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नैनीताल के निर्माता ला. मोतीराम शाह भाग 9

नित्यानन्द मिश्र, अल्मोड़ा -
बरेली में 5/3/1864 में आर0एच0डब्लू0 डनलप ने कहा था-‘‘नैनीताल के बैंकर श्री मोतीराम शाह को मैं पिछले 12 वर्षों से जानता हूँ। उनकी निष्ठा की हम भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। 1857 की क्रान्ति के समय उन्होंने हजारों रूपयों से हमारी सहायता की थी जबकि अन्य व्यक्ति इन हजारों रूपयों में उच्च दर में ब्याज लेते थे। यहाँ एक जमींदार के रूप में उनकी अच्छी ख्याति है। उनकी इस जिले और अपने जिले में अच्छी ख्याति है। उनका अच्छा आचरण उनकी कठोर कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है।’’
नैनीताल का विस्तृत वर्णन लेखक द्वारा संगम पत्रिका, सम्पादक श्री इलाचन्द्र जोशी (इलाहाबाद) में दो खण्डों में सन् 50 के लगभग प्रकाशित करवाया गया था। यह पत्रिका अब दुर्लभ है।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इंग्लैण्ड की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था चरमराने से ब्रिटेनवासियों ने सैनिकों के उपचार तथा बच्चोें की शिक्षा हेतु नैनीताल में सैन्य अस्पताल और विद्यालयों को खोला। इनमेें हैलटवार स्कूल और हैलेट अस्पताल (बिड़ला विद्यामन्दिर के निकट वैलहैड के समीप) ब्रिटीश काल में यह मंगा कोठी के नाम से विख्यात था। सर हेनरी रैमजे के उल्लेखनीय कार्याें के लिए रैमजे अस्पताल खोला गया। यहाँ ख्याति प्राप्त ब्रिटिश सैन्य सर्जन तथा चिकित्सक थे। इन चिकित्सकों के भव्य चित्र वर्तमान अस्पताल के दूसरी मंजिल को जाने वाली सीढि़यों पर शोभित थे। हैलटवार स्कूल बाद में फिलैन्डर स्मिथ के नाम से विख्यात हुआ था। यह विद्यालय स्थानीय लोगों की भाषा में फुट साहब के स्कूल के नाम से प्रसिद्ध था। आजादी के बाद इसे पं0 गोविन्द बल्लभ पन्त के आग्रह से दानवीर घनश्याम दास बिड़ला ने खरीदकर छात्रों में भारतीय संस्कृति के वैदिक आदर्श, चरित्र निर्माण आदि का पोषण किया।
श्री मोतीराम शाह के पुत्र श्री अमरनाथ शाह सहृदय और परोपकारी व्यक्ति थे। दीन दुखियों के दुःख से वह विचलित हो जाते थे।
1914 में पोलो खलते वक्त उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र श्री उदय नाथ शाह पर 18 वर्ष की अवस्था में परिवार का बोझ आ गया था। श्री उदयनाथ शाह में अपने पिता की धर्मपरायणता तथा परोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी थी। ब्रिटिशकाल मंे वह कोषाध्यक्ष रहे। महात्मा गाँधी के नैनीताल आगमन पर स्वतंत्रता संग्राम के लिये उन्होंने गाँधी जी को कोष स्थापना हेतु चेक प्रदान किया था।
योरोपियन स्कूलों को रसद, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति के लिए श्री श्याम लाल शाह और उनके पुत्र श्री देवीलाल साह आदि का सहयोग उल्लेखनीय था।
श्री उदयनाथ शाह देवी के अनन्य भक्त थे। प्रति मंगलवार को उनके आवास में देवी की विधि विधान से पूजा सम्पन्न की जाती थी। देवी का श्रृंगार नये वस्त्रों से होता था। तदनन्तर बालकों को भोज करवाया जाता था तथा उन्हें भेंट दी जाती थी। कालान्तर में उदयनाथ शाह जी ने कोषाध्यक्ष पद छोड़ दिया। उनके उत्तराधिकारी के रूप में श्री मनोहरलाल साह नियुक्त हुए। कूर्मांचल में सर हेनरी रैमजे और जिम काॅर्बेट का बहुत सम्माननीय स्थान था। काॅर्बेट गोरे देवता के रूप में सम्माननीय थे। नैनीताल नगर के धार्मिक और सामाजिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठापना में श्री दुर्गासाह ठुलघरिया, श्री जोगा साह कुमैय्या, श्री किशनदास शाह, प्रेमलाल साह कुमैय्या, श्री बी. दास साह, श्री ईश्वर लाल साह, श्री शिवलाल साह कुमैय्या और श्री भवानी दास साह (सर्किल इंस्पेक्टर) का उल्लेखनीय स्थान था। इन सज्जनों की मित्र मण्डली में हरिदत्त सरिस्तेदार, श्री भोला दत्त पाण्डेय, वकील, श्री कृष्णानन्द जोशी, डिप्टी कलेक्टर, श्री गंगा दत्त मिश्र, श्री तारा दत्त पन्त (तारालाॅज), श्री हरकिशन मुनगली, श्री गंगा दत्त मासीवाल, श्री गोपाल दत्त पाण्डे, सर्वेयर (सिपाहीधारा) नैनीताल सदृश धर्मनिष्ठ व कला मर्मज्ञ व्यक्ति थे। इस प्रकार नगर में सामाजिक समरसता में इन व्यक्तियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कहा जाता है कि श्री मोती शाह को शाह भैरव अल्मोड़ा मे प्रवास काल में स्वप्न हुआ कि भविष्य में तुम्हें विस्तृत कार्य करना है। अतः नैनीताल जाकर कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट होकर धर्मानुसार लोकाचार में रत रहो। श्री मोती शाह ने ईष्ट के इस आदेश का पालन कर नैनीताल को प्रस्थान किया।
नैनीताल की स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु और इग्लैण्ड के समान जलवायु के कारण अंग्रेज कमिश्नरों ने उच्च शैक्षिक वातावरण हेतु विद्यालय तथा विख्यात चिकित्सालयों का निर्माण किया। कालान्तर में यह छोटी विलायत के नाम से विख्यात हो गया। सैनिकों के सम्मान हेतु यहाँ सैलवेशन आर्मी का स्मृतिस्वरूप प्रतीक के रूप में एक भवन का भी निर्माण हुआ। यह भवन तल्लीताल चर्च के समीप निर्मित किया गया था। चैकोट अल्मोड़ा के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के लोग यहाँ रोजी रोटी के लिये हाथ से खींचने वाली रिक्शा और डाँडियों में कार्य करने लगे।