विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (उनतीस)

वास्वतिक नेता की जय!
मैं पिछले दिनांे इस समाचार से हतप्रभ रह गया कि योराप के कई देशों के सांसद तथा वहाँ के प्रधामंत्री भी अक्सर मेट्रो से पार्लियामेंट जाते हैं। हमारे यहाँ का विधान सभा सदस्य भी काफिले के साथ चलता है और कई बार कुछ छुटभैय्ये नेता भी इस तरह का रौब दिखाते हैं और स्वयं को जनता का सेवक नहीं समझकर ‘खुदा’ समझते हैं। मैं सोच भी नहीं सकता था कि आजाद भारत के पैंसठ वर्ष पश्चात के माहौल में भी कोई प्रदेशमंत्री महोदय साधारण किसान की तरह जीवन यापन करते होंगे। आजादी से पहले की हमारी अन्तिरम संसद में अनेक सदस्य ऐसे थे जिनके आवास की कोई व्यवस्था सरकारी स्तर पर नहीं थी। वह स्वयं मन्दिरों, मस्जिदों और धर्मशालाओं में ठहरा करते थे। अब यह तो पुराना मामला है। आइये! उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के एक मंत्री का परिचय प्राप्त करें।
पंचायत सदस्य से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले बहराइच के बलहा क्षेत्र से विधायक बंशीधर बौð अत्यन्त मामूली किसान हैं। जिला बहराइच में कतर्निया घाट के घने जंगल के बीच बसे ग्राम चहलका के बंशीधर मूलतः बलिया जिले के निवासी हैं। 1970 में वह परिवार सहित यहां आये और खेती किसानी करने लगे। अति पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण उन्होंने लोगों की समस्याओं पर आवाज उठानी शुरू की तो लोग उनके समर्थन में आने लगे। सन 2000 में जिला पंचायत सदस्य बने और 2010 तक इस पद पर सेवा की। इसी दौरान बलड़ा विधानसभा की सदस्या सावित्री बाई फुले सांसद बन गयीं तो उप चुनाव हुआ। समाजवादी पार्टी ने उनकी सेवा, चाल और चरित्र को देखकर मैदान में उतार दिया। अपनी लोेकप्रियता के दम पर वह विधायक बन गये।
बंशीधर की रोजमर्रा की जिन्दगी हमेशा की तरह खेत की जुताई से शुरू होती है। खेत में कुछ घण्टे काम करने के बाद वह अपने खपरैल और छप्पर के मकान में आकर लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं। उनके पांच बेटे और तीन बेटियां हैं। दो छोटे लड़कों की शादी नहीं हुई है। बांकी सबका विवाह हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि बलहा विधान सभा क्षेत्र का एक हिस्सा नेपाल से जुड़ा है। दूसरी ओर 40 किमी तक वन क्षेत्र है जहां रात आठ बजे के बाद आवागमन संभव नहीं है। इसी क्षेत्र का कुछ भाग ऐसा है कि जिला मुख्यालय पहुंचने में दो दिन का समय लग जाता है।
उनकी दिनचर्या और रहन सहन तथा खान-पान आश्चर्यजनक है। ‘लोकतंत्र’ की जय! क्या ऐसे चरित्र के व्यक्ति को ही नेता कहना और मानना चाहिए? आप बताइये! बंशीधर बौð उत्तर प्रदेश में राज्यमंत्री हैं।
अन्नदाता सुखी भव!
लगातार देश छोड़, परदेश जाकर विशाल स्टेडियमों में प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित कर अपनी धाक जमाने वाले नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री शायद ही कभी मिले। उनके देशी अंदाज और लहजे की अपेक्षा विदेशों में उनके अंदाज, लहजे और भाषणों में जमीन आसमान का अन्तर है।
इसी वर्ष 2 मार्च 2015 को संसद के बजट सत्र के दौरान माननीय नरेन्द्र मोदी जी संसद भवन की कैंटीन में अचानक धमक गये। भोज्यावकाश के समय संसद भवन के प्रथम तल पर कमरा नं॰ 70 स्थित कैंटीन में उस समय 18 सांसद अलग-अलग टेबलों पर छोटे-छोटे समूहों में दोपहर का खाना खा रहे थे। तभी एक बजे नरेन्द्र मोदी वहां पहुंच गये। उन्होने सभी का अभिवादन स्वीकार किया और एक कुर्सी पर बैठ गये। कैंटीन के स्टाफ सहित सभी लोग हैरान थे। यह अप्रत्याशित था।
सबसे पहले उन्होंने वेटर से एक गिलास पानी मांगा। उसी समय कैंटीन प्रभारी बी॰एल॰ पुरोहित प्रधानमंत्री के पास पहुंच गये। उन्होंने पी॰एम॰ से कुछ ‘स्पेशल’ लाने की इजाजत मांगी? मगर मोदी ने उन्हें सामान्य शाकाहारी खाना लाने को कहा। ‘‘नहीं! मैं सामान्य शाकाहारी थाली ही लूंगा।’’ जो है, वहीं खिलाइये, अलग से इन्तेजाम की जरूरत नहीं है।
इसके बाद उन्होंने सलाद मांगा। उनकी थाली में सामान्य खाना अर्थात सरसों का साग, आलू की सब्जी, राजमा, चावल, तन्दूरी रोटी और दही परोसा गया। उनके खाने का कुल बिल 29 रूपये हुआ। वेटर रमाशंकर को उन्होंने एक सौ रूपया का नोट दिया और वेटर ने 71 रूपये उन्हें वापस कर दिये। मोदी ने बोतल बंद पानी के स्थान पर कैन्टीन के आर॰ओ॰ का पानी पीना पसंद किया। वह कुछ कर्मचारियों से भी मिले। कैन्टीन प्रभारी पुरोहित के अनुरोध पर सुझाव पुस्तिका में लिखा ‘‘अन्नदाता सुखी भव।’’
संसद के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी प्रधानमंत्री ने संसद कैंटीन में दोपहर का भोजन किया।
यू॰पी॰ में न्यायिक क्षेत्र में काम करना चुनौतीपूर्ण
नवम्बर के प्रथम सप्ताह में उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति डी॰वाई॰ चन्द्रचूड़ ने कहा कि यू॰पी॰ में न्यायिक क्षेत्र में काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण है परन्तु उन्होंने निकट भविष्य में सुधार आने की उम्मीद भी जताई। इसे कहते हैं ‘‘काम का काम है, अंगड़ाई की अंगड़ाई है।’’
चीफ जस्टिस राममनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में जलसे को सम्बोधित कर रहे थे। उनके अनुसार अगले एक वर्ष में हाईकोर्ट (उ॰प्र॰) का सारा रिकार्ड डिजिटल फारमेट में लाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 70 करोड़ पेजों को डिजिटल फार्म में लाना पड़ेगा। अभी न्यायिक कार्याें के लिए कागज पर हर साल करोड़ों रूपये खर्च होते हैं।
उ॰प्र॰ हाईकोर्ट के कई जज पेपर वर्क कम करने के लिए आई पैड का इस्तेमाल कर रहे हैं। न्यायिक सुधारों पर उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में केसों की पेंडेसी 11.5 लाख से घटकर नौ लाख पर आ गयी है। उन्होंने कहा कि 2017 तक जजों की संख्या लोअर कोर्ट में 2800 हो जायेगी। उन्होंने कहा कि अगले दशक में आपको ज्यूडिशरी मंे बड़े बदलाव दिखेंगे।