विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (चैतीस) उत्तराखण्ड के विकास की एक झलक!

आबाद जाफ़री, नैनीताल-

पहाड़ी राज्यों में उत्तराखण्ड सबसे बड़ा और नया राज्य है। इससे पूर्व हिमाचल प्रदेश को 1950 में पहले केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया। उसके पश्चात् 25 जनवरी 1971 को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। वर्तमान में इसकी कुल आबादी 68 लाख है। मानव विकास की दर में यह सम्पूर्ण भारतवर्ष में तीसरे स्थान पर है। यहा साक्षरता 83 प्रतिशत है। मुख्य व्यवसाय पर्वतीय जलवायु के अनुसार हार्टिकल्चर है। हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डा. वाई0 एस0 परभाकर थे। एक बार मुझे डा0 यमुना दत्त वैश्णव अशोक ने बताया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री नियुक्त होने के पश्चात् अपने कुछ राजनीतिक मित्रों तथा आला अफसरों के साथ-साथ कर्मचारी संगठन प्रतिनिधियों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक आयोजित की थी। उन्होंने बैठक को बड़े जज्बाती अंदाज में सम्बोधित करते हुए नवगठित राज्य की आर्थिक स्थिति और भविष्य में विकास के स्वरूप (माॅडल) पर चर्चा करते हुए सुझाव रखा था कि अगले 6 माह तक कर्मचारी पूरा वेतन नहीं लेंगे और विकास के लिए दिन-रात मेहनत करेंगे। लोगों ने एक जुबान होकर उनकी बातों का समर्थन करते हुए विश्वास दिलाया था कि हम अपने राज्य को 6 माह में पूरी तरह खड़ा करके दम लेंगे। हुआ भी यही,हिमाचल वासियों ने कठिन परिश्रम करके हार्टिकल्चर को इतनी तेजी से विकसित किया कि हिमाचल अपने पैरों पर खड़ा हो गया और कुछ ही वर्षो में वह दौड़ने लगा। हम (उत्तराखण्ड वासी) ऐसा क्यों नहीं कर सके?अल्लाह ! जाने। उत्तराखण्ड राज्य को कायम हुए 15 वर्ष हो गये। एक पूरी नस्ल जवान हो गयी है। यह कोई कम समय नहीं है परन्तु दुर्भाग्य है कि हमने कभी खोया-पाया का पुनरावलोकन करने की कोशिश नहीं की। बस हुकूमत करने और शाही ठाठ-बाट को तरजीह देते रहे। देहरादून, नैनीताल, मसूरी, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को विकसित कर ऐशगाह बना दिया। दूसरी और पर्वतीय क्षेत्रों के सैकड़ों गाँव, पलायन के बाद अपना वजूद खो बैठे। बेरोजगारी के दानव ने हजारों योग्य और सक्षम युवकों की जिन्दगी बर्बाद कर दी। गरीब और संघर्षशील पहाडि़यों ने इसलिए राज्य मांगा था कि शायद हम आत्मनिर्भर हो जायेंगे और लखनऊ-दिल्ली से भीख लेने से बच जायेंगे। मगर यह क्या हुआ कि अपना पानी, खनिज, ऊर्जा और जंगल दान करके बिल्कुल कंगाल हो गये। हरीश रावत कहते हैं कि अगले चंद माह में कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लाले पड़ जायेंगे। सुबहानल्लाह!!
राज्य की मूल भावना के अनुरूप किसी भी महकमे की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। आला अफसर रोज नया शासनादेश जारी कर देते हंै। यह ऐसे ही है जैसे नेता रोजाना सफेद खद्दर के कपड़े बदलते हैं। नेता काबिल होते या शक्तिशाली होते तो आला अफसर की गुलामी करते हुए ‘यस सर’ नहीं कहते। वन नीति ऐसी कि तराई का जंगल विकास के नाम पर साफ हो गया।
खनिज नीति ऐसी कि दरिया में गायब हो गये। रोजगार नीति ऐसी कि सिडकुल में स्थानीय रोजगार गायब है। सड़क निर्माण नीति ”माशा-अल्लाह“! इधर सड़क बनी कि अगली बरसात में उधड गयी। शिक्षानीति का भी जवाब नहीं। स्कूल-काॅलेज और उच्च शिक्षण संस्थान खोल दिये। विश्वविद्यालयों की बाढ़ आ गयी, मगर शिक्षकों और योग्य फैकेल्टी का पूर्ण अभाव है। धरातल पर कहीं कोई विकास नहीं है।
बुनियादी शिक्षा बदहान है। मैने अपनी विभागीय कार्यशाला में सह-भागिता निभाते हुए एक आला अफसर से सर्वशिक्षा अभियान पर कुछ सवाल किये।
वैसे सर्वशिक्षा अभियान पर करोड़ों रूपये खर्च करने के पश्चात् भी अच्छे परिणाम सामने क्यों नहीं आ रहे हैं। शिक्षक रात-दिन सर्वशिक्षा अभियान की धनराशि खर्च करने के लिए चिंतित रहते हैं। वह चैंक पड़े कि एक मामूली अध्यापक की इतनी जुर्रत कि हमसे सवाल करे। फिर किसी ने उनके कान में कुछ कह दिया तो वह संभल गये, तेवर ढीले हो गये और बोले कि हम सरकारी निर्देशों से बंधे हैं। कमियां दूर करना सरकार का कार्य है। विदेश से शैक्षिक विकास की जो धनराशि डालरों में आती है, आला अफसर उसे भारतीय मुद्रा में गिनने लगते हैं। शर्त यह होती है कि मात्र 3 प्रतिशत धनराशि विदेशी सहायता नियमों के अन्तर्गत खर्च करें। शेष 97 प्रतिशत धनराशि खर्च करने के लिए आप स्वतन्त्र हैं। वहीं 97 प्रतिशत धनराशि शिक्षा के बेहतर परिणामों में बाधक है।
हमारे राज्य का साक्षरता प्रतिशत लगभग 72.28 है। इसमें पुरुष साक्षरता 84.01 प्रतिशत और महिला साक्षरता 60.25 प्रतिशत है। 12.70 प्रतिशत विद्यालयों में पीने के पानी का अभाव है। 12.15 प्रतिशत विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। (शिक्षक को काम आ गया तो विद्यालय ”रामभरोसे“)। 13 प्रतिशत विद्यालय शौचालय विहीन हैं। अधिकांश शौचालय जो आंकड़ों में दर्शाये जाते हैं, वह धरातल पर इस्तेमाल के लायक ही नहीं हंै। 85.75 प्रतिशत विद्यालय बिजली विहीन हैं। इसलिए नवीन तकनीकि शिक्षा का ख्वाब मध्यकालीन ही समझ लीजिये। 90.69 प्रतिशत विद्यालयों में कम्प्यूटर नहीं हैं। उक्त आंकड़े राष्ट्रीय शिक्षा योजना एवं प्रशासन नई दिल्ली (NUEPA) द्वारा वर्ष 2008 में प्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित हैं।
अलबत्ता इतना हुआ है कि आज पन्द्रह वर्षों के पश्चात् एक सैकड़ा नेता ”विकास पुरुष“ घोषित हो गये हंै। शायद इसे ही ’विकास’ कहते होंगे। अच्छा हां! अब हमारी संख्या एक करोड़ से ऊपर है।