य देख कर, देखते ही रह गए। बाएं से दाएं जहाँ तक नजर जाती थी, वहाँ तक भव्य हिमालय खड़ा था। दिनकर की पंक्तियाँ गूँज गई दिलो-दिमाग में- ‘मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट!’
”चोटियों को पहचान रहे हैं?“ मनीश ने पूछा।
मैंने कहा, ”सामने दाहिनी ओर चैखंबा की चोटी तो साफ पहचान में आ रही है।“
”वह देखिए, उसके एक ओर नीलकंठ और कामेट हैं। बाईं ओर केदारनाथ और कीर्तिस्तंभ। उधर गंगोत्री ग्रुप की चाटियाँ हैं। इधर आगे बाईं ओर बंदरपूँछ। और, बंदरपूँछ के पास ही कालानाग और फिर सीढ़ियों जैसी स्वर्गारोहण चोटी। यहाँ से चार ही सीढ़ियाँ दिखाई दे रही हंै। कहते हैं, सात हैं। महाभारत की वह कथा आपने सुनी होगी कि अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने हिमालय में जाकर स्वर्गारोहण किया था।“ मनीश ने बताया।
भव्य हिमालय के ऐन सामने की ठंडी हवा, पानी और चलते-फिरते रहने के कारण हमें खासी भूख लग जाती थी। नाश्ते का समय हो गया था। हम चोटी से उतर कर रसोई की ओर आए। सामने दक्षिण में सुरकंडा का ऊँचा पहाड़ सिर उठाए खड़ा था। पैताने से ही लगता था, जैसे विशाल चट्टानों से बना हो वह। कहीं-कहीं तो सिर्फ चट्टानें दिख रही थीं, जिन पर न घास उगी थी, न पेड़़-पौधे। आधे पहाड़ पर सुबह की धूप की चादर फैल चुकी थी।
नाश्ता लग चुका था। मैं लकड़ी के गोल टुकड़े पर बैठ कर नाश्ता करने लगा। मनीश ने मेरे सामने अपने मोबाइल से जोड़ कर उड़नतश्तरीनुमा एक छोटा-सा सुर्ख स्पीकर रख दिया। पहला ही कौर मुँह में लिया था कि धीरे-धीरे एक भारी गहरी आवाज हवा में गूँज उठी।
(जारी है)