अपना शहर

नैनीताल के निर्माता ला. मोतीराम शाह भाग 2

नित्यानन्द मिश्र, अल्मोड़ा -

मल्लीताल के लोगों के आग्रह पर स्नान के लिये उदयनाथ शाह जी ने नहाने के लिए घाट बनाया। मन्दिर के आस-पास साधु-सन्तों के रहने के लिये छोटी-छोटी कुटिया बनायी।
1982 में अमर उदय माँ नैनादेवी न्यास की स्थापना हुई। मन्दिर के सारे क्रिया कलाप इस न्यास के द्वारा सम्पन्न होते हैं।
(लाला मोती राम शाह ने नाना श्री तेज विक्रम राणा नेपाल के तीन सरकार के नाम से विख्यात थे।
31 दिसम्बर 1843 में कलकत्ता इंग्लिशमैन नामक पत्रिका में अल्मोड़ा के निकट एक सरोवर की खोज की सूचना प्रकाशित हुई थी। इस खोज का पूर्ण विवरण आगरा अखबार में इस प्रकार प्रकाशित हुआ था।
”गागर पर्वतमालाओं के मैदानी भागों की ओर झुकाव की ओर सरोवर स्थित है। अल्मोड़ा से इसकी दूरी 35 मील है। समुद्र की सतह से यह 6200 फीट में स्थित है। लम्बाई में यह 1( से 1) मील में वक्राकार है और चैड़ाई में एक मील का एक चैथाई है। इस सरोवर का जल रवो की तरह स्वच्छ है। पर्वत श्रेणियों से निकलने वाले सुरम्य झरनों से इसे जल प्राप्ति होती है। जल की सतह तटों के नीचे लम्बाकार है। सरोवर के चारों ओर साइप्रस, चिनार (विलो वृक्ष नहीं) और अन्य सुरम्य पेड़ हैं। सरोवर के चारों ओर सुन्दर पर्वत और मनोहर चोटियाँँ स्थित है। घुड़सवारी के लिये सुन्दर सड़कों का निर्माण किया जा सकता है। सरोवर के चारों ओर वाहन चालन के हेतु सुन्दर सड़कों का निर्माण किया जा सकता है। सरोवर में मनोरंजन हेतु नावों का संचालन किया जा सकता है। सरोवर के समीपवर्ती पहाडि़यों में हिरणों के झुण्ड़,घुरड़़, बाघ तथा अन्य जानवरों के समूहों के द्वारा पगडंडियों तथा जंगली संकरे मार्गो का निर्माण हुआ है।
इस सुरम्य स्थान में सर्वप्रथम पिलग्रिम वैरन और उनके दल के सदस्य पहुँचे। कुमाऊँ में रहने वाले अन्य योरोपियनों ने इसे देखा नहीं था।
सरोवर स्थानीय लोग और अंग्रेजों के लिये पवित्र स्थान रखता था। परदेशियों के द्वारा उसका प्रदूषण उन्हें स्वीकार्य नहीं था। सरोवर और वर्तमान नगर के चारों ओर सजावटी वृक्ष काफल, बांज और देवदार की प्रचुरता थी। नैनीताल नगर को योजनाबद्ध रीति से बसाते वक्त कुमाऊँ कमिश्नर लूशिंगटन के समय नरसिंह थोकदार (ज्योलीकोट) सरोवर पर अपना आधिपत्य बतलाते थे। मि0 बैटन ने अपनी अदालत में उनके खिलाफ फैसला दिया था। उन्हें नाव में सरोवर के मध्य ले जाया गया और सरोवर पर अपने अधिकार को छोड़ने के लिये बाध्य किया गया। ऐसा न करने पर उन्हें सरोवर में डुबोने की धमकी दी गई। भय से नरसिंह थोकदार ने अपने आधिपत्य को छोड़ दिया। प्रकृति ने सरोवर को रमणीयता तथा स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु का वरदान दिया था। श्री मोतीराम शाह द्वारा हेनरी रैमजे और जे॰एच॰ बैरन को नगर निर्माण में बहुमूल्य सहयोग दिया गया। लूशिंगटन के द्वारा 1842 में नगर में भवन निर्माण हेतु भूमि प्रदत्त