विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (अड़तीस) आओ! कब्रिस्तान - कब्रिस्तान खेलें!!

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (अड़तीस)
आओ! कब्रिस्तान - कब्रिस्तान खेलें!!
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
प्राचीन सभ्यताओं, संस्ड्डति और धार्मिक विशेषताओं के लिए ‘सीरिया’ विश्वप्रसिद्ध है। उसे अनगिनत पैगम्बरों की सरजमीन होने का गौरव भी प्राप्त है। इस समय सीरिया अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घटनाओं -दुर्घटनाओं, उखेड़-पछाड़ का अखाड़ा बना हुआ है। हालांकि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मेरा विषय नहीं है अगर हालिया घटनाक्रम दिन प्रतिदिन अन्तर्राष्ट्रीय समाज को प्रभावित कर रहे हैं। सीरिया शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिद्वन्दता का केन्द्र बनता जा रहा है।
1948 में नवगठित राज्य ‘इस्राईल’ के अभ्युदय ने मध्यपूर्व के देशों सहित एशिया के अधिकांश देशों की राजनीति को प्रभावित किया है। मिस्र, जार्डन, सीरिया, लीबिया तथा कई अरब देशों को इस्राईल की राजनीति ने प्रभावित किया है। कई युद्ध हुए हैं परन्तु असंतोष और अशान्ति बरकरार है।
आपको याद होगा कि हालिया पेरिस आक्रमण के परिपेक्ष में 20-G देशों का शिखर सम्मेलन तुर्की में आयेजित हुआ था। इसमें पश्चिमी राष्ट्रों और रूस के मध्य सहयोग और मित्रता का जो वातावरण सामने आया वह अगले दिन दुर्भावना में तब्दील हो गया। कारण यह हुआ कि तुर्की ने रूस का एक जंगी जहाज अपनी सीमा में यह कहकर मार गिराया कि वह एक टोही विमान था जो अनधिड्डत रूप से तुर्की की सीमा में उड़ान भर रहा था।
विगत शीत युद्ध में निहित स्वार्थों के तहत 28 मित्र राष्ट्रों की कोख से ‘नाटो’ का जन्म हुआ। तुर्की भी नाटो का सदस्य है। यह एक ‘लशकरी संगठन’ है। इसके किसी भी सदस्य देश पर यदि कोई अन्य राष्ट्र आक्रमण करेगा तो वह आक्रमण नाटो के समस्त 28 राष्ट्रों पर माना जायेगा।
कुछ दिनों से रूस पुनः स्वयं को ‘सुपर पावर’ के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय विचारकों का मानना है कि तुर्की द्वारा रूसी विमान को मार गिराने की घटना किसी भी समय कोई नया गुल खिलायेगी । इस घटना ने तीसरे विश्व युद्ध की बहस को पुनः छेड़ दिया है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि ‘तीसरा विश्व युद्ध’ शुरू हो चुका है। जिस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध का कारण एक छोटी और मामूली घटना थी उसी प्रकार कुछ छोटी घटनाऐं धीरे-धीरे विश्व युद्ध में न बदल जायें। इस बात की पूरी आशंका है।
मौजूदा घटनाक्रम को समझने के लिए कुछ पन्ने पलट लेते हैं। अपने जमाने के एक शक्तिशाली देश ‘आस्ट्रो-हंगरी’ राष्ट्र के जानशीन शहज़ादा फ्रांस फरडेनण्ड और उसकी पत्नी को सर्विया में क़त्ल कर दिया गया था। यह घटना प्रथम विश्व युद्धका कारण बन गयी। चन्द वर्षाें तक पूरी दुनिया आग, खून और धुऐं में गुबार-आलूद हो गयी। जर्मनी की ओर से पोलन्ड पर हुए आक्रमण ने सम्पूर्ण विश्व को युद्ध में धकेल दिया और दूसरा विश्व युद्ध हो गया। वहीं तुर्की की घटना तीसरे विश्व युद्ध का कारण न बन जाये। ब्रिटेन की पत्रिका ‘दि मिरर’ ने लन्दन के नागरिकों को सम्भावित एटमी आक्रमण से बचने के उपाय प्रकाशित करके युद्ध की सम्भावनाओं को और बल प्रदान कर दिया है।
इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सीरिया महाशक्तियों की एटमी और हाईड्रोजन बमों की भयानक तबाही से अन्तर्राष्ट्रीय कब्रिस्तान बनने वाला है। सीरिया मंे बहाने-बहाने से इस समय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और तुर्की तथा पश्चिमी ब्लाक की शक्तियां जोर आजमाइश कर रही हैं। आई॰एस॰आई॰एस॰ जैसे आतंकवादी संगठन को नेस्तो-नाबूद करने के लिए उपरोक्त ताकतें आसमान से आग बरसा रही हैं। अब रूस भी कूद पड़ा है। वह सीरिया को बचाने के लिए दाअश जैसे आतंकी संगठन को निशाना बना रहा है। चीन ने अपने समुद्री बेड़े सीरिया रवाना करके अपनी सैनिक शक्ति का बोझ रूस के पलड़े में डाल दिया है। सीरिया में रूस के कूदने से पश्चिम ब्लाक लाल-लाल हो उठा है। वह जंग जो सीरिया में ‘दाअश’ के खिलाफ़ शुरू हुई थी अब तेजी से अमेरिकी ब्लाक और रूसी ब्लाक की जंग में तबदील होती जा रही है।
एटमी हथियारों की खोज के नाम पर अमेरिका द्वारा आतंकी संगठनों का पालन पोषण करना फिर उन्हें तबाह करना, इराक को मटियामेट करके, अफगानिस्तान को खण्डहर बनाना तथा लीबिया को तबाह करना स्वयं में एक आतंक है। सुरे-बेसुरे एक ज़बान होकर जिन्हें आज आतंकी संगठन कह रहे हैं और जिन्हें आई॰एस॰आई॰एस॰, दाउश, तालिबान वगैरह कह कर पुकार रहे हैं वह अमेरिका की नाजायज औलादें हैं जिन्हें उसी ने पाल-पोसकर जवान किया है। कुछ कत्लेआम आतंकी कर रहे हैं और कुछ का कत्लेआम आतंक के दमन के नाम पर महाशक्तियां कर रही हैं। पूरी दुनिया कब्रिस्तान में तब्दील होती जा रही है।
‘कब्रिस्तान-कब्रिस्तान खेलें’ के खेल में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली यह कि अमेरिका और रूस दोनों शक्तियां ‘दाउश’ जैसे आतंकी संगठन के हाथों में खेल रहे हैं। इन आतंकियों का उद्देश्य यही है कि अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति के स्तम्भों को हिला दिया जाये ताकि उनकी राजनीतिक गुजांइश पैदा हो सके और महाशक्तियां युद्ध में उलझ जायें, भले ही दुनिया तबाह हो जाये। दूसरी बात यह है कि अधिकाधिक क्षेत्रों में छोटे-छोटे धमाके करके दहशत फैला दी जाये ताकि अफगानिस्तान युद्ध जैसे हालात पैदा हो जायें और महाशक्तिां टकरा जायें।
रूस ‘दाअश’ को इसलिए निशाना बना रहा है कि अमेरिका और तुर्की दोनों ‘दाअश’ को हथियार और पैसा दे रहे हैं।
वास्तविकता यह है कि अमेरिका और रूस दोनों सुपर पावर बने रहने के लिए अन्दर खाने खेल खेल रहे हैं। मानवता को बचाने के नाम पर नये कब्रिस्तान विकसित हो रहे हैं। कुछ कब्रिस्तान आतंकी बना रहे हैं और कुछ महाशक्तियां। जरा सोचिए कि आने वाले दिन कितने भयावह होंगे।