हमारे लेखक

डीमोनेटाइजेशन के बहाने

डीमोनेटाइजेशन के बहाने
राजशेखर पंत, नैनीताल
स्वाभाविक है कि मेरी गाड़ी का नंबर उत्तराखंड का है। गाड़ी की शक्ल-सूरत, मेक वगैरा यह बयाँ करने के लिए काफी है कि यह एक औसत दर्जे के मुलाजिम का निहायत ही जद्दोजहद के बाद, सालों पहले खरीदा गया सामान है।
बरेली के एक डाक्टर से उस दिन ११ बजे का अपाॅइंटमेंट था। साथ में एक रिश्तेदार भी थे जिन्हें ११.३0 पर लखनऊ की कोई ट्रेन पकडनी थी। नैनीताल रोड पर बरेली शहर में उतरने वाले फ्लाईओवर से कुछ पहले, उस जगह पर जिसे कुदसिया कहा जाता है, एक पुलिस वाले ने हाथ देकर गाड़ी को किनारे खड़े करने का संकेत दिया। मुझे अचानक ध्यान आ गया कि हम उत्तर प्रदेश में हैं जो कथित देवभूमि और मित्र-पुलिस की जद से बहार है। ड्राईवर गाड़ी के कागजाद लेकर उस पुलिस वाले के पास चला गया, और पाँच मिनट बाद आकर मुझे बताने लगा कि हमारा पाॅल्यूशन चेक पिछले दिन एक्सपायर हो गया था, उसे रिन्यू कराने का ध्यान नहीं रहा, बाकी के सारे कागजाद ठीक हैं पर पुलिस वाला २000 रुपये मांग रहा है- यह कहते हुए कि इसमें ५000 रुपये की पेनल्टी है। उसने यह भी बताया कि वह गाड़ी के पेपर्स अपने पास रख लेने की धमकी भी दे रहा है और इस स्थिति में हमें पेपर्स कोर्ट से ही मिल पाएंगे।
मुझे मालूम था कि पुलिस वाला पेनल्टी की रकम को बहुत बढ़ा कर बोल रहा है, यह भी कि कागजाद सीज करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। हाँ, मेरी लापरवाही के लिए वह चालान जरूर कर सकता है।
पुलिस वाले ने अपनी मांग को जायज ठहराते हुए २000 रुपये की पेशकश मेरे सामने भी दोहरा दी। मेरे अन्दर का आर्मचेयर आदर्शवादी और अंग्रेजी का लेखक कुलबुलाने लगे। बरेली के एस एस पी का नंबर मेरे पास था ही, शहर से निकलने वाले एक अंग्रेजी दैनिक के दफ्तर में भी कई लोग परिचित थे। कार से उतरते ही पुलिस का नाम सुन कर मैंने आदतन अपने मोबाइल का कैमरा आन कर बातचीत का वीडिओ भी बना लिया था। मैंने घड़ी देखी, ११ बजने में १५ मिनट शेष थे। बेसाख्ता मेरा हाथ हिप पाकेट में रखे पर्स पर चला गया। पाँचसौ रुपये का एक नोट मैंने पुलिस वाले को पकड़ाया। थोड़ी ना-नुकुर के बाद उसने भी उसे जेब के हवाले कर लिया। मेरी गाड़ी अब बरेली शहर की दिशा में थी। उस पुलिस वाले की नजर भी तब तक शायद सड़क पर अनवरत बहते ट्रैफिक पर किसी नए शिकार की तलाश पर टिक चुकी होगी।
मैंने अपने रिश्तेदार महोदय को जंक्शन पर उतार, और डाक्टर के पास ठीक समय पर पहुँच कर प्रिस्क्रिप्शन में जरूरी बदलाव वगैरा कराने के बाद दवाइयाँ खरीदीं। फिर एक अच्छे से रेस्तराँ में खाना खाने के बाद दो चमच रजनीगंधा के साथ चुटकी भर डबल जीरो फाँक कर गाड़ी में बैठ गया। सारे काम वक्त रहते निपटा लेने का परम संतोष मन में था। शहर से पाँच-सात किलोमीटर बाहर निकल कर जब गाड़ी हाईवे पर सरपट भागने लगी तब अचानक ही मुझे वह पुलिस वाला और पाँच सौ का नोट याद आये।
मेरा मन समझाने वाले अंदाज में मुझसे कह रहा था कि मैंने उस पुलिस वाले को रुपये देकर उसे इग्नोर किया है- ‘‘ठीक है यार, तुम ये पाँचसौ पकड़ो, यही तुम्हारी औकात है..।’’-इस अंदाज में खुद के सामने पुलिस वाले को बहुत छोटा, नाचीज सा देखने में एक संतुष्टि का भाव था। मैं मन ही मन कल्पना कर रहा था कि अगर मैंने फर्राटेदार अंग्रेजी में उस पुलिसिये की शिकायत एस एस पी से कर दी होती- एक अंग्रेजी जर्नलिस्ट वाले अंदाज में या फिर उसकी वीडियो क्लिप अखबार के दफ्तर में दे दी होती तो क्या हाल होता बेचारे का... ‘‘क्या इन छोटे-मोटे लोगों के मुँह लगना, अपना ही समय बर्बाद होता है।’’ किसी से अनजाने में हुई गलती के बाद उसे मुआफ या इग्नोर करने के बड़प्पन ने मुझे थोडा ऊँचा उठा दिया था।
