विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (एक)

आबाद जाफ़री, नैनीताल-

”पत्रकार“ एक ऐसी पदवी है जिसमें आचरण की पवित्रता, सत्यनिष्ठा, विश्वास और निष्पक्षता का समावेश होता है। दुर्भाग्य से अब इस ‘पदवी’ का आदर भाव समाप्त होता जा रहा है। किसी भी वस्तु के लाजिमी तत्वों में जब संक्रमण होता है तो वह अपनी विशेषताएं खोने लगती हैं। बाजारवाद ने पत्रकारिता को ‘नजरिया’ के स्थान पर लूट-खसोट का ‘जरिया’ बना दिया है। अध्ययनशील, योग्य और विद्वान होना अव्यवहारिक हो गया है। परन्तु अभी इस पेशे को मिशन बनाने वाले निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं और मेरा मानना है कि ऐसे लोगों के रहते पत्रकारिता की ‘मिशनरी-स्प्रिट’ नष्ट नहीं होगी।
दिल भर घूमते रहने से या भ्रमण करते रहने से समाचार प्राप्त नहीं होते। अनुभवी से अनुभवी पत्रकार समाचार प्राप्ति हेतु बिना क्रमबद्ध आयोजन के सफल नहीं हो सकता। समाचार पत्रों के स्थानीय केन्द्रों/कार्यालयों में स्वयं उपलब्ध कराये गये प्रेस नोटों, विज्ञप्तियों, वक्तव्यों, भाषणों तथा विभिन्न कार्यक्रमों/आयोजनों से सम्बन्धित पत्रों का ढेर लगा होता है। इनमें अधिकांश समाचार बनने के लायक नहीं होती और कुछ पर्याप्त सूचनाओं के अभाव में समाचार पत्रों में स्थान पाने से वंचित रह जाती हैं। योग्य और बाहुनर पत्रकार कभी-कभी इसी मसाले से बेहतर ‘माल’ तैयार कर लेता है। परन्तु अधिकांश पत्रकार अपरिपक्वता के कारण प्राप्त सामग्री को ‘कारआमद’ नहीं बना पाते। कतिपय पत्रकारों को समाचारों के स्रोत की जानकारी नहीं होती है। प्रायः तीन स्रोत मुख्य होते हैं-
प्रत्याशित, पूर्वानुमानित तथा अप्रत्याशित। प्रत्याशित समाचार का सम्बन्ध अधिकांशतः अपराध और पुलिस से होता है। इनके अतिरिक्त सरकारी/अर्धसरकारी संस्थानों की बैठकों, जनप्रतिनिधियों के सम्मेलनों, भेंटवार्ताओं, प्रेस कान्फ्रेंसों तथा सार्वजनिक समारोह भी इसी श्रेणी में आते हैं।
पूर्वानुमानित स्रोतों में स्वास्थ, सफाई, शिक्षा, बाजार, उद्योग, खाद्य वितरण आदि की व्यवस्थाओं से सम्बन्धित विश्लेषण तथा विवेचनाऐं सम्मिलित हैं।
अप्रत्याशित स्रोत समाचार परिस्थितियों के गर्भ में होते हैं। जैसे राजनीतिक घटनाक्रम से सम्बन्धित किसी राजनैतिक व्यक्ति का किसी अन्य राजनैतिक दल के उच्च पदाधिकारियों से गुप्त बैठक करना, सड़क से पुलिस या फौर्स के वाहनों का निरन्तर गुजरना या किसी एक दिशा में जाना, सरकारी इमारतों का बनते-बनते रूक जाना, योजनाएं आरम्भ होना और उनका अचानक सुस्त हो जाना। ऐसी अप्रत्याशित घटनायें जिनके गर्भ में बहुत कुछ छिपा होता है। यह एक कठिन कार्य है और बिना अनुभव, परिश्रम और ज्ञान के ऐसे समाचारों का संकलन/विश्लेषण एक कठिन कार्य है। लेकिन इसमें अच्छा और प्रभावी समाचार बनाने के समय तत्व मौजूद होते हैं।
मूल रूप में पत्रकारों की तीन श्रेणियाँ हैं- प्रथम कार्यालय संवाददाता, द्वितीय विशेष संवाददाता तथा तीसरे मुफस्सिल (विश्लेषण कर्ता) संवाददाता। प्रथम दो श्रेणियों के अन्दर लगभग 34 श्रेणियां हैं। जैसे किसी समाचार पत्र में 5 संवाददाता हैं तो उनके समाचार संकलन के विषय अलग-अलग निर्धारित होंगे।
पत्रकारिता बहुत नाजुक पेशा है। वर्तमान में यह पेशा अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रायः किसी छोटे-बड़े समाचार पत्र से सम्बद्ध हो जाना ही ‘पत्रकार’ बन जाना है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। विभिन्न विराधाभासों के चलते गरिमा प्रभावित हुई है। पक्षपात और संदेह दोनों पत्रकारिता के अदृश्य दुश्मन हैं, यही कारण है कि समाज में ‘पत्रकार’ होना नकारात्मकता परिचायक बनता जा रहा है। इस भावना को पवित्र और अक्षुण रखने के लिए योग्यता, ज्ञान के साथ-साथ समय-समय पर व्यवसायिक कार्यशालाओं की अत्यधिक आवश्यकता है परन्तु काॅर्पोरेट जगत ने पत्रकारिता को बन्धक बनाकर इस पेशे को ही संदेहास्पद बना कर रख दिया है। मापदण्ड निर्धारित किये बिना ही कोई राय बना लेना और अपनी राय या दृष्टिकोण से समाचार बनाना पारदर्शी पत्रकारिता के लिये हानिकारक होता है।
पत्रकारिता की पवित्रता, पारदर्शिता तथा उच्च मापदण्डों को बनाये रखने में समाचार पत्रों, छोटे तथा मझले संस्थानों का भरपूर योगदान है। इसी छोटे स्तर से क्षेत्रीय इकाईयों की उन्नति, राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त होता है और भावी योजनाओं के निर्माण में दिशा सुनिश्चित की जाती है। इसी लिए छोटे समाचार पत्रों तथा उनसे सम्बद्ध पत्रकारों का अत्यधिक महत्व है।
क्रमशः