अपना शहर

नैनीताल की ऐतिहासिक धरोहरों के क्रम में..3

नैनीताल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भवन और सर हेनरी
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

नैनीताल की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भवन निर्माण कला की सबसे नायाब याद है, ऐतिहासिक 19वीं शताब्दी का महत्वपूर्ण भवन रैमजे हास्पिटल। जो कि सर हेनरी रैेमजे कुमाऊँ कमिश्नर (सन् 1856 से 1884) की याद में बनाया गया था। सर हेनरी रैमजे एक कमिश्नर के साथ-साथ मानवीय आचरण के कारण आम जनों के बीच बहुत ही प्रसिद्ध तथा चहेते थे। वह लागों के बीच बेताज़ बादशाह के रूप में जाने जाते थे तथा वह क्षेत्र की भाषाओं कुमाऊँनी तथा गढ़वाली भी बोल सकते थे। उन्होंने कुमाऊँ में आलू की खेती की शुरूआत की तथा चाय तथा शाक सब्जियों की खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सर हेनरी रैमजे ने देश में वानिकी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी कारण अंग्रेजी सरकार ने इन्हें कमिश्नर के साथ कन्जवेटर आॅफ फारेस्ट का पद भी दिया था। तराई तथा भावर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था में सर रैमजे का महत्वपूर्ण योगदान रहा और हल्द्वानी नगर को भी इन्होंने ही बसाया था। राजस्व वसूली तथा गाँवों के मानचित्रों को बनाने में भी सर रेमजे का योगदान अतुलनीय था। रानीखेत, खैरना, भीमताल तथा प्यूड़ा के इन्सपेक्सन बंगलों का निर्माण भी सर रैमजे ने ही कराया था। सन् 1880 के विनाशकारी भू-स्खलन के बाद इन्होंने ही नैनीताल में नालों का निर्माण करवाया था जो कि लगभग 79 किमी का निर्माण है, तथा उस समय इसमें लगभग 3 लाख रूपये का खर्च आया था। वर्तमान में सेन्टमैरीज कान्वेन्ट की बिल्डिंग भी सर रैमजे ने ही 19वीं सदी में सिस्टर्स को दान में दी थी। अल्मोड़ा में पहले कुष्ठ आश्रम का निर्माण 1850 में सर रैमजे ने ही करवाया था।
पूरे उत्तराखण्ड में सर रैमजे को आज भी किस्से तथा कहानियों द्वारा याद किया जाता है। जार्ज स्मिथ ने ‘टवैल्व इन्डियन स्टेटस्मैन’ में सर हेनरी रैमजे को बारह महत्वपूर्ण भारतीय स्टेटस्मैन में से एक माना है। रैमजे का कुमाऊँ तथा कुमाऊँनी लोगों के प्रति बहुत प्यार था। वह अक्सर कुमाऊँ भ्रमण के दौरान लोगों की समस्याओं को सुनते थे तथा उनका निवारण शीघ्र करने की कोशिश करते थे। वह लोगों से बहुत आत्मीयता से मिलते थे तथा बड़े दयालु व सहृदय व्यक्तित्व थे। एक बात उनके बारे में कही जाती है कि अपने रिटायरमेंट के समय उन्होंने अपने आॅफिस वियरर को 800 रूपये दिये थे तथा अपने चैकीदार को 300 रूपये दिये थे, जो कि उस समय एक बहुत बड़ी धनराशि मानी जाती थी। अपने इंग्लैण्ड प्रवास के बाद भी वह सहायता राशि अपने सहायकों को भारत भेजते रहे। कुछ लोग उनको अंग्रेज साधू मानते थे तो कुछ रामजी यानि भगवान राम का अवतार मानते थे।

क्रमशः