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तीजन बाई - महिला सशक्तिकरण की बुलंद आवाज

तीजन बाई - महिला सशक्तिकरण की बुलंद आवाज
अनिल सिंह भरड़ा, नैनीताल-
वर्तमान दौर में हम महिला सशक्तिकरण की बात मुख्यतः करते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व में समानता के अधिकार के लिए प्रमुख मुद्दा है। ऐसे में भारत वर्ष में अनेक महान महिलाएं व अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इस नये दौर में नये उपकरणों, तकनीकी में प्रवीणता की योग्यता रखते हैं। इस दौर में भारत में छतीसगढ़ राज्य के घनियारी गाव में जन्मी तीजन बाई, जो परधी जनजाति से जुड़ी हैं, पंडवानी लोक नाट्य की पहली महिला कलाकार हैं। पंडवानी एक लोक गीत शैली है जिसमें पांडवों के गीत व कहानियाँ लोक गीत के रूप में सुनाई जाती हैं। इस शैली में महाभारत कथा, भीम की वीरता आदि प्रकार का वर्णन लोक गीत के माध्यम से किया जाता है। छतीसगढ़ से शुरू हुई यह लोक गीत शैली अब मध्य प्रदेश, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश में भी प्रसिद्ध होने लगी है।
तीजन बाई जिन्होंने नयी सोच विकसित कर एक नयी लोक गीत शैली को विकसित किया। तीजन बाई जो आज अनेक महिलाओं, बालिकाओं को पंडवानी सिखाती हैं और इसी पंडवानी की मदद से आदिवासी महिलाओं को जीवन जीने, आत्मनिर्भर होने में भी वह मदद कर रही हैं। किन्तु तीजन बाई का यह सफर आसान न था। वह एक प्रेरणा है सभी के लिए।
तीजन बाई का विवाह बारह वर्ष में हो गया था तथा पंडवानी गाने के कारण उन्हें जनजाति से बाहर कर दिया गया। इसके पश्चात् उन्होंने खुद कुटिया बनाकर संगीतशैली का विकास किया। कई विरोधों व सामाजिक रूढि़यों का सामना कर तीजन बाई खुद सशक्तिकरण का उदाहरण बनीं हैं। आज भी वह देश-विदेश में प्रस्तुति देने जाती हैं। उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड्स 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण प्राप्त हो चुका है। तीजन बाई जैसी महिलाओं के जीवन से हमेशा सीख मिलती है कि समस्याएं चाहे कितनी हों उन्हें पार कर कामयाबी पाई जा सकती है और वे महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त प्रतीक भी हैं।