विचार विमर्श

देश बड़ा या विश्वविद्यालय

देश बड़ा या विश्वविद्यालय

कुमार राकेश, नई दिल्ली-
भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़े छात्रसंघ के नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से इस प्रबुद्ध कहे जाने वाले संस्थान की गरिमा पर जो बट्टा लगा है, वह शर्मनाक है। आम लोगों की नजरों में इस विश्वविद्याल की साख गिरी है। आने वाले दिनों में इसके कई प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। इस माहौल के जिम्मेदार अन्य लोगों के खिलाफ भी केन्द्र सरकार को कड़ी कारवाई करते हुए कठोर दंड भी दिया जाना चाहिए। ये हमारे देश का मसला है। विदेश के विश्वविद्यालयों को इस मसले पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप का मामला नहीं बनता। कोई कुछ भी कहे, पर इस मसले पर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का बयान काबिलेगौर है। राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत ऐसी ही भावना सभी दलों के नेताओं की भी होनी चाहिए। राजनीति देश हित में होनी चाहिए न कि स्वहित या पार्टी हित में। हमें पता है राष्ट्र सर्वोपरि है और सदैव रहेगा। दूसरी तरफ कांग्रेस ओर वाम दलों के नेताओं के बयान राजनीतिक दुर्भावनाओं से युक्त हैं, जो कि सब समझ से परे है।
25 वर्ष पहले और आज के जेनयु में काफी अंतर है। वैसे पहले भी यह विश्वविद्यालय अतिवाद का गढ़ था और आज भी है। पर पहले जो एक खुला माहौल था, नैतिकता थी, परस्पर विरोधी विचारों के बावजूद रिश्तों की जो बुनावट थी, वो अब खत्म हो गयी लगती है। मेरा मानना है कि शिक्षण संस्थानों को राजनीति की परिधि से मुक्त होना चाहिए। उसके स्थान पर ज्ञान, विज्ञान और राष्ट्र के सम्मान की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।
जहाँ तक भारत की बात है अपना ये देश सदा से सर्वश्रेष्ठ था, है और रहेगा। इस देश की संस्कृति , बनावट और बुनावट ही ऐसी है, जो अटूट है, एकल है और एक दूसरे से गुथे हुए है। वाद-विचार, राजनीति दल, मतभिन्नता की अपनी-अपनी सीमायें हैं, परिधियाँ हैं, पैमाने हैं, पर राष्ट्रद्रोह के लिए किसी को भी नहीं बख्शा जाना चाहिए। चाहे वे देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ही क्यों न हों। मेरे विचार से राष्ट्र से बड़ा कोई नहीं। सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म है। लेकिन सबसे चिंता की बात यह है कि कुछ प्रबुद्ध  कहे जाने वाले लोगों के कुछ तथाकथित गैंग ने देश की राजनीति को कई तथाकथित मीडिया घरानों की मदद से अपने-अपने निहित स्वार्थों की वजह से जकड़ रखा है। ऐसा कई बार देखने में आया है कि किसी झूठे वाक्ये को सच दिखाकर, बताकर झूठ का महिमामंडन कर उस सफेद झूठ को सच साबित करने की कोशिश की जाती है।
मेरे विचार से इस देश में स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी कुछ भी बोलने या करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। भारत कई मामलों में कई देशों की तुलना में जरूरत से ज्यादा सहिष्णु है। ये देखने और समझने योग्य बातें हैं कि उधार लिए गए विचार और मुद्रा दोनों ही व्यक्ति, संस्थान के लिए हानिकारक होते हैं जो अपने आप में पूर्ण तथ्य हैं।
पिछले 25 वर्षाें में मैंने कई देशों की यात्रायें की हैं। हर देश की अपने भारत से तुलना करके अपने देश को बेहतर देखने और समझने की कोशिश की। तुलनात्मक अध्ययन भी किया। उन अनुभवों के परिपेक्ष्य में मेरा दावा है कि अपने देश भारत के पास सब कुछ है सिवाय एक ठोस और क्रूर व्यवस्था के। जिसकी सख्त जरूरत है। हमें तभी राष्ट्रद्रोह की भावना रखने वाले तत्वों का उचित उपचार सम्भव हो सकता है।
हम कई मामलों में अमेरिकी, यूरोपीय, मध्य अरब और राष्ट्र मंडल के कई देशों से भी बेहतर हैं। हमारे पास अनेकता में एकता के कई जीवंत प्रमाण हैं। अद्भुत संस्कृति है जो कई देशों में नहीें है। सब कुछ होते हुए उन ओछे विचार वालों की वजह से हम प्रगतिशील ही कहला रहे हैं, जबकि उनके पास कई अभाव हैं फिर भी वे हमसे आगे हैं।
