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नैनीताल की ऐतिहासिक धरोहरों के क्रम में:-2

  ब्रिटिसर्स को भाया नैनीताल, यहां के गिरजाघर कहते हैं कहानी  
रवीन्द्र पाण्डे ‘रवि’, नैनीताल -

वैश्विक परिदृश्य में अद्वितीय नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ विश्व की प्रमुख पयर्टन नगरी में शामिल हमारी सरोवर नगरी नैनीताल, यहाँ मौजूद विभिन्न ऐतिहासिक ईमारतों, पौराणिक मंदिर, चर्च एवं खूबसूरत पर्यटक स्थलों के लिए जानी जाती है। इसी क्रम में इस अंक में हम आपको नगर के चर्चों के बारे में अवगत करा रहे हैं।
कुमाऊँ में ईसाईयत की शुरुआत 18वीं सदी की शुरूआत से हुई। सन् 1815 में कुमाऊँ एवं गढ़वाल में प्रवेश के बाद ईसाई मिशनरी ने पर्वतीय क्षेत्र में फैले प्लेग, कोलरा, कुष्ट रोग से पीडि़तों को राहत पहुंचाने में हर संभव मदद की। नैनीताल नगर में सन् 1841 में नगर का वास्तविक उत्थान हुआ। उस दौर में छोटे से शहर में स्थापित लगभग पांच चर्च, मिशनरी स्कूल व बुलंद ऐतिहासिक ईमारतें ब्रिटिसर्स के प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर नगरी से रहे विशेष प्रेम के उदाहरण हैं।

नगर की प्राचीनतम ईमारतों में से एक है सूखाताल स्थित सेंट जोंस इन द वाइल्डरनेस प्रौटेस्टेंट चर्च। कुमाऊँ के इस प्रथम चर्च के लिए सन् 1844 में स्थान चयन के बाद सन् 1846 में आधाशिला रखी गई, जबकि 2 अप्रैल 1848 में इसे दर्शनार्थ खोल दिया गया। 18वीं सदी के वास्तु व शिल्पकारी की दृष्टि से श्रेष्ठ चर्च में लगी रंगीन खिड़कियों में ईशू को दफनाने, महिलाओं के कब्र पर आने, ईशू के आशीष देने आदि को दर्शाया गया है। यहां सन् 1880 के विभत्स भू-स्खलन में मारे गए 151 लोगों समेत दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गए भारतीय सिविल सेवकों को श्रद्धांजलि दी गई है।
एशिया के प्रथम मेथोडिस्ट चर्च की स्थापना भी यहीं हुई। मल्लीताल रिक्शा स्टैंड के समीप स्थित चर्च का निर्माण सन् 1858 में हुआ जबकि सन् 1868 में इसे दर्शनों के लिए खोल दिया गया। निर्माण का श्रेय अमेरिकी मेथोडिस्ट मिशनरी के विलियम बटलर तथा तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर सर हेनरी रैमजे को जाता है।
सन् 1868 में एक अन्य मैथोडिस्ट चर्च तल्लीताल बस स्टैंड के समीप बनाया गया। सन् 1971 में यह चर्च बिशप एजे शा की ओर से बिशप शा स्कूल में परिवर्तित कर दिया गया। यहां राजभवन के प्रवेश द्वार के निकट स्थित है सेंट निकोलस चर्च। जिसकी आधारशिला 1890 में रखी गई। बिशप क्लिफोर्ड तथा सर आकलैंड कालविन की ओर से 1896 में इसे दर्शनों के लिए खोल दिया गया।
इसके अलावा नैनीझील के मालरोड से लगे तल्लीताल में सेंट फ्रांसिस कैथोलिक चर्च भी इसी दौरान स्थापित हुआ। इसे लेक चर्च के नाम से भी जाना जाता है। सन् 1868 में फादर मैकेन ने इसे बनावाया, जो असीसी के सेंट फ्रांसिस को समर्पित है। यह चर्च भी गौथिक शैली का खूबसूरत नमूना है। यहां सेंट जोसेफ स्कूल के समीप स्थित सेंट फ्रांसिस होम स्थित है, सन् 1895 में इसके निर्माण का श्रेय फादर पेट्रोनियस को जाता है। यहां एक छोटा गिरजाघर जिसे रिलीजियस होम भी कहते हैं।

..और भी हैं धरोहरें
नैनीताल- नगर में ब्रिटिसर्स की ओर से बनाए गए कई ऐतिहासिक भवन व ईमारतें आज भी बुलंद हैं। जिन्हें आज राजभवन, सेंट जोसेफ स्कूल, सेंट मैरीज, इलाहाबाद बैंक, हाईकोर्ट, कलक्ट्रेट, रैमजे अस्पताल आदि नाम से जाना जाता है। इसके अलावा पिलग्रिम लाज, क्लिफटन, गर्नी हाउस, ग्रासमेयर समेत 175 आवासीय भवन है। जिसमें से अधिकांश आज भी उसी रूप में स्थापित हैं। संबंधित धरोहरों को साह समाज के लाला मोती राम साह, कुंदन लाल साह, दुर्गा साह, कृष्णा साह, अमरनाथ साह, परमा शिवलाल साह, जोगा साह, किशनदास साह ने तथा उनके वारिसों ने जीवंत किया हुआ है।
इनमें से कुछ धरोहरों के बारे में हम आपको पूर्व के अंकों में अवगत कराते रहे हैं, आगामी अंकों में आपको एक-एक कर सभी धरोहरों के ऐतिहासिक पहलू से अवगत कराने के प्रयास किए जाएंगे।