संस्कृति

धर्म एवम् धर्म-निरपेक्षता (सेक्युलरिज्म)

धर्म एवम् धर्म-निरपेक्षता (सेक्युलरिज्म)
डी॰एस॰ कोटलिया, नैनीताल -

भारतवर्ष एक धर्म-निरपेक्ष देश है।’ इस बात पर हम सबको गर्व होता है। वस्तुतः ‘धर्म-निरपेक्ष’ शब्द अनुपयुक्त ही नहीं वरन् अस्पष्ट व भ्रामक है। जो कुछ भी मनुष्य के लिए कल्याणकारी हो वह सब ‘धर्म’ शब्द में अंतर्भूत है। अहिंसा, सत्य, परोपकार, लोकसंग्रह-भावना, यह सभी धर्मरूपी रत्न के अलग-अलग पहलू हैं। उपासना धर्म के अंगों में से एक है, धर्म का सर्वस्व नहीं। कठिनाई यह है कि संस्कृत में ‘मज़हब’ या ‘Religion’ के लिए कोई उपयुक्त पर्यायवाची शब्द नहीं है। इसीलिये धर्म शब्द की छीछालेदर की जाती रही है और उसे मज़हब और त्मसपहपवद का पर्याय बना दिया गया है।
धर्म एक व्यापक व शाश्वत शब्द है। यह न तो व्यक्ति को किसी पंथ, संप्रदाय, मत, विश्वास या जीवनयापन की किसी परम्परा या पद्धति से जोड़ता है और न ही किसी के समक्ष इस प्रकार की कोई बाध्यता उत्पन्न करता है। इसका सम्बन्ध मनुष्य के कर्तव्यों, जीवन के उद्देश्य तथा उसकी प्राप्ति के उपायों से है। मनुष्य नामक प्राणी के कर्तव्यों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। मनुष्य के अध्ययन, चिंतन व शोध का क्षेत्र सामान्य व उच्च पदस्थित मनुष्यों व देवगणों से लेकर मिट्टी में रहने वाले छोटे से छोटे कीड़े तक, प्राणधारियों से लेकर जड़ पदार्थों तक, निज-स्थान से लेकर पृथ्वी के अंतिम छोर तक, वातावरण से लेकर पृथ्वी के गर्भ तक, चंद्रमा से लेकर सौर-मण्डल व उससे आगे समस्त ब्रह्माण्ड तक, ब्रह्मांड के समस्त घटनाक्रमों के कारण-प्रभावों के अतिरिक्त आत्मा, प्रकृति एवम् ईश्वर के अध्ययन तक विस्तार ले चुका है। यद्यपि यह तो स्पष्ट नहीं है कि प्रकृति की व्यवस्था में मनुष्य के हस्तक्षेप तथा उसकी कल्पना और बौद्धिक-तार्किक शक्ति के प्रयोग की कोई सीमा निर्धारित की गई है अथवा नहीं, परन्तु धर्म में निश्चित रूप से अनेक नैतिक सीमाएं अर्थात् मर्यादाएं प्रतिपादित की गई हैं। यह एक अलग बात है कि व्यावहारिक रूप से मनुष्य द्वारा इन सीमाओं या मर्यादाओं को कितनी मान्यता दी जाती है। धर्म का कार्य है कि वह हमारे दायित्व के सभी पक्षों को विकास की स्वतंत्रता प्रदान करे। स्वतंत्रता का अर्थ है हर व्यक्ति को आत्मविकास के लिए अपने स्वभाव एवं धर्म के अनुसार अवसर प्रदान करना।
जब हम ‘निरपेक्षता’ की बात करते हैं तो संभवतः उसका सम्बन्ध ‘धर्म’ से न होकर पंथ, सम्प्रदाय, मत, सिद्धांत, मान्यता, विश्वास या जीवनयापन की किसी विधि या पद्धति आदि का चयन अथवा अनुकरण करने की स्वतंत्रता से होता है। हम देखते हैं धर्म के अध्ययन में मुख्यतः प्रचलित सम्प्रदायों, मतों अथवा पंथों के तीन अंगों पर चर्चा होती है,-(अ) दार्शनिक भाग - इसमें धर्म का सूक्ष्म विषय अर्थात् मूल-तत्व, उद्देश्य तथा उसकी प्राप्ति के साधन निहित होते हैं, (ब) पौराणिक भाग - जो स्थूल उदाहरणों के द्वारा दार्शनिक भाग को स्पष्ट करता है, इसमें मनुष्यों व अलौकिक पुरुषों के जीवन के आख्यान आदि होते हैं, (स) आनुष्ठानिक भाग - इसमें पूजा-पद्धतियाँ, आचार, अनुष्ठान, विविध शारीरिक अंग-विन्यास व इन्द्रियग्राह्य वस्तुएं हैं - इन सबको मिलाकर आनुष्ठानिक धर्म संगठन होता है। विश्व के सभी समाजों में अधिकांशतः आनुष्ठानिक भाग प्रचलन में रहता है, कुछ समाज पौराणिक भाग को कुछ महत्त्व देते हैं। परन्तु दार्शनिक भाग, जिसमें धर्म के सूक्ष्मतम तत्वों का समावेश होता है, जिसका ज्ञान होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, की अवहेलना की जाती है। यही कारण है कि विभिन्न धर्मावलम्बियों में धर्म की मूल-भावना, उद्देश्य आदि के प्रति अनभिज्ञता होती है और वे धर्म के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्त धारणाओं को पोषण देते रहते हैं।
