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नोट-बंदी और पहाड़ी ‘ब्या’!

नोट-बंदी और पहाड़ी ‘ब्या’!
राजशेखर पंत, नैनीताल
आज शाम अंचल पंत जी से हुआ औपचारिक वार्तालाप मुझे अस्सी के दशक की शुरुवाती दिनों मंे अकेला छोड़ गया। दीदी की शादी थी। मैं पढ़ा करता था तब। विवाह के एक-दो महिने पहले से ही गाँव-कस्बे की महिलाओें ने घर आकर सारा अनाज साफ कर दिया था। मसाले कुट चुके थे। साड़ियों में फाल-बटन लगने की सारी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। विवाह के तीन-चार दिन पहले से ही घर आने वाली हर आमा, ताई-चाची-मौसी-दीदी अपने साथ दूध-दही-घी वगैरा लेकर आया करती थी। और अगर मुझे सही याद है तो विवाह वाले दिन भी घर में इतना दूध-दही वगैरा इकट्ठा था कि बाजार से इन सब चीजों को खरीदने का शायद ख्याल भी नहीं था। खाना गाँव के जमुना दत्त जी ने बनाया था और मीठी खटाई के लिए गोपाल पाण्डे जी तो मौजूद थे ही। बारातियों को बगैर किसी टेंशन के, खासकर इंतजाम से जुड़े टेंशन के, विवाह मधुर स्मृतियों के एक यादगार सिलसिले को पीछे छोड़ते हुए निपट गया।
नोट-बंदी के ऐतिहासिक ऐलान के बाद कुछ इसी तरह से निपटे विवाहों की खबरें क्षेत्रीय प्रेस में पढ़ने और सुनने को मिली। कैश की कथित कमी सहयोग के आगे ठहर नहीं सकी। अच्छा लगा यह सब पढ़ना और सुनना। ग्लोबेलाइजेशन, मार्केट इकाॅनामी, कंज्यूमर पोटंेशियल, अपवर्ड मोबेलिटी जैसे भारी भरकम जुमलों के बाद अचानक ही अपनी विरासत की आहट को सुनना, मजबूरी की स्थिति में ही सही, एक सुखद अनुभव था।
पहाड़ी समाज में शादी-विवाह कभी भी बेहद खर्चीले और दिखाऊ किस्म के आयोजन नहीं हुआ करते थे। आपकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत में कभी भी इतना दम नहीं हुआ करता था कि वह बारात के रात के खाने से पीले कद्दू की सब्जी, पूरी, भात, ककड़ी का रायता वगैरा तथा सुबह के नाश्ते मे सिंगल, आलू के गुटके और दाड़िम या भाँगे की चटनी को नान, मिस्सी रोटी, पनीर, चाऊमिन, छोले-भटूरे इत्यादि से रिप्लेस कर सके।
खैर...वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। पिछले कुछ दशकों में बंैक्वेट हाल, वर्दीधारी केटरिंग स्टाफ और वैराइटी फूड स्टाइल्स वाली संस्कृति ने पटांगण और कन्यादान के गोठ में संपन्न होने वाले पहाड़ी ‘ब्या’ की आत्मीयता को निश्चित ही कहीं कोने में धकेल दिया है। समृ(ि के दिखावे का एक जरिया बन गये हंै अब ये कभी निहायत ही सादगी से संपन्न होने वाले आयोजन। प्रधान मंत्री की नोट-बंदी के फैसले ने, मजबूरी में ही सही, पहाड़ की संस्कृति को पुनस्र्थापित होने का एक बहाना तो दिया ही है। क्यों अपनी इतनी सहज, सीधी-सरल परंपराओं को छोड़ कर उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में शामिल हो रहे हैं हम। पहाड़ों की सीधी-सपाट ऊँचाइयों की एक किस्म की सरलता से नवाजा था कभी हमारी संस्कृति के एक- दूसरे के प्रति लगाव, सम्मान, सहिष्णुता, सहयोग कभी स्तंभ हुआ करते थे हमारी संस्कृति के। कहाँ खो गये हमारे ये सब मूल्य?हमारे नेता, वो जो योजना या नीतिकारों का मुखौटा पहन, बगैर ‘पहाड़’ को समझे, बगैर महसूस किये, इसे देव भूमि के खूबसूरत रैपर में लपेट कर बेच रहे हंै...समझ पायेंगे इसके दर्द को?
मोदी जी, मैं आपका भक्त नहीं हूँ। मुझे मालूम है कि मेरे ही प्रदेश में आपकी कथित ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ से जुडे़ अधिकांश नेता और उनके चमचे उतने ही गलीज और भ्रष्ट हैं जितने कि नेता और चमचे होते हैं। मैं नहीं जानता कि नोट-बंदी के ‘कैश और इकाॅनामी’ और ‘प्लास्टिक मनी’ के साथ साथ ‘बैंक टु द बेसिक्स’ जैसा भी कोई जुमला था या नहीं। पर मुझे खुशी है कि आपके इस फैसले ने, कुछ दिनों के लिए ही सही, पहाड़ की संस्कृति को एक बार फिर जिन्दा तो कर ही दिया है।