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दही एक, गुण अनेक

दही एक, गुण अनेक
दधि उष्णं दीपनं स्निग्धं कषायानुरसं गुरू।
पाके अम्लं ग्राहिपित्तास्त्रषोथमेदः कफ प्रदम।।
    दही स्पर्श में ठण्डा परन्तु तासीर में गर्म होने के कारण इसमें अन्र्तविरोध है। यह भारी होता है, परन्तु जठराग्नि प्रदीप्त करने वाला  है। पाचन के बाद अम्ल पैदा करता है। लेकिन कफ करने वाला है। आयुर्वेद में दही की तासीर को गर्म माना गया है। दही का सेवन रात में नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कफ कारक होता है। यदि करना ही है तो नमक ड़ालकर किया जा सकता है। दही अमृत तुल्य है, लेकिन इसके उपयोग में सावधानी जरूरी है, जैसे कि गरम पदार्थ के साथ दही का प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि यह छूने में ठंड़ा है जिसके कारण यह उसके प्रकृति के विरूद्ध है। दही को खाने के शुरू में या मध्य तक खा लेना चाहिये क्योंकि अंत में खाने पर यह कफ कारक होता है। कारण यह है कि भोजन के बाद कफ ज्यादा बनता है और यह कफ की प्रबलता को बढ़ा देता है। सबसे बढि़या दही 6 से 8 घण्टे के बीच का होता है क्योंकि समय के साथ इसकी मिठास व गुण भी बदलते रहते हैं। जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है यह खट्टा व अम्ल कारक व जलन पैदा करने लगता है। छाछ, दही का सर्वश्रेष्ठ रूप है। गाय के दूध का दही सर्वश्रेष्ठ है। दही का भारतीय संस्कृति में, उत्सवों में, मांगलिक कार्याें में बड़ा ही महत्व है।
一    दही आँतों की बीमारीयों में अत्यधिक लाभदायक होता हैै।
一    दही शहद के साथ चटाने से बच्चों के दाँत आने में होने वाली तकलीफ कम हो जाती है।
一    दही शरीर की चर्बी कम करने में भी मदद करता है। विशेषकर गाय के दूध का दही।
一    दही में बादाम, किशमिश व छुहारा मिलाकर सेवन करने से वजन बढ़ता है।
一    नींद न की आने परेशानी को दही व छाछ का सेवन कम करता है।
一    बालों को रूसी से बचाने में दही बेहद कारगार उपाय के रूप मेें प्रयुक्त किया जाता है।
一    दही व बेसन को मिलाकर स्नान करने से शरीर की दुर्गंध में लाभ होता है।
一    सर्दी, खाँसी, अस्थमा, बुखार के रोगियों को इसके प्रयोग से बचना चाहिये।
一    दही आँत में आवश्यक व महत्वपूर्ण तत्वों को अवशोषित करने में सहायता करता है।
一    दही शरीर में कोलोस्ट्रोल को कम करने में मदद करता है।
一    दही सिर्फ एक खाद्य पदार्थ की नहीं अपितु एक औषधि भी है।