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धन सिंह घरिया: पेड़ वाले गुरू जी की अनूठी मुहिम!

गाँव, स्कूल, तीर्थ स्थलों, और बुग्यालों में दे रहे हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश।
संजय चैहान, चमोली

1974 में गौरा देवी के नेतृत्व में चले ‘चिपको आन्दोलन’ की सफलता पूरे विश्व में एक मिसाल बन कर चर्चा में रही। चिपको की सफलता की कहानी तब घर-घर में हर रोज सुनी जाती थी। उसके ठीक 6 महीने बाद 10 अगस्त 1974 को बैकुंठ धाम बद्रीनाथ के समीप बसे गाँव बेनाकुली, धनतोली में श्रीमती पुन्नी देवी और दलीप सिंह घरिया के घर एक बालक ने जन्म लिया। माता-पिता ने अपने इस बालक का नाम गाँव के नाम धनतोली से धन सिंह घरिया रखा। बचपन से ही धन सिंह ने चिपको आन्दोलन के बारे में घर से लेकर गाँव तक हर किसी से सुना। हर रोज चिपको और गौरा के बारे में सुनने से इसका धन सिंह के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
धन सिंह ने प्रारंभिक से लेकर 5 तक की शिक्षा बेनाकुली घनतोली से और 6 से लेकर स्नातक तक की शिक्षा गोपेश्वर से ग्रहण की। बाद में परास्नातक और बीएड की डिग्री बड़ौत, मेरठ से ली और 1993 में बतौर प्राथमिक शिक्षक सरकारी सेवा में आ गये। 1994 में इनका चयन सहायक अध्यापक (एलटी) और 1995 में प्रवक्ता पद (नागरिकशास्त्र) हेतु हुआ। वर्तमान में ये चमोली जनपद के पोखरी ब्लाॅक के दूरस्थ विद्यालय राजकीय इंटर काॅलेज गोदली में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं।
बचपन से ही इन्हें पेड़ों से खासा लगाव था। साथ ही इन्हें साफ-सफाई बेहद पसंद थी। इसलिये जहाँ भी इन्हें गंदगी दिखाई देती वहाँ तत्काल साफ-सफाई में जुट जाते। गर्मियों की छुट्टियों में वे अक्सर बैकुंठ धाम जाया करते थे। वहाँ पर इधर-उधर बिखरे पड़े पॅालीथिनों से इन्हें बेहद दुःख होता था। इसलिए वे बैकुंठ धाम पहुँचकर बिखरे पाॅलीथिनों को एकत्रित करके साफ-सफाई करते। पढ़ाई के दौरान भी वो अक्सर विद्यालय में सफाई अभियान चलाते। समय की कमी के कारण वे इसे ज्यादा व्यापक रूप नहीं दे सके। लेकिन जब उनका चयन 1996 में प्रवक्ता पद के लिए हुआ तब से उन्होंने इसे ब्यापक स्तर पर शुरू कर दिया।
धन सिंह घरिया विगत 10 बरसों से सामाजिक पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। इस दौरान इन्हांेने विभिन्न स्थानों पर तीस हजार से अधिक पेड़ लगाए हैं। साथ ही तीर्थ स्थलों और पर्यटक स्थलों में पाॅलीथिन उन्मूलन कार्यक्रमों के जरिये स्वच्छता अभियान भी चलाया और तृतीय केदार तुंगनाथ में दुर्लभ प्रजाति के भोज पत्र का भी रोपण किया। इन्होने विभिन्न गाँवांे, जलस्रोतों, गाड़-गधैरों में लोगों के साथ मिलकर सफाई अभियान भी चलाया। नंदा राजजात यात्रा 2014 की समाप्ति के बाद इन्हांेने बेदनी बुग्याल में खुद के पैंसों से 15 कुंतल कचरा एकत्रित करके स्वच्छता अभियान चलाया। इसके अलावा तुंगनाथ से लेकर बद्रीनाथ में भी सफाई अभियान अनवरत रूप से चलाते रहतें हैं। जब भी ये किसी जंगल में आग लगी हुई देखते हैं तो बेहद दुःखी होते हैं और खुद चले जातें है आग बुझाने।
धन सिंह घरिया ने गोदली विद्यालय में 50 से अधिक विभिन्न प्रजाति के पेड़ों को लगाकर एक मिश्रित वन तैयार किया है। अवकाश के समय वे इसकी देखभाल किया करते हैं। वहीं इन्हांेने 6 किमी. लम्बी मसोली-कलसीर सड़क मार्ग के किनारे थुनेर, अंगू, पांगर, देवदार, सुरई, टेमरू के पेड़ लगाए हैं, ताकि आने वाले समय में ये पेड़ भूस्खलन रोकने में मदद कर सकें। पर्यावरण संतुलित रहे और लोगों को इसका फायदा मिले।
पर्यावरण गतिविधियों के साथ ये सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए हैं। ये बेसहारा बच्चों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं हैं। अभी तक ये अपने वेतन से 199 जरूरतमंद बच्चों की मदद कर चुके हैं। यह मदद स्कूल ड्रेस से लेकर फीस, काॅपी, किताब, पेन, बिस्तर, बर्तन इत्यादि के रूप में शामिल है।
पेड़ों वाले गुरु जी कहते हैं कि तीर्थ स्थलों की स्वच्छता बढ़ने से लोगों का विश्वास भी इन स्थानों पर बढ़ेगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि सामाजिक पर्यावरण कैसे स्वच्छ हो। गाँवों से लेकर मठ-मंदिरों में हरियाली और स्वच्छता होगी तो पर्यावरण अपने आप संतुलित होगा। मैं चाहता हूँ कि हमारे बुग्याल, धार्मिक स्थल, पर्यटन केंद्र पाॅलीथिन मुक्त हों, जिससे इनकी गरिमा भी बनी रहे और वातावरण भी स्वच्छ रहे। इसलिए ऐसे स्थानों पर सरकार को पाॅलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। जंगल के बहाने जंग छेड़ दी थी जिस साक्षात गौरा ने, जिनका अपना कोई स्वार्थ न था। फिर भी वह दुनिया को प्रकृति के प्रति गौर करने को मजबूर कर गयी। और दुनिया को अंग्वाल/चिपको का जादुई मंत्र दे गयी। आज हम सब कुछ जानते हुए भी प्रकृति के प्रति संवेदनशील क्यों नहीं हंै। कुछ तो सीख लेनी पड़ेगी हमें गौरा के अंग्वाल/चिपको आंदोलन से।
वास्तव में अगर देखा जाय तो इनके कार्यों का वर्णन करने के लिए शायद शब्द ही कम पड़ जायें। आखर के साथ पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रहे पेड़ों वाले गुरू जी धन सिंह नेगी का कार्य अनुकरणीय है। साथ ही अन्य लोगों के लिए एक मिसाल भी।