संस्कृति

ट्रैैक्टर छोड़ पुनः कृषि को गोवंश आधारित बनाना होगा

कैलाश चन्द्र सुयाल
वन क्षेत्राधिकारी, नैनीताल
ट्रैक्टर के निर्माण की प्रक्रिया में लोहा, कोयला, चूना पत्थर, मैगनीज, निकल, ताँबा, बाॅक्साइड, टिन तथा जस्ता इत्यादि बहुमूल्य धातुओं का प्रयोग किया जाता है जो पृथ्वी को खोदकर निकाली जाती हैं। इसके खनन से पृथ्वी को कष्ट होता है और दूसरे शब्दों में कहें तो ‘क्पेजनतइंदबम जव मंतजी’ होता है। खनन श्रमिकों व कारीगरों को नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
उक्त वर्णित विभिन्न धातुओं को गलाने वाले संयत्रों में इन कच्ची धातुओं को तोड़ा-पीसा और खौलाया जाता है। इन वृहद कारखानों व फैक्ट्रियों में भी भयंकर नारकीय दृश्य दिखाई देते हैं। चारों ओर गन्दगी से उत्पन्न प्रदूषण। जिन फैक्ट्रियों में इन ट्रैक्टरों के पुर्जों की ंेेमउइसपदह की जाती है, वहाँ इससे भी अधिक प्रदूषण उत्पन्न होता है।
इन ट्रैक्टरों में लगने वाले टायरों का मूल उत्पाद रबर के वृक्ष हैं, जो उष्ण कटिबन्धों में उगते हैं। इन सुन्दर वृक्षों पर आरियाँ चलाकर इनके खून से लेटेक्स बनाया जाता है और उसी से टायर की उत्पत्ति होती है। इस ट्रैक्टर को चलाने के लिये डीजल चाहिये जिसके लिये फिर पृथ्वी का खून चूसा जाता है। इसे रिफाइनरी में रिफाइन्ड किया जाता है। साथ ही कितने मासूम मजदूरों का शोषण, बाजारवाद का ताण्डव, प्रतिस्पद्र्धात्मक अत्याचार, तेल उत्पादक देशों व इनके नियंत्रक दादा टाइप देशों की दबंगई आदि कई राक्षसों का उद्भव। युद्ध, आक्रमण, हत्याएँ, मौतें (कुवैत, ईराक व अमेरिका का सन्दर्भ लें)। इस डीजल/पेट्रोल को लाने में कभी-कभी तो पूरे समुद्री टैंकर समुद्र में समा जाते हैं। कभी यह तेल छलकते हुए आता है और इस प्रकार समुद्री जल को प्रदूषित करता हुआ असंख्य जलजीवों की हत्या करता हुआ गंतव्य तक पहुँचता है। इस डीजल को निर्यात किया जाता है ट्रैक्टर चलाने के लिये पानी के जहाजों, टैंकरों व पेट्रोल पम्पों ने पृथ्वी व प्रकृति पर क्या-क्या जुल्म ढाए, यह एक अलग कहानी है।
रिफाइनरी में कच्चे तेल को रिफाइन किया जाता है। जिन नगरों में इस तेल को शोधित किया जाता है, वहाँ से गुजरने पर पता चलता है कि वहाँ की हवा कितनी बदबूदार है। वहाँ के पानी के संसाधन प्रदूषित हो गए हैं तथा नाना प्रकार के रोगों को फैला रहे हैं। अन्य जगह से आया हुआ व्यक्ति इस पानी को पी नहीं सकता है।
यह ट्रैक्टर तेल भरकर जब तैयार हो जाता है तो उसका मालिक सोचता है कि ट्रैक्टर 40 बैलों के बराबर काम कर लेगा। वह बैलों से कहता है कि अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है, अब तुम्हारी जगह कसाईखाने में है। अर्थात् ट्रैक्टर का सीधा सम्बन्ध गाय-बैलों को कसाईखाने भेजने से है।
अमेरिका सरकार की एक रिपोर्ट स्वीकार करती है कि कसाईखानों में काम करने वाले कामगारों की स्थिति कितनी नारकीय व अनैतिक अवगुणों से ग्रस्त है।
