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नदियों पर अंतर्राष्ट्रीय दिवस

नदियों पर अंतर्राष्ट्रीय दिवस
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
बांधों के विरुद्ध तथा नदियों, जल और जीवन को लेकर होने वाले अंतर्राष्ट्रीय दिवस को कूर्टिबा, ब्राजील में बांधों से प्रभावित लोगों ने पहली अंतर्राष्ट्रीय बैठक के दौरान अपनाया था। 20 देशों के प्रतिनिधियों ने यह निर्णय लिया कि यह अंतर्राष्ट्रीय दिवस ब्राजील में 14 मार्च को मनाये जाने वाले बड़े बांधों के विरुद्ध  वाले दिवस पर मनाया जाये। इस अंतरर्राष्ट्रीय कार्यक्रम का उद्देश्य विनाशकारी जल विकास परियोजनाओं के विरुद्ध, जलागम के स्वास्थ्य का पुनर्जीवन करना एवं नदियों के न्यायसंगत और सतत प्रबंधन को लेकर एक सुर में लोगों की आवाज उठाना है। प्रत्येक वर्ष 14 मार्च के दिन विश्व भर से हजारों लोग विश्व की नदियों की रक्षा और जिन लोगों ने उन्हें बचाने के लिए संघर्ष किया उनको श्रद्धांजली  अर्पित करते हैं। भवाली से सामाजिक कार्यकर्ता आशा गौड़ शर्मा कहती हैं, ”विश्व में ऐसे लोग भी रहते हैं जो नदियों को प्रदूषण और कंपनियों के नियंत्रण से बचाने के लिए कार्य कर रहे हैं। अपनी कहानियों को बताते हुए हम स्वस्थ और जीवंत नदियों के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित करने का प्रयास करते हैं।” समूह के सदस्य शिवांशु जोशी जोड़ते हुए कहते हैं, ”एक स्वर में बोलते हुए हम प्रभावशाली संदेश भेज सकते हैं। जिसके फलस्वरूप एक समुदाय के रूप में साझा मंच पर आते हुए भी हम श्यता, शक्ति एवं आशा को बढ़ा सकते है ।”
भारतीय हिमालय, जहाँ के विद्यमान हिमनद कई नदियों के स्रोत हैं, विकट स्थिति का सामना कर रहे हैं। हिमालय, जिसे एशिया का जल भंडार भी कहा जाता है, में हिमनदों  का पिघलना शुरू हो गया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार के अनुसार, ”हिमालय में कुल 34,919 हिमनद हैं जो 75,779 वर्ग क्षेत्रफल में फैले हैं। इनमें से 248 हिमनदों का पिघलना शुरू हो गया है।” उत्तराखंड में भी स्थिति समान ही है। यहाँ कुल 162 हिमनद हैं जिनमें से मिलम, पिंडारी एवं गंगोत्री हिमनद आदि जैसे हिमनद भी पिघलने लग गए हैं। गंगोत्री हिमनद हिमालय में सबसे बड़े हिमनदों में से एक है। यह 30.2 किलोमीटर लम्बा तथा 0.5-2.5 किलोमीटर चैड़ा है। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र के तापमान में औसत वृद्धि  0.5 से 0.9 डिग्री सेल्सियस रही है। नतीजन हिमनदों के पिघलने से आने वाले समय में भारत की प्रमुख नदियाँ को अपनी स्थिति बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
उत्तराखंड या मध्य हिमालय भारतीय-गंगा के मैदानी क्षेत्र का जलग्रहण क्षेत्र है, जहाँ भारत की 40 प्रतिशत से अधिक की आबादी निवास करती है। इसे उत्तरी भारत के जल भंडार के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ जो कुछ घटित होता है उसका प्रभाव सीधे नदी के अंतिम छोर में स्थित बांग्लादेश पर भी पड़ता है। पृथ्वी नीति संस्थान, संयुक्त राज्य अमेरिका के लेस्टर ब्राउन के अनुसार, ”हिमालय में हिमनदों के पिघलने से गंगा नदी एक मौसमी नदी बन गर्मियों के मौसम में सूख जाया करेगी। यह विकट समस्या अकल्पनीय भोजन की कमी को जन्म देगी क्योंकि सूखे मौसम के दौरान मैदानों में कृषि  व्यवस्था नदियों पर ही निर्भर रहती हैं। ”जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाली इस सिंचाई व्यवस्था से लड़ना एक गंभीर विषय है क्योंकि इससे भारतीय-गंगा के मैदान और अन्य क्षेत्रों में फसल क्षेत्र और घट जाएंगे।
गंगा की साफ-सफाई सरकार की प्राथमिकता रहती है, लेकिन नदी का स्रोत स्थल पर्यावरण समुदाय के क्षेत्र में नहीं आता है। यह कई बार कहा गया है कि हरिद्वार और उत्तराखंड के अन्य नदियों के क्षेत्र में होने वाले अवैध खनन नदियों की पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसी तरह गंगा की सहायक नदियों की सफाई की गति भी धीमी पड़ गयी है। इन प्रदूषित नदियों का दूषित पानी भी गंगा को प्रदूषित कर रहा है। क्षिप्रा नदी के पुनरुद्धार हेतु लड़ रहे जगदीश नेगी दृढ़ता से कहते हैं, ”कारखाने अपना दूषित जल नदियों में डाल रहे हैं जिसकी वजह से वे बुरी तरह दूषित हो रही हैं। कारखानों के समीप और रामगंगा, कोसी, बहल्ला आदि नदियों के तट के निकट बसने वाले लोग यह आरोप लगाते हैं कि प्रदूषित नदियों के कारण कृषि  उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आई है तथा आंख, त्वचा, पेट और साँस की समस्याओं से भी उन्हें जूझना पड़ रहा है।” वहीं वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहा है।
आज उत्तराखंड नदियों और उनकी घाटियों पर बनने वाले अत्यधिक बांधों से त्रस्त हो गया है, जिसे रोकना बहुत आवश्यक है। राज्य में आठ बांध एवं 86 जल विद्युत परियोजनाएं हैं। उनमें से अधिकांश गंगा नदी घाटी में हैं। उनका एक साथ होने वाला प्रभाव बहुत प्रलयंकारी है जिसने खतरे को बढ़ाया ही है, इस विभीषिका का अंदाज उत्तराखंड की 2013 की पैशाचिक आपदाओं द्वारा लगाया जा सकता है। 16 और 17 जून 2013 में हुई आपदा के दौरान विष्णु प्रयाग जल विद्युत परियोजना के कारण भी एकाएक बाढ़ आ गयी थी। लोगों में इन खतरों को लेकर काफी जागरूकता है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति ही कमी का कारण बन रही है।