विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (इक्तालीस)

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (इक्तालीस)

जड़े और वजूद

आबाद जाफ़री, नैनीताल-

अक्टूबर 2000 में राज्य गठन की सरगर्मियों के दरम्यान ‘‘एकता- दलित-अल्पसंख्यक-पिछड़ा कल्याण समिति’’ (नैनीताल) के कुछ सदस्यों ने अल्पसंख्यक फोरम के महामंत्री (स्वर्गीय) कमर इन्कलाबी के साथ मेेरे निवास पर आकर कुछ विशेष मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करते हुए मुझसे आग्रह किया कि मैं उनके विचारों को अपनी लेखनी और पत्र व्यवहार के माध्यम से सरकार को पहंुचाने में सहयोग करूँ। समस्त कार्यवाही के लिए मुझे अधिड्डत कर दिया गया। मैंने गहन अध्ययन के पश्चात सरकार के सम्मुख निम्न बिन्दु प्रस्तुत किये-
1. उत्तराखण्ड की तत्कालीन जनसंख्या में दलितों (अनु॰ जाति + अनु॰ जनजाति सहित) की संख्या लगभग 17,29,077 तथा अल्पसंख्यकों की संख्या लगभग 11,23,900 (कुल संख्या 28,52,977 है (थी)। यह कुल जनसंख्या का 33% था।
परिसीमन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी और विधान सभाओं के 70 स्थान प्रस्तावित थे जिनमें 15 स्थान दलितों तथा 8 स्थान अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक दृष्टि से आरक्षित होने चाहिए थे।
2. इसी प्रकार मौजूदा 6 सांसदों (5 लोकसभा तथा 1 राज्यसभा) को बढ़ाकर यह संख्या 8 होनी चाहिए थी। जिनमें 1 दलित तथा 1 अल्पसंख्यक प्रतिनिधि जरूरी था।
यह एक संवैधानिक मामला था और संसदीय व्यवस्थाओं से गुजरकर आगे बढ़ना था परन्तु बिना जनान्दोलन के यह एक मुश्किल भरा सफर था। मैंने संसद और निर्वाचन सदन को जनभावओं से अवगत कराना अपना कर्तव्य समझा। कई सांसदों और वरिष्ट नौकरशाहों ने भी दबी जबान से इसे उचित ठहराते हुए एक संवैधानिक प्रकरण बतलाया। मैंने समस्त पत्रव्यवहार और कार्यवाहियों से अपने मित्रों को व्यक्तिगत रूप से अवगत करा दिया। परन्तु उपरोक्त समिति के पदाधिकारी अपना अक्षमता और अयोग्यता के कारण इस प्रकरण को धार नहीं दे सके और मामला जस का तस रहा।
इसी बीच मई 2001 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त डाॅ॰ एम॰एस॰ गिल साहब नैनीताल पधारे। 18 मई 2001 को मैं उनसे तयशुदा मुलाकात के लिए 11:00 बजे राजभवन, नैनीताल गया। मैं खुद अपनी जात में एक अंजुमन हूँ इसलिए मुझे किसी जमाअत की जरूरत कभी नहीं पड़ती। राजभवन का हाॅल खचाखच मुलाकातियों से भरा हुआ था। विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि, सीनियर अधिवक्तागण तथा अनेक शिष्टमण्डल अपनी-अपनी बारी का इन्तेजार कर रहे थे। बहुत से लोग खड़े हुए थे। सामने बड़े सोफे पर गिल साहब बैठे हुए किसी सज्जन से बात कर रहे थे। मैं बिना रूके सीधा उनके सामने जाकर खड़ा हो गया और अपनी आदत और तरीके के मुताबिक उनका अभिवादन किया। उन्होंने मेरे अभिवादन के अंदाज पर मुस्कुराकर मुझे हाथ के इशारे से अपने बराबर बैठने को कहा। लोग मेरे इस दुस्साहस पर हैरान थे।
वह किसी की तरफ़ तवज्जो दिये बगैर मुझसे हम कलाम हो गये। मैंने अपने पूरा परिचय देते हुए पूर्व प्रेषित पत्रों पर उनका ध्यान आकर्षित किया। मामला उन्हें याद आ गया। उनकी मुस्कुराहट की तारीफ में मैंने उन्हें पाकिस्तानी शायर अहमद फराज का एक शेर सुनाया-
सुना है उसके लबों से गुलाब झड़ते हैं,
ये बात है, तो चलो, बात करे देखते हैं।
वह खिलखिलाकर हंस पड़े। लोग हम दोनों की गुफतगू देख रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि अहमद फराज से कभी मिले हो? मैंने बताया कि सरदार कुंवर सिंह बेदी ‘सहर’ के मार्ग दर्शन में मैं ने 1978 में बोट हाउस कल्ब, नैनीताल में अहमद फराग साहब का जश्न मनाया था जिसमें वह खुद शरीक हुए थे। कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ ने अहमद फराज से मेरा परिचय कराया था।
डाॅ॰ एम॰एस॰ गिल ने मुझे बताया कि लाहौर में वह अहमद फराज के सहपाठी रह चुके हैं और उन्हें अहमद फराज की दर्जनों गजलें और सैकड़ों शेर याद हैं। आप खुद एक शायर हैं और विश्व के अग्रिणी शायरों से परिचित हैं, यह खुशी की बात है। जब भी दिल्ली आना हो तो जरूर मिलें।
रिटायरमैन्ट के पश्चात वह यू॰पी॰ए॰ सरकार में राज्यमंत्री भी रहे। वह एक शानदार व्यक्तित्व और उदार हृदय के मालिक थे। कुछ दिन मेरा उनसे सम्पर्क रहा। आज भी कभी-कभी आला अफसरान से मिलने का मौका मिलता है मगर मायूसी मिलती है। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि शायद खुदा के यहां अब तहजीबें और इल्म के कद्रदान अच्छे और काबिल अफसरों को बनाने का सांचा खत्म हो गया है। तजरबों ने साबित कर दिया है कि वजूद तो है मगर जडं़े खत्म हो चुकी हैं। अच्छा! अब दो शेर सुन लीजिए-
सबकी बिगड़ी को बनाने निकले
यार हम-तुम भी, दिवाने निकले।
धूप है, रेत है, सेहरा है यहाँ
हम कहाँ प्यास बुझाने निकले।