विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (आठ) थियेटर बोलता है ............. जागते रहो!!!

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
‘मंच’ थियेटर ग्रुप नैनीताल द्वारा विगत कई वर्षाें से ‘फागोत्सव’, ‘ग्रीष्म नाट्य महोत्सव’ तथा ‘शरोदत्सव’ में विभिन्न ख्याति प्राप्त नाटकों का मंचन सफलतापूर्वक किया जाता रहा है। इस वर्ष भी ‘ग्रीष्म नाट्य महोत्सव’ लगातार 20 दिन तक जारी रहा।
सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया में नाटकों का मंचन अति महत्वपूर्ण माना गया है। इस प्रक्रिया में शिक्षक, साहित्यकार, कलाकार आदि का योगदान रहता है। लोक कला के विभिन्न रूप हमारी धरोहर हैं परन्तु यह धरोहर नष्ट हो रही है। इस दिशा में 1940 ई0 से ‘इप्टा’ और प्रगति लेखक संघ ने सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। ‘इप्टा’ की महत्वपूर्ण देन यह थी कि उसने थियेटर के माध्यम से सदियों से सुरक्षित विधाओं को अपनाया और संवारा। लोग रूचि लेते थे और सराहना करते थे।
संस्कृति के विकास के लिए पुराने मूल्यों के विघटन और नये मूल्यों के निर्माण की प्रक्रिया को समझना जरूरी है। हमारा पुराना समाज टूट रहा है परन्तु नये समाज का निर्माण नहीं हो पा रहा है। विचारकों के अनुसार ‘यह एक संधिकाल है।’ पुराने मूल्य अब काम नहीं देते। नई पीढ़ी उन्हें मानती नहीं और नयी पीढ़ी को नये मूल्य मिलते नहीं। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पुराने मूल्य टूटते थे तो उनकी जगह नये राष्ट्रीय मूल्य पैदा होते होते थे। जैसे- राष्ट्रीय एकता, साम्राज्यवाद का विरोध, स्वाधीनता आदि। परिस्थितयां अजीब हैं, चारों ओर मूल्योें का विघटन, व्यक्तिवाद और अराजकतावाद का बोलबाला है। जब एक मंत्री का निक्कमा बेटा मंत्री बनेगा या एक आदमी मंत्री बनने के बाद करोड़पति बनेगा तो इस राजनीतिक भ्रष्टता का प्रभाव समाज और संस्कृति पर भी पड़ेगा। इन विषम परिस्थितयों का मुकाबला राजनैतिक परन्तु स्वस्थ वैचारिक परम्परा से किया जा सकता है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक बी॰बी॰ कांरत के अनुसार, ‘‘आधुनिक भारत में समाज का नेतृत्व संतों, दर्शनिकों, साहित्यकारों और कलाकारों के हाथ में न होकर राजनीतिज्ञों के हाथ में है। दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक नेताओं को संस्कृति से कोई दिलचस्पी नहीं है।’’ राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में और उसके पश्चात् भी सांस्कृतिक विकास कभी भी एक राष्ट्रीय प्रश्न नहीं बना। आधी शताब्दी से अधिक समय तक एक छत्र राज करने वाली कांग्रेस का पूरा इतिहास ‘संस्कृति विकास’ के मुद्दे से खाली है। उसने कभी कोई ‘सांस्कृतिक नीति’ बनाने के बारे में कोई बात नहीं की। कुछ नेता अवश्य बोलते और लिखते थे परन्तु उनके भाषणों, लेखों या पुस्तकों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वह परिपेक्ष्य और लक्ष्यहीन थे।
सांस्कृतिक परिवर्तनों और सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त माध्यम ‘राजनीति’ है परन्तु दुर्भाग्य यह है कि जो लोग हमारे ‘भाग्यविधाता’ हैं उनका सांस्कृतिक या मानवीय मूल्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है। सांस्कृतिक चेतना शून्य है। नाटकों की विधा सांस्कृतिक चेतना शून्य ‘विधाताओं’ पर व्यंगात्मक और आक्रामक प्रहार करती है। मंच पर ऐसे आक्रामक अंदाज पर देर तक तालियाँ बजती हैं। यह तालियाँ एक पैगाम हैं और एक बिगुल है कि जनता क्या चाहती है?
‘थियेटर’ की अपनी राजनीतिक मजबूरियां और चतुराइयां भी इस सांस्कृतिक संक्रमण काल के लिए कम उत्तरदायी नहीं हैं। पचास साल पहले कभी किसी नाटक में लाठी लेकर खड़ा रहने वाला व्यक्ति स्वयं को रंग कर्मियों का भीष्म पितामह समझता है और चाहता है कि ‘रंगकर्मी’ जैसे महान रूतबे के कारण सारी सांस्कृतिक गतिविधियां उसी के इर्द-गिर्द रहें।
नैनीताल ने निश्चित रूप से नाटकों और फिल्मों को लोग भी दिये हैं और दिशा भी। परन्तु एकाध को छोड़कर परिस्थितियां सकारात्मक नहीं हैं। स्वयं सांस्कृतिक रंगकर्मी एकजुट नहीं हैं तो फिर राजनैतिक स्तर पर सांस्कृतिक नीति निर्धारण या थियेटर के विकास का सपना स्वयं महत्वहीन है। इदरीस मलिक और उनके सांस्कृतिक सहकर्मी बधाई के पात्र हैं कि वह थियेटर को जिन्दा रखने के लिये जी-जान से जुटे हैं।