विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (इकतीस) राजनीति को अजातशत्रु को सलाम!! जन्मदिन (25 दिसम्बर) मुबारक!

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1926 को ग्वालियर (म॰प्र॰) में हुआ। मैं उनके जन्मदिवस समारोह में सपरिवार अनेक बार सम्मिलित हुआ हूँ। मैंने अपने जाति ताल्लुकात को ‘सियासत’ से बिलकुल अलग रखा हालांकि उनकी ख्वाहिश थी कि मुझे राजनीति में सक्रिय रूप से सम्मिलित होना चाहिए। मुझे पदासीन करने के प्रस्ताव भी मिले परन्तु सियासत की मौजूदा सूरतेहाल और गन्दी तथा संकीर्ण जहनियत के हावी होने के डर ने मुझे दूर रखा। सफेद कुर्ते-पाजामे में पावर की ऐठी हुई गर्दन से मुझे सख्त नफ़रत है। कुछ लोग सियासत के किसी भी मुकाम पद पहुँचकर जब ‘रौब’ झाड़ते हैं तो उनकी अल्प समय की बादशाहत पर हँसी आती है।
अटल जी का दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहा। राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि था। संसदीय इतिहास में वाद-विवाद का उच्च स्तर, सदन की गरिमा तथा शिष्टाचार में वह सबसे अग्रणी रहे। अटल जी राजनेता नहीं हैं वह ‘राजनीति-विशारद’ हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मौत के पश्चात जब उन्हें जनसंघ का अध्यक्ष बनाने का फैसला किया गया तो उन्होंने श्रद्धांजलि सभा में कहा था ‘‘दीनदयाल जी ने ज्योति जगायी, हम उसको ज्वाला में बदल देंगे।’’ यह जुमला मामूली नहीं है बल्कि चिन्तनीय है।
विदेश नीति उनका प्रिय विषय था। संसद में विदेश नीति पर अधिकांश भाषण अंग्रेजी में होते थे। ब्रजराज सिंह (समाजवादी दल) एक मात्र सदस्य थे जो हिन्दी में बोलते थे। उनके पश्चात अटल जी ही थे जिन्होंने हिन्दी में अपनी धाराप्रवाह शैली का सिक्का जमाया। 20 अगस्त 1958 को प्रधानमंत्री पंडित नेहरू (जो विदेश मंत्री भी थे) ने पूरी बहस का अंग्रेजी में उत्तर देने के पश्चात हिन्दी में कुछ कहने की अनुमति मांगी। सदस्यों ने तालियां बजाकर स्वागत किया। नेहरू ने कहा था:-
‘‘कल जो बहुत से भाषण हुए उनमें से एक भाषण श्री बाजपेयी जी का भी हुआ। उन्होंने एक बात कही थी। मेरे ख्याल में हमारी वैदेशिक नीति बिल्कुल सही है। मैं उनका शुक्रगुजार हूँ। लेकिन एक बात उन्होंने और कही कि बोलने के लिए वाणी होनी चाहिए लेकिन चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए।’’
अपनी विदेश यात्रा के दौरान वापसी पर मुझे जहाज में उनसे मुलाकात का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस दौरे पर वह मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। मैं उनसे काफी बेतकुल्लफी के साथ मिलता था इसलिए सीधे कह दिया कि ‘मुझे जनरल परवेज मुश्र्रफ की तकरीर के जवाब में आपकी तकरीर में जोड़ा गया हिस्सा गैर जरूरी लगा।’ उन्होंने बड़े गौर से सवालिया। निगाहों से मुझे देखा। शायद तफसील से जानना चाहते थे। मैंने उनकी निगाहों के सवाल को समझ लिया और बोला कि इतने लम्बे-चैड़े जुमलों में बयान करने के बजाय जनरल परवेज मुशर्रफ को उन्हीं के एक देशवासी और शायर डा॰ अजहर सिद्दीकी का एक शेर पेश किया जा सकता था। उन्होंने शेर सुनने की ख्वाहिश की। मैंने उन्हें यह शेर सुनाया -
मैं चाहता हूँ यकीन कर लूँ। बहार के दिन अब आ रहे है मगर यह खबरें तो आप मुझको, न जाने कबसे सुना रहे हैं।
वह साहित्य की अभिरूचि के शहंशाह हैं, फौरन फड़क गये और मुझे यह शेर लिख कर देने को कहा। मैंने अपनी डायरी के एक पन्ने पर लिखकर दे दिया। जिसे उन्होंने मुस्कराकर वास्कट भी जेब में रख लिया।
मैं अकसर अपनी गुफतुगू इशारों में करता हूँ और बीच-बीच में उर्दू या फारसी शेर पढ़ता हूँ। मैं ऐसे कई जाहिल सियासतदानों को जानता हूँ जो मेरी गुफतुगू और अल्फाज की बंदिशों पर मुंह बनाते रहते हैं। ऐसे मौकों पर मेरे पास सिवाय अपना मुंह पीटने के और कोई चारा नहीं होता। सियासत के लिए तालीम का होना जरूरी नहीं है। अलबत्ता अभी कुछ पढ़े लिखे विद्वान सियासतदां मौजूद हैं मगर नककारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है? अटल जी को कुदरत ने बहुत सजा बना कर मैदाने सियासत में उतारा था। अब सियासतदानों का दामन तालीम और साहित्य के हुस्न से खाली है।
अटल जी की वास्तविक जन्मतिथि 1924 है। उनके पिता स्व॰ कृष्णा बिहारी वाजपेयी ने दो वर्ष ज्यादा लिखाई थी। इस ऐतबार से आज वह 91 वर्ष के हैं। अब न वह ठीक से बोल पाते हैं और न पहचान पाते हैं। फिर भी न जाने क्यों दिल उनकी लम्बी उम्र भी दुआ मांगता रहता है। अटल जी! जिन्दाबाद! सालगिरह मुबारक!!!