यह एक महत्वपूर्ण व अविस्मरणीय तथ्य है कि मनुष्य, प्रद्धति एवम् ईश्वर - तीनों में मनुष्य ही वह तत्व है जो प्रत्यक्ष रूप से जीवन के विभिन्न आयामों पर चिंतन व शोध करता है। यदि हम प्रकृति की योजना या ईश्वर की इच्छा की बात करें तो उसे संसार के द्वारा व्यवहार में लाने योग्य बनाने हेतु उनकी व्याख्या करने का कार्य भी मनुष्य के द्वारा ही सम्पादित किया जाता है। चूँकि ‘ईश्वर या प्रद्धति की अपेक्षा’ मनुष्य के माध्यम से ही व्यक्त होती है, अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ईश्वर के बाद मनुष्य का स्थान है अर्थात मनुष्य सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति है, जिसकी पृष्ठभूमि में ईश्वर का एक विशिष्ट प्रयोजन है। निष्कर्ष यह कि मानवता ही वास्तविक धर्म है, जो मानव के रूप में जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव के द्वारा स्वतः धारित है। दूसरे शब्दों में मनुष्य के समक्ष धर्म के चुनाव का न कोई विकल्प है और न ही बाध्यता। धर्म के नाम पर हम जिसका चुनाव करते हैं अथवा जो हमें जन्म के साथ विरासत में मिलता है वह तो केवल जीवनयापन की कोई विशेष पद्धति, आदर्श, वैचारिक सिद्धांत, विश्वास, मान्यता, पंथ या सम्प्रदाय आदि हैं। इस दृष्टि से भी ‘धर्म-निरपेक्षता’ की अवधारणा अतार्किक व आधारहीन है। प्रश्न यह है कि भारतवर्ष जैसा उच्च आध्यात्मिक चिंतन एवं सार्वभौम आदर्शों वाला देश ‘धार्मिक-निरपेक्षता’ जैसी निर्मूल अवधारणा को कैसे स्वीकार कर सकता है। हम यदि वास्तविक निरपेक्षता व स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो उचित होगा कि हम मज़हब शब्द को अपना लें। वैसे भी हमारी भाषा में अरबी और फारसी के कई तत्सम् और तद्भव शब्द हैं। और फिर यह कहना कि हमारे देश की व्यवस्था ‘मज़हब-निरपेक्ष है’ ज्यादा तथ्यपरक व स्पष्ट लगेगाय इसमें शब्दों का यथार्थ प्रयोग होगा तथा साथ ही हम ‘धर्म’ जैसे श्रेष्ठ उद्देश्य व व्यापक अर्थों वाले एवं जीवन की सार्थकता का मार्ग प्रशस्त करने वाले शब्द के दुरूपयोग के दोष से अपना बचाव कर सकेंगे।
संसार भर में ‘धर्म-निरपेक्षता’ व ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर फैली (या फैलाई जा रही) भ्रान्ति को दूर किया जाना आवश्यक है। मानवता को क्षेत्र, जाति, मत, संप्रदाय, मान्यताओं, रंग-रूप और लिंग की संकुचित सीमाओं को तोड़कर एक आध्यात्मिक सूत्र में बंधना होगा, क्योंकि अध्यात्म मनुष्य की आत्मा में श्रद्धा उत्पन्न करता है। पशुता से मानवता (धर्म) के स्तर पर मनुष्य का आरोहण इस बात का संकेत है कि मनुष्य प्राणिक मानदंड की सर्वोत्तम ऊंचाई पर है, और प्रारंभ से ही ऊंचाई पर होने और चेतना के उच्चतर आयामों तक निरंतर उठते जाने का तथ्य इस बात का प्रमाण है कि विकास क्रम में मानव अपने तीसरे चरण अर्थात् ‘अतिमानव’ पर आरोहण करने की ओर अग्रसर है। यही धर्म का वह सूक्ष्म मूल-तत्व है, मानव जीवन का उद्देश्य है।