रजनीगंधा और तुलसी की एक और डोज खाने के बाद मेरे ज्ञानचक्षु धीरे-धीरे खुलने लगे। मुझे लगने लगा कि वह ‘छोटा’ पुलिस वाला मेरे किताबी आदर्शवाद को नेस्तनाबूत करने की ताकत रखता था। उसने मेरे सारे कपड़े उतार कर दिखा दिया था कि में क्या हूँ- एक कायर, दब्बू और बड़बोला आम-आदमी, जो भीड़ का हिस्सा भर है। उस भीड़ का जो अपनी सुविधा के लिए समाज में फैले भ्रष्टाचार को सहज ही मान्यता प्रदान करती है। सच्चाई यह थी कि अपनी लापरवाही की एवज में थोड़ी बहुत परेशानी भुगतने से आसान रास्ता मेरे लिए पांच सौ रुपये का नोट देकर वहाँ से निकल जाना था। वह पुलिस वाला तो शायद बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं होगा, जब कि मुझे एक प्रबु( नागरिक माना जाता है, जिसका पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया से करीबी रिश्ता है। निश्चित ही समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए मेरे चेतन-अचेतन मन में एक स्वीकार्यता थी। अब ये बात दीगर है कि मेरे अहम् के चलते उसकी अभिव्यक्ति कुछ इस रूप में हुई थी कि- ‘‘मार इस पुलिसिये के मुँह में पाँच सौ का नोट, यही इसकी औकात है।’’ मुझे यह ध्यान बिलकुल नहीं रहा कि ऐसा कर के मैं स्वयं उस भ्रष्ट श्रृंखला का हिस्सा बन रहा हूँ जिसने इस समाज को जकड़ रक्खा है। वास्तव में मुझमें और उस पुलिस वाले में फर्क सिर्फ इतना ही था कि वह पहले से वहाँ पर खड़ा था और में अपनी कार से उतर कर वहाँ पहुँचा था। रहा सवाल हम दोनों की नीयत का तो उसमें शायद ही कहीं कोई फर्क हो। क्या मैं विश्वास से कह सकता हूँ कि उस पुलिस वाले की जगह पर होने की स्थिति में, मैं पाँच सौ रुपये की उगाही नहीं करता?हमारी परिभाषा में सिर्फ पैसे लेने वाला बेईमान होता है। इसी परिभाषा के अनुसार भी चलें तो हम में से ज्यादातर इसलिए ईमानदार हैं क्योंकि हमें बेईमान होने की सहूलियत नहीं मिल पाती। इस घटना के कुछ दिनों बाद की बात है, वृन्दाबन जाते हुए मैंने गाड़ी राया के कुछ आगे एक्सप्रेस-वे के फ्लाईओवर के पास रोकी, चाय पीने के लिए। कुछ पुलिस वाले आते-जाते टेम्पो, पिक-अप, वगैरा को रोक कर अवैध वसूली कर रहे थे। चाय पीते हुए मैंने कुछ तस्वीरें खींच लीं। एक बार फिर मैं शायद यह स्थापित करना चाह रहा था कि मेरे अलावा सारी दुनिया बेईमान है... बहुत ऊपर हूँ मैं उस व्यवस्था से जो सिरे से भ्रष्ट है! जब कि सच्चाई यह थी कि सस्ते किराये के चक्कर में मैं खुद एक ऐसे टैक्सी आॅपरेटर की गाड़ी लेकर जा रहा था जो कि प्राइवेट नंबर की गाड़ियों को टैक्सी की तरह आॅपरेट करता है।
सच्चाई के ठन्डे आइने के सामने हम खुद को नंगा खड़ा देखना नहीं चाहते हैं। शायद. हमें अच्छा लगता है यह सोचना कि प्रधानमंत्री के डीमोनेटाईजेशन जैसे कदम से भ्रष्टाचार, काला-धन रातों-रात खत्म हो जायेगा। अपने अन्दर झाँक कर देखिये कभी, हम खुश हैं, उत्साहित हैं, भ्रष्टाचार के संभावित खात्मे से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि वो जो बहुत कमा चुके हैं आज परेशान हैं। भ्रष्ट आचरण या बेईमानी की कम या ज्यादा जैसी कोई डिग्री नहीं होती। फर्क सिर्फ उस स्थिति का होता है जिसमें आप हैं। गलत तरीके से पाँच सौ कमाने या छिपाने वाला पाँच लाख भी कमाएगा और छिपायेगा, अगर उसे मौका मिला तो।
डीमोनेटाइज होने से ज्यादा क्या हालिया जरूरत एक बार अपने अन्दर झाँकने की नहीं है?और हाँ, कोई मोदी नाटकीय अंदाज में टी वी स्क्रीन पर अवतरित हो कर इस शुरुवात की घोषणा नहीं करेगा, और नाँ ही कोई जेटली जैसी शख्सियत या रिजर्व बैंक जैसी संस्था इसके लिए कोई तारिख या समय मुकर्रर करेंगे। शुरुवात हमें करनी है।