करने की योजना तथा एक छोटे फील्ड निर्माण की कार्य योजना बनवाई गई थी। श्री मोतीराम शाह 1844 में नैनीताल आये और उन्होंने पी0 बैरन के साथ कार्य किया। उनके द्वारा नैनीताल में वेस्टन, गार्डन हाउस, वेल्वेडियर पिलग्रिम काॅटेज, ओक काॅटेज, आल्मा काॅटेज और स्नोव्यू भवनों का निर्माण किया गया। सर हेनरी रैमजे और जे0 एच0 बैटन को उन्होंने नगर निर्माण के समय 40000 रु0 की सहायता दी थी।
1842 से पूर्व सरोवर की घाटी पर कोई झोपड़ी भी नहीं थी। लूशिंगटन के द्वारा भवनों के निर्माण, वर्तमान बाजार हेतु जमीन। प्रदान की गई थी। 1846 में 1500 की लागत से पहला गिरजाघर बनवाया गया। 1845 से पूर्व वर्तमान बड़ा बाजार मल्लीताल का स्थान रिगाल के जंगलों से आच्छादित था। इसमें शेरों का निवास था। नैनीताल नगर के निर्माण में रामगढ़ के बचीगौड़, परमाशिवलाल साह आदि परोपकारी सज्जनों के द्वारा श्री मोतीराम शाह को बहुमूल्य सहयोग दिया गया। इन महानुभावों के द्वारा हल्द्वानी जाने वाली सड़क बलिया गधेरा, कचहरी सेक्रेटेरिएट, राजभवन (पहले स्टोनले फिर संेटलू, इसके अनन्तर अयारपाटा), रामजे अस्पताल, मिशन स्कूल, सेंट जोजेफ, शेरवुड, फिलेन्डर स्मिथ, वेलेजली, राजकीय पाठशाला, हम्प्री हाईस्कूल तथा बालिका विद्यालय का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ। तल्लीताल बाजार तथा कचहरी के निर्माण में श्री बची गौड़ ने ख्याति प्राप्त की थी। यशस्त्री और सम्पत्र व्यक्ति होने पर भी उनके द्वारा परोपकार के कार्य किये गए। उनके द्वारा निर्मित भवनों की आय का कुछ अंश श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मन्दिर को भोग हेतु अर्पित किया जाता था। उनके द्वारा श्री बद्रीनाथ पैदल यात्रा मार्ग में तीर्थयात्रियों के विश्राम हेतु अनेकों धर्मशालाओं का निर्माण किया गया। इनमें अभी भी कुछ धर्मशालाएं काकड़ीघाट-अल्मोड़ा मार्ग में विद्यमान हैं। कहा जाता है कि हेनरी रैमजे ठा0 बची गौड़ की कत्र्तव्यनिष्ठा और परोपकारिता से बहुत प्रभावित हुए। वह उनसे मिलने उनके आवास रामगढ़ गये। उन्होंने सोचा था कि श्री बची गौड़ ऐश्वर्यमय जीवन व्यतीत करते होंगे। परन्तु उन्होंने श्री बची गौड़ को सरल, निष्कपट किसान के रूप में पाया जो इस वक्त अपनी गौशाला में भैंसों की देखरेख कर रहे थे। श्री बची गौड़ की इस सादगी से सर हेनरी रैमजे मोहित हो गये। श्री बची गौड़ के द्वारा हल्द्वानी में भी निर्माण कार्य किये गये। उनकी उदारता और दानशीलता का प्रतीक नैनीताल कौस्थवेट हास्पिटल में उनके नाम का चिकित्सा वार्ड है। श्री परमाशिवलाल साह उदारता और सजन्नता के प्रतीक थे। उनकी उदारता का परिचय तल्लीताल, नैनीताल में स्थित श्री दुर्गासाह परमाशिवलाल साह धर्मशाला है। पथिकों को विश्राम तथा निर्धन- असहायों के विवाह कार्य यहाँ से सम्पन होते हैं। श्रावण मास में कई वर्षो से यहाँ पुराण कथाओं का आयोजन होता है। इससे नगर का जीवन धर्ममय हो जाता है।