विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (छत्तीस) ग्रैंड ओल्ड मैन आॅफ इण्डियन नैशनल्जि़्म

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (छत्तीस)
ग्रैंड ओल्ड मैन आॅफ इण्डियन नैशनल्जि़्म
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष के दो सौ वर्ष का इतिहास विभिन्न वर्गो, धर्मो, सम्प्रदायों और जातियों की कुर्बानियों से लबरेज है। जिन तथाकथित, राष्ट्रभक्तों का पूरा जीवन अंग्रेजों की चाटुकारिता और स्वार्थ सिद्धि में व्यतीत हुआ वह आज देश भक्ति के झण्डा बरदार बनाकर उभर रहे हैं और अपनी मर्जी से भारतीयता का प्रमाण पत्र बांट रहे हैं।
अल्पसंख्यक वर्ग से सम्बन्धित पारसी समुदाय ने भी अपनी आहुति देकर भारतमाता को आजाद कराने में अविस्मरणीय योगदान दिया है। ईरान- फारस में जन्मे पैगम्बर जरतुश्ल के मानने वाले पारसी बन्धुओं में आत्मसंयम, शान्ति और त्याग की भावनाऐं खूब हैं। इस समुदाय में आजादी के प्रति जागृति उत्पन्न करने और उन्हें सत्याग्रह तक लाने वाले दादा भाई नौरोजी का जन्म मुम्बई के पारसी परिवार में 4 सितम्बर 1825 को हुआ था। उनकी शिक्षा एलिथिन्सहन काॅलेज में हुई। बाद में इसी काॅलेज में गणित और नेचुरल फिलास्फी के प्रोफेसर हो गये। भारत के लिए स्वराज और स्वशासन की मांग करने वाले वह प्रथम भारतीय थे।
दादाभाई का मानना था कि स्वशासन के लिए यह आवश्यक है कि भारतीयों को ”सिविल सेवा परीक्षा“ में शामिल किये बिना स्वशासन के कोई मायने नहीं हैं। यह एक दूरगामी और प्रभावशाली रणनीति थी। इतिहासकार रिजवान कैसर का मानना है कि लिबरल पार्टी के सदस्य के रुप में उन्होंने भारत में सिविल सेवा परीक्षाऐं आयोजित कराने का प्रस्ताव भी पारित कराया था। 1886 में उन्होंने चुनाव लड़ा था परन्तु हार गये थे। उन्होंने अपने प्रयास जारी रखे क्योंकि जब तक ब्रिटिश संसद में पहुंच नहीं होगी उस समय तक बिना प्रस्ताव लाएं कानून बनाया जाना संभव नहीं होगा। अन्ततः लंदन के ‘सेन्ट्रल फिन्सवटी’ से लिबरल पार्टी के सदस्य के रूप में ब्रिटिश संसद के लिए निर्वाचित हुए। यह 1892 की घटना है।
इतिहासकार ए0 के0 गुप्ता का कहना है कि नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में थे। उनकी दूरदर्शिता और कौशल की वजह से ही उन्हें ”गै्रंड ओल्डमैन आॅफ इडि़या और ग्रैंड ओल्ड मैन आॅफ नैश्नल्ज्मि“ कहा जाता है।
नौरोजी द्वारा लिखित पुस्तक ”अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया“ में उन्होंने लिखा है कि अंग्रेजो ने जिस प्रकार अपने देश (इंग्लैण्ड) में शासन किया, यदि भारत में भी वह उसी प्रकार शासन करते तो भारत बदहाल नहीं होता।
दादाभाई का यह विचार निराधार नहीं था क्योंकि अंग्रेजी कम्पनी बहादुर ने जिस प्रकार भारतीय सम्पदा का दोहन किया और सल्तनत काल के हीरे-मोती-जवाहरात