अपना शहर

नैनीताल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भवन और सर हेनरी रैमज़े

पिछले अंक से आगे------------

नैनीताल की ऐतिहासिक धरोहरों के क्रम में

 

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

 

राजभवन का 82 हेक्टेयर क्षेत्र मुख्यतः पहाड़ी और वन का है। इसका निर्माण बकिंघम पैलेस के तर्ज पर किया गया। जिसकी वास्तुकला में पूर्व की गौथिक शैली का वर्णन मिलता है। राजभवन का निर्माण ग्रे पत्थर से किया गया। जहाँ भवन के आगे और रेलिंग में कुछ लाल आगरा पत्थर का उपयोग सजावट के तौर पर देखने को भी मिलता है। आगे के हिस्से में छह दुर्गरूपी बुर्ज अपना प्रभुत्व दिखाते मिल सकते हैं, जो पहले खड़े शिखर जैसा सुशोभित था। यह भवन गरिमा और दृढ़ता का प्रतीक है। घर के पीछे का भाग लगभग एक अंग्रेजी देश के घर सा प्रतीत होता है, जो शायद इसका सबसे खूबसूरत हिस्सा है।

राजभवन में 19 वीं और 20 वीं सदी के हथियार लान्सेस, तलवारें, मुजजल लोडर आदि साथ ही दस्यु सुल्ताना डाकू के हथियार, हाथी दाँत, पदक, एंटीक फर्नीचर और अन्य ट्राफियों का एक समृद्ध संग्रह है ।

20वीं सदी का एक अन्य महत्वपूर्ण भवन गर्नी हाउस है। जहां सन 1919 से जिम काॅर्बेट प्रसिद्ध संरक्षणवादी ने रहना शुरू किया था। मोकमेह घाट में रेलवे में ट्रांस-शिपमेंट निरीक्षक के रूप में और माल के ट्रांस-शिपमेंट के कार्य में 21 साल बिताने के बाद वे नैनीताल लौट आये थे। नैनीताल लौटने के पश्चात उन्होंने शहर की राजनीति में सक्रिय रूचि ली और नगर निगम बोर्ड के सदस्य के रूप में 2 अप्रैल 1919 को नियुक्त हुए। सन 1923 में वह नैनीताल नगर निगम बोर्ड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किये गए। नैनीताल को लेकर उनके मन में लगाव उमड़-घुमड़ कर रहता था। नैनीताल नगर निगम बोर्ड के सदस्य बनने के पश्चात शहर के लाभ के लिए उन्होंने बोर्ड को 7300 रुपये दान स्वरुप दिए। इस राशि से झील के किनारे एक बैंड स्टैंड का निर्माण और भवाली रोड के नीचे चीड़ के वन के पास शमशान घाट के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया। नैनीताल क्षेत्र पक्षी जीवन से परिपूर्ण था इसलिए वह इसे एक पक्षी अभ्यारण्य के रूप में घोषित करना चाहते थे, पर सफल न हो पाये। आज भी नैनीताल और उसके आसपास के क्षेत्र पक्षियों को निहारने का एक उपयुक्त स्थान है। उन्होंने नगर के प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने के लिए अतिरिक्त रुचि दिखाई जिसके फलस्वरूप सन 1937 में बकरियों के म्युनिसिपल वन में प्रवेश पर उपनियम बना दिए गए, क्योंकि वो वनों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाती थीं। उन्हीं के प्रयासों से नैनीताल झील में रात को मछली पकड़ने और मछली पकड़ने के दौरान कृत्रिम रोशनी के उपयोग पर रोक लगा दी गयी।

ब्रिटिश शासन के दौरान नैनीताल में बसने वाली एक और महत्वपूर्ण व्यक्ति थी हंगरी की प्रसिद्ध चित्रकार, एलिसाबेथ सास ब्रूनर। महात्मा गांधी के करीब होने की वजह से भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में वे नैनीताल में नजरबन्द कर दी गयीं। छूटने के पश्चात नैनीताल को ही उन्होंने अपना रैन-बसेरा बना लिया। जहाँ वह देवदार काॅटेज में रहती थीं। भारत में उनकी सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग भगवान शिव की थी जो उन्होंने शांतिनिकेतन में बनायीं थी। वहाँ चित्रकारी देख नंद लाल बोस मंत्र-मुग्ध हो गए और टिप्पणी की कि मैंने शिव की पेंटिंग में अपने पूरा जीवन बिता दिया, लेकिन सफल न हो सका, अब आपने इसे साकार कर दिखाया।” उनके द्वारा बनाया गयी आखिरी पेंटिंग ‘दी लास्ट विंटर’ थी। यह पेंटिंग बर्फ में लिपटे भवन ग्रासमेअर की थी। अब होटल मनु महारानी वहाँ स्थापित है। मृत्यु ने अपनी ठंडी चादर से इस चित्रकार को 19 जनवरी 1950 को ओढकर सुला दिया। स्वर्ग सिधारने से पहले अपनी बेटी को इन्होंने इच्छा जताई थी कि उन्हें सूखाताल में स्थित देवदार काॅटेज के निकट देवदार के पेड़ों की छाया में दफना दिया जाये। उनकी बेटी एलिजाबेथ ब्रूनर, जो खुद भी एक प्रसिद्ध चित्रकार थीं, भारत की हंगरी बेटी के रूप में प्रसिद्ध थी, का देहवासन 2 मई 2001 को हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि माँ की भाँति उन्होंने भी यह इच्छा जताई थी कि मरने के बाद उन्हें उसी जगह दफना दिया जाए, जहाँ आज माँ और बेटी दोनों शाश्वत शांति में विश्राम कर रहे हैं।