अपने देश में ये विडम्बना है कि कोई भी यदि राष्ट्रवाद की बात करता है तो हमारे कम्युनिस्ट विचार वाले मित्र सीधा उन लागों को भाजपा या संघ का एजेंट बताकर आरोपित करने की असफल कोशिश करते हैं क्योंकि उनका एक बहुत बड़ा गैंग है। इसलिए वे कई बार एक हद तक अपने को दोषी बताने से नहीं चूकते। ये देखने और समझने की बात है जो वामपंथी विचार अपने उद्गम स्थल जर्मनी और रूस में नहीं टिक पाया नहीं चल पाया। उसे हमारे देश में चंद मुठ्ठी भर लोग मीडिया और अन्य प्रचार-संचार माध्यमों की मदद से जिंदा रखने की अथक कोशिश कर रहे हैं। ये भारत जैसे विश्व गुरू रहे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।
मैंने कार्ल माक्र्स की ‘रामायण’ कही जाने वाली ‘दास कैपिटल’ दो बार पढ़ी। मेरे विचार से वह ग्रन्थ भारत के लिए तो नहीं लिखी गयी। उस ग्रन्थ में इग्लैण्ड, फ्रांस और जर्मनी के कई वादों-विचारों का सम्मिश्रण है। आज देखें तो वे सभी देश भारत की तरफ देख रहे हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कहते हैं-आने वाले दिनों में कोई भारतीय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सभागार में 198 सदस्य देशों के बीच जर्मनी की मुखिया मैडम मर्केल सिर्फ भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ही मिलती हैं और हाथ मिलाती हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति श्री ओलांद पहली बाद अपनी सेना की एक इकाई के साथ भारत में गणतंत्र दिवस मनाते हैं।
फिर भी माक्र्स जैसे सच्चे विद्वान के नकली शिष्यों को भारत जैसा अतुलनीय देश में कई प्रकार की खामियां नजर आ रही हैं क्यों? ये एक बड़ा सवाल है। पिछले 25 वर्षाें में भारत जैसे देश की जनता ने उन ढपोरशंखियों को उनकी औकात का एहसास जरूर करवा दिया। आज की स्थिति में वामपंथ की दशा और दिशा किसी से छुपी नहीं है। देश में कुल मिलाकर डेढ़ राज्यों में उनकी पकड़ बच गयी है जो अंतिम सांसे गिन रही है।
यही बात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की है। यह संस्थान वामपंथ का अभेद्य किला कहा जाता रहा है। जिसे देखा स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा विद्वान बताते नहीं थकता। क्योंकि वह जेएनयु का छात्र है। पर आने वाले दिनों में लोगों को इस विश्वविद्यालय का नाम बताने के पहले कई बार सोचना पड़ेगा। भला दो मुँही नीति कब तक चलेगी, नहीं चल सकती। कहा जाता है कि जेएनयु के ज्यादातर छात्रों को यथार्थ से दूर रखा जाता है या तथाकथित विचारों की वजह से दूर रखने की कोशिश की जाती है। उस उपक्रम में कई शिक्षकों की विशेष भूमिका बताई जा रही है। इसलिए देश के इस अनुपम विश्वविद्यालय का ये हश्र हो रहा है। भारत में सहनशीलता और अहनशीलता के नाम पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार वापस करने वाले वे साहित्यकार आज कहाँ हैं।
सोशल मीडिया में चलाये जा रहे कुछ तथ्यों पर नजर डालने के दौरान कुछ नए खुलासे सामने आये हैं। जेएनयु में फीस, हाॅस्टल चार्ज, खाना, पठन-पाठन अन्य सभी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी कम है। सालाना करीब 400 रूपये मात्र प्रति छात्र। है न एक झटका देने वाला तथ्य पर उन छात्रों का राष्ट्र के प्रति कोई महत्वपूर्ण योगदान आज तक किसी के सामने आया है? राष्ट्र निर्माण के नाम पर दलगल राजनीति क्यों?
जेएनयु में छात्र और शिक्षक का प्रतिशत भी तुलनात्मक तौर पर सबसे बड़ा है। फिर भी तथाकथित तौर पर इस महान संस्थान के छात्र और शिक्षक सिर्फ भाजपा सरकार को ही नहीं बल्कि पिछली सरकारों को भी पानी पी पी कर कोसने से नहीं अघाते रहे हैं। ये भी भारत हित में अपने आप में एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंता व चिंतन का मुददा है।