उधर बैलों-गायों की सेवा करने वाले कामगार जो फल, सब्जियाँ व अनाज उगाते थे, गोपालन, चारा उगाई, हल चलाने व अन्य कार्यों को करते थे, बेरोजगार हो जाते हैं।
ट्रैक्टर का इंजन चालू होता है तो वह पेट्रोलियम पदार्थों का भक्षण करता है और जहरीला धँुआ छोड़ते हुए वायुमण्डल में विष घोलना शुरू करता है। पानी को प्रदूषित करता है। उसके भारी-भरकम टायर धरती को दबाकर कठोर बनाते हैं और पौधों की जड़ों को बढ़ने-फैलने में कठिनाई पैदा करते हैं। अब वसुन्धरा को बल देने वाली गोबर की खाद भी नहीं है, इसलिये विवश होकर महंगे रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करना पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में किस प्रकार से समस्त पर्यावरण संस्थान प्रदूषित होता है और किस प्रकार प्राकृतिक गैसों का दुरुपयोग करते हुए अत्यधिक ऊँची लागत से इनका निर्माण होता है। इन उर्वरकों के प्रयोग से धरती के जैविक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और भूमि की प्राकृतिक नमी समाप्त हो जाती है। ऊपर की उपजाऊ मिट्टी बहने लगती है व नीचे की कमजोर मिट्टी कमजोर व कम पौष्टिक फसल उगाती है। नाना प्रकार के खर-पतवार उगते हैं व नए-नए प्रकार के कीटाणु व बीमारियाँ पैदा होती हैं। इन सबको मारने के लिये फिर कीटनाशकों का उत्पादन किया जाता है जिनका उत्पादन करने के लिये सारे पर्यावरण तंत्र को पुनः नाना प्रकार के असंतुलनों का सामना करना पड़ता है। इन कीटनाशकों के प्रयोग से फसलें जहरीली हो जाती हंै, मिट्टी व पानी विषाक्त हो जाता है और पृथ्वी व आगामी फसलें नशेड़ी बन जाती हैं। अगली बार और अधिक रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों की माँग बढ़ती है। पशुओं का दुग्धादि उत्पादन भी हानिकारक हो जाता है।
सम्पूर्ण विश्व में सन् 1950 में 20 मिलियन टन रासायनिक उर्वरकों व कीटाणुनाशकों का प्रयोग होता था, जो सन् 2015 में 500 मिलियन टन पहुँच गया है। फलस्वरूप भूमण्डल में छपजतने वतपकम जैसे रसायनों की मात्रा बढ़ने से 10 प्रतिशत ग्लोबल वार्मिंग बढ़ी है जिसके परिणामस्वरूप मौसम परिवर्तन, जल की मात्रा में कमी, बादलों का फटना, बाढ़, जलप्लावन, तापमान में वृद्धि, बर्फीले पर्वतों व ग्लेशियरों के पिघलने जैसी अनेक समस्याएं निरन्तर बढ़ रही हंै।
गाय अपने सम्पूर्ण प्रजननकाल में आधे नर बछड़ों को जन्म देती है और यदि इन बैलों का कोई उपयोग नहीं होगा तो उन्हें हत्या से बचाना मुश्किल हो जाएगा। यदि हम केवल कोरी धार्मिकता का सहारा लेकर या दया दिखाने मात्र से गोवंश हत्या रोकने की चेष्टा करते हैं तो यह मात्र ढकोसला कहा जाएगा। इसके लिये पुनः कृषि को गोवंशाधारित बनाना जरूरी है। जिससे उपरोक्त समस्त मशीनीकरण सम्बन्धी दोष स्वतः समाप्त हो जाऐंगे।
शास्त्रों में कहा गया है कि जब भी गाय और बैल प्रसन्न होते हंै, तो विश्व का कल्याण होता है और यदि ये पीड़ित हैं, दुःखी हैं तो विश्व का विनाश सन्निकट है। गाय माता पृथ्वी का प्रतीक है और बैल धर्म, सदाचार व कर्तव्य का प्रतीक है साथ ही कृषि क्षेत्र का कत्र्ता बैल है। गाय अमृततुल्य दूध प्रदान करती है तथा ये दोनों मिलकर प्राकृतिक उपयोगी गोमूत्र व गोबर का उत्पादन करते हैं जो मानव भोजन को विकृति से बचाते हैं।
ट्रैक्टर का विकल्प यह बैल प्रदूषण से बचाएगा, जो खुद खाएगा उसका सौ गुना महत्वपूर्ण कृषि के लिए अमृत गोबर-गोमूत्र प्रदान करेगा। अब तो गोबर बायोगैस के रूप में प्राकृतिक ईधन का भी विकल्प है।
प्रकृति का यह अकाट्य नियम है कि उसके सारे अंग अन्योन्याश्रित हैं। उदाहरण के लिये वृक्ष-वनस्पतियों के लिए प्राणवायु ‘आॅक्सीजन’ बेकार है जिसे वह उत्सर्जित करते हैं और वह जीवधारियों के लिये जीवनदायी है। जीवधारियों के द्वारा उत्पादित कार्बनडाइ आॅक्साइड वनस्पतियों के लिये अपरिहार्य है। ऐसे अनन्त चक्रों की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन चला आ रहा है। इस प्रकार यह एक सिस्टम है और इसी प्रकार कृषि आदि उत्पादन व गाय-बैल भी एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
दूसरी ओर न्यूहेंपशायर यूनिवर्सिटी के काॅम्प्लेक्स सिस्टम्स रिसर्च सेंटर में वर्षों तक किये गए अनुसंधानों का निष्कर्ष है कि जिस गति से प्राकृतिक गैस भण्डारों का दोहन किया जा रहा है ये लगभग 2020 तक समाप्त हो जाएंगे। इन पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भर कृषि उद्योग उसके बाद किस प्रकार चलेगा और इसका एकमात्र विकल्प अन्ततः उक्त गोवंश आधारित कृषि ही है, जिसको धीरे-धीरे अभी से यदि अपनाना प्रारम्भ कर दिया जाए तो मानव हित में श्रेयस्फर होगा।
इस प्रकार यदि आधुनिक मानव पृथ्वी के स्रोतों पर शोषण, लूट-खसोट व बलात्कार करते रहे, उसके संसाधनों का अविवेकपूर्ण व अन्धाधुन्ध दुष्प्रयोग करते रहे तो मानव जीवन का भविष्य वायु प्रदूषण, जल विशाक्तता, भूक्षरण, रेगिस्तानीकरण, अनेक जीवों की विलुप्ति, बाढ़ व बादल फटने जैसे अभिशापों से त्रस्त हो जाएगा।
एक पूर्व ट्रैक्टर चालक जो कि अपनी लगन व श्रम से बाद में अन्तर्राष्ट्रीय गोरक्षण संघ का प्रबंध निदेशक बना तो वह अपने साक्षात्कार में कहता है, ‘‘मैं जब टैªैक्टर चलाता था तो उसके इंजन की गर्जना मेरे कान फोड़ती थी, डीजल की बद्बू दम घोंटती थी, रात को सिर दर्द से फटता था, हड्डी-हड्डी चकनाचूर हो जाती थी तथा मन, मस्तिष्क व आत्मा और शरीर भी कष्ट में डूब जाता था।’’
अन्तर्राष्ट्रीय कृष्ण चेतना के संस्थापक भक्तिवेदान्त ने कहा, ‘‘बैल तो मानवों का पालक है।’’ इस प्रकार आधुनिक ट्रैक्टर टैक्नोलाॅजी कृषि भूमि की शत्रु है। बैल तो धरती के साथ समन्वयपूर्वक धीरे-धीरे कार्य करता है जिसके परिणाम पृथ्वी के लिये कल्याणकारी होते हैं। उसके द्वारा जुती हुई जमीन से उत्पादित खाद्यान्न पौष्टिक होते हैं।