दिशा तथा दशा

नेता जी का जूता

नेता जी का जूता
कान्हा जोशी, बक्शीखोला, अल्मोड़ा -

मित्रो! शादियों का समय है। मोहल्ले में धड़ाधड़ शादियां हो रही हैं। स्वाभाविक है कि मुझे भी कई में सम्मिलित होने का अवसर मिला होगा। विवाह की ऋतु आरम्भ हुई ही थी कि निमंत्रणों का ढेर होने लगा। दिन का अधिकतर हिस्सा लड़का और लड़की के कार्डों को पृथक करने में व्यतीत होता। अब बात विवाह की है और पड़ोसी का हो तो अपनी जेब ढीली करनी ही पड़ती है। विश्वास मानिए कि इस महंगाई की दुनिया में उपहार देना किसी बोझ से कम नहीं रहता। इस बात से केवल मैं ही नहीं, कई अन्य मित्र भी त्रस्त थे।
एक मित्र के साथ शादी में जाने का मौका मिला। जब भोजन ग्रहण करने का समय आया तो ऐसे खाने लगे मानो सारी असुर प्रजाति का समावेश उनमें हो गया हो। जब बहुत समय हो गया और समस्या दुर्दमनीय हो गयी तो मैं पूछ बैठा कि घर में भोजन की उपलब्धता तो पर्याप्त है? तो उत्तर में वो बोले कि उपहार स्वरूप जो धनराशि दी हुई है वो तो ठीक से वसूल कर ली जावे। मैंने कहा जी ये भी सही है। हिसाब में लाभ न हो तो हानि भी काहे करनी है। वैसे भी रिश्ते भी तो अब हिसाब ही रह गये हैं।
खैर छोडि़ये! मुझे सारे विवाह समारोह में बारात सर्वाधिक प्रिय है। जितने अनुभव कई दिनों के जीवन व्यतीत करने पर प्राप्त करने दुर्लभ होते हैं वे सभी एक ही बारात में प्राप्त हो जाते हैं। वैसे तो कई अनुभव उल्लेखनीय रहते हैं, परन्तु एक अनुभव आपसे साझा न करना अन्याय ही होगा।
बात ये थी कि पड़ोस में मित्र का विवाह था। घर की अर्थव्यवस्था भी अच्छी थी तो तैयारियां भी जोरों से होना स्वाभाविक ही है। बारात का समय आ गया। लोग सज-धज के सज्जनता व संस्कार युक्त होकर चल रहे थे। किन्तु कुछ समय पश्चात् मदिरा की कुछ बूंदें कंठ के नीचे जाते ही धीरे-धीरे सभी की वास्तविकता सामने आने लगी। बाजे की धुनों में सभी अपने नृत्य कौशल करने में मग्न हो गये। कोई हाथ उछालकर नृत्य करता, कोई टांगों से टांगें मिलाकर भांगड़ा और कोई तो जमीन पर लेट लेटकर सुप्रचलित ‘नागिन नृत्य’ की कला लोगों तक पहुँचाता।
बारात तक सब कुछ ठीक था। अंततः बारात वधु पक्ष के दरवाजे तक आ पहुँची। वधु पक्ष की ओर से भाई छाता लेकर आए और मित्र का खूब आतिथ्य हुआ। ठीक भी है जीवन में एक बार तो वर ‘नारायण’ के समतुल्य माना गया है अन्यथा तो उसका जीवन एक बैल की तरह ही व्यतीत हो जाता है। दूल्हे ने जूते उतारे ही थे कि अदृश्य हो गए या यूँ कहिए कि सालियों द्वारा ‘किडनैप’ कर लिए गये। जिसकी फिरौती की रकम जूतों के वास्तविक दाम से भी कहीं अधिक रख दी जाती है।
ठीक उसी समय कुछ कोलाहल सा सुनाई दिया। बात ये थी कि वर पक्ष के निकटवर्ती संबंधियों में कोई कद्दावर नेता थे। महोदय का प्रवेश हुआ ही था कि लोग वर को छोड़ उनके अगल-बगल होने लगे। वर के अगल-बगल थे तोे केवल उसके परिवार के सदस्य और बाकी लोग तो जैसे मधुमक्खियों की तरह नेताजी के पास भिनभिना रहे थे।
उसी समय नेताजी की नजर पड़ी अपने पैर पर, तो पाते हैं कि बाएं पांव का जूता गायब है। अरे! दूल्हे के जूते गायब होना तो ठीक है, उसके कपड़े गायब होना भी ठीक है, यहाँ तक कि दूल्हे का गायब होना भी तर्कसंगत है पर नेताजी का जूता गायब? यह तो कोई बात न हुई।
चारों ओर अव्यवस्था हो गयी। लोग अपना दिमाग खपाने लगे। कोई कहता ‘चोरी हो गयी शायद’ तो दूसरा कहता ‘एक जूते की चोरी? चोरी होती तो दोनों की होती न’ सभी अपने मत रखने लगे। लोगों को सालियों द्वारा ‘किडनैप’ किये गये जूतों की उतनी परवाह न थी जितनी कि नेताजी के जूते की। यहां तक कि दूल्हा दूल्हन भी लगे ढंूढने नेताजी का जूता। अरे भई ! नेताजी हैंऋ जमीन पर बिना जूते के कदम भला कैसे रख सकते हैं। भारी अव्यवस्था हो गई। सभी जूता ढूंढने में व्यस्त थे। तभी नेता जी ने पाया कि दरवाजे के बाहर एक 6-7 साल का बालक जो कि अपनी ‘गरीबों की शक्ल’ और कूड़े की बोरी से कूड़ा उठाने वाला प्रतीत हो रहा था, के हाथ में उनके जूते सा कुछ था। जो बड़ी हैरत से उसकी ओर देख रहा था और थोड़ा भयभीत था। ऐसा लग रहा था मानो उहा पोह में नेताजी का जूता खुल गया होगा और अव्यवस्था के चलते दरवाजे के बाहर हो गया होगा।
बालक के बगल में एक दूसरा फटा पुराना जूता रखा था जो दाएं पैर का प्रतीत होता था और संयोग से नेताजी का था बांए पैर का। शायद बालक खुश था कि उसके पिता या संभव है उसके भाई को जूता पहनने का अवसर मिलेगा यद्यपि वह खुद नंगे पैर था। लोगों ने उसे देखा और स्फूर्ति दौड़कर उससे जूता छीन लिया और दो तीन थप्पड़ भी उपहार स्वरूप उसे दे दिए। बेचारा रोता हुआ अपने कूड़े की बोरी लटकाए आगे बढ़ने लगा।
भले ही लोगों के दिमाग में, नेताजी के दिमाग में और सभी लोगों के दिमाग में जूता मिलने की प्रसन्नता हो पर मेरा मन मुझसे एक ही सवाल कर रहा था जो शायद आपका मन भी आपसे करे कि ‘‘क्या? आज इस लोकतंत्र में जनता का उतना भी सम्मान नहीं रह गया है जितना कि उनके सेवकों के जूते का?’’