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पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (इक्तालीस) ‘‘पंचायतों की न्यायतन्त्र को खुली चुनौती’’

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (इक्तालीस)
‘‘पंचायतों की न्यायतन्त्र को खुली चुनौती’’
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
भारतीय लोकतन्त्र की ऊर्जा का मुख्य स्रोत पंचायतें हैं। पंचायत को व्यापक स्तर पर समझना जरूरी है। वास्तव में पंचायत जाति के आधार पर हो या धर्म वर्ग के आधार पर उसका मूल धर्म न्याय होता है। इसे दुर्भाग्य कहा जायेगा या विडम्बना यदि पंचायतों का स्वरूप या कार्यप्रणाली अपने मूल आधार से भिन्न हो। प्रायः देखा जा रहा है कि पंचायतों के विभिन्न स्वरूप हमारी न्यायप्रणाली को खुली चुनौती दे रहे हैं। कुछ उदाहरण देखिए-
जिला परभणी (महाराष्ट्र) की एक जातीय पंचायत ने एक आरोपी व्यक्ति के सामने शर्त रखी कि यदि वह पंचायत के आठों पंचों को अपनी पत्नी के साथ हमबिस्तर (सम्भोग) करने की इजाज़त दे देे तो उसका छः लाख रूपये का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा। इस फैसले का इन्कार करने पर उस दम्पति का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जायेगा। संज्ञान में आने पर पुलिस ने गैर सरकारी स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से बहिष्कार समाप्त करवा कर पंचायत को भंग करा दिया।
नगला टोटा गांव जिला बुलन्दशहर (उ॰प्र॰) की एक पंचायत ने एक दलित युवक को फांसी की सज़ा सुना दी और उसे अंजाम दे दिया गया। उस युवक पर अपने गांव की एक विवाहित महिला से अवैध सम्बन्ध रखने का आरोप था। महिला के पति की शिकायत पर पंचायत नेे ऐसा किया।
अमिरसा गांव जिला कौशाम्बी (उ॰प्र॰) की पंचायत ने एक 15 वर्षीय किशोरी को कथित प्रेम प्रसंग का आरोपी मानते हुए उसे परिवार सहित गांव बदर कर दिया गया। मामला यह था कि किशोरी पड़ोस के किशोर को साथ लेकर गांव छोड़कर कहीं अन्यत्र चली गयी। किशोर के घरवालों ने खोजकर मामला पंचायत के सुपुर्द कर दिया और किशोर को बेकसूर ठहराया गया। सारा जुर्म किशोरी का साबित हुआ।
थुरावड़ जिला राजसमुंद (राजस्थान) गांव के एक महिला को निर्वस्त्र कर उसके बाल काटकर गधे पर बैठाकर क्षेत्र में घुमाया गया। उस महिला पर रिश्ते के भतीजे की हत्या में शामिल होने का शक था।
चैपाइया पटटी गांव (ग्रेटर नोयडा) उ॰प्र॰ की पंचायत ने एक 8 वर्षीय बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले 15 वर्षीय किशोर को ग्यारह जूतों की सजा देकर मामला रफ़ा दफ़ा कर दिया।
भदोही जिले (उ॰प्र॰) की एक पंचायत ने एक नवविवाहिता की शादी इसलिए तुड़वादी कि वह खाना बनाते समय आटा ज्यादा गुथती थी। महिला के पति ने अपनी पत्नी को अन्न की बर्बादी के प्रति बहुत सचेत किया परन्तु पत्नी के कार्य में कोई सुधार नहीं आया तो पति ने पंचायत का सहारा लिया और मामला खत्म।
यह चन्द उदाहरण केवल घटनाऐं नहीं हैं बल्कि यह हमारी सामाजिक व्यवस्था का वह खतरनाक आईना है जो हमारी तुच्छ मानसिकता को दर्शाता है तथा सम्पूर्ण न्याय प्रणाली को यह एक खुली चुनौती है।
ऐसी तथाकथित पंचायतों को निश्चित रूप से सफेद पोशों का भी संरक्षण प्राप्त होता है। पुलिस तन्त्र की निष्क्रियता एक कारण है। हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि सड़क से संसद तक हम जिस प्रकार की राजनीति कर रहे हैं उससे आखिर किस प्रकार का समाज बन रहा है?
ऐसी जहमियत और इस प्रकार की राजनीति पर ‘आख़-थू’ है जो हैरान नहीं होती बल्कि उन्हें धर्म, वर्ग और समुदाय विशेष की परम्पराओं का हवाला देकर चैन की बंसी बजाने लगती है। आधी रात को देश द्रोहियों और आतंकवादियों  के लिए अपने घर के दरवाजे खोलने वाली न्याय व्यवस्था को इस प्रकार की अमानवीय और गैर कानूनी तथा तथाकथित पंचायतों की घिनौनी हरकतों को भी संज्ञान में लेना चाहिए।