विचार विमर्श

नदियों का महत्व जब ये बचेगी तो सब बचेगा

नदियों का महत्व जब ये बचेगी तो सब बचेगा
कई और सरस्वती जैसी नदियाँ लुप्त होने की कगार पर-
जिस तरह सदा बहार नदियाँ बरसाती नदी में तब्दील होती जा रही है। एक दिन यह भी इतिहास बन जाएगी और इनके किनारे हम जिस सभ्यता का दम भरते हैं, वह किताबों में यह कहकर अपना स्थान बना लेंगी कि यहाँ भी कोई सभ्यता हुआ करती थी। विज्ञान और तकनीकी का प्रयोग जिस तेजी से पृथ्वी के गर्भ से जल निकालने के लिए हो रहा है, यदि वह इस प्राकृतिक जल स्रोतों को जीवित रखने में भी हो और विज्ञान, तकनीकी, संरक्षण व जागरूकता के द्वारा इनके अस्तित्व को बनाने रखा जाय तो जिन नदियों पर अपने उद्गम पर ही विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है जो कि किसी बड़ी नदी की सहायक नदी हुआ करती थी या हैं, आज स्वयं के लिये संघर्ष कर रही है। नहीं तो एक दिन सरस्वती नदी की तरह सुर्खिया तो बटोर लेगीं ये नदियां, लेकिन जल नहीं बटोर सकेंगी।
भारतीय संस्कृति में नदियाँ सदा ही जीवनदायनी की तरह पूज्यनीय रही है। इन जीवनदायनी नदियों का महत्व सभी को समझना बेहद जरूरी है। कोई भी देश, राज्य, गाँव, शहर बिना जल के महत्व के किसी भी प्रकार का सफर तय नहीं कर सकता। कई सरकारों ने नदियों की सुरक्षा की बात कही तो है लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है और हमारा अधिकार केवल इनका उपभोग करना। यह सभी नदियाँ हमारे शरीर की धमनियों की भाँति कार्य करती हैं और इनका इस तरह से शिथिल हो जाना निश्चय ही कई सभ्यताओं और संस्कृतियों की मृत्यु का संकेत है। करोड़ों मनुष्यों को पोषण देने वाली जैव विविधता के साथ भौगोलिक क्षेत्र बदलते ही एक नये वातावरण का निर्माण करने वाली नदियों को सिर्फ मनुष्य का ही नहीं सभी जीव-जन्तु, पौधों का अधिकार है इन लाखों करोड़ों लोगों को पालने वाली नदियों में कूड़ा-कचरा, सीवर, औद्योगिक कचरा ना जाने क्या-क्या डाला जा रहा है। आज के समय में इन नदियों की इस दशा और उसमें हमारी भागीदारी कहीं ना कहीं थोड़ी या ज्यादा, मगर है जरूर।
आज नदियों की दुर्दशा के कारण खेती खतरे में पड़ रही है। जो नदियों में कभी जहाज चलते थे, आज वहाँ नाव चलने का भी रास्ता नहीं है। कहीं भी किसी भी बड़ी नदी की बात कीजिए, उसकी दुर्दशा का कोई ना कोई कहीं ना कही बिगड़ा स्वरूप दिखाई देता है।
नदियाँ का धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और ना जाने क्या-क्या महत्व है। देवताओं का, पित्रों का, यक्ष, गन्धर्वों को तिलांजलि इन नदियों के माध्यम से दी और इनको तारा। इन नदियों को कौन तारेगा जब तक अपने उद्गम स्थान से विसर्जन के स्थान तक इन्हें सम्मान नहीं मिलेगा। स्वच्छ जल इन नदियों का वस्त्र है और जब तक इनके वस्त्र स्वच्छ नहीं होंगे कोई भी सभ्यता सभ्य सभ्यता नहीं कहला सकती है। नदियों का अस्तित्व  बनाये रखना कोई मजाक नहीं है। ये ना हो कि नदियों के साथ मजाक करते-करते मानव सभ्यता कब मजाक बन जाये हमें पता ही नहीं चले। ये नदी नाले, तालाब, सब एक दूसरे को पोषण देते हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। मानव ने सदा ही स्वयं को सभ्य कहा है पर प्रमाण देने में शायद सफल नहीं हो पाया। क्योंकि प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या और जो हो रहा है वही सम्यता की परिभाषा है तो पता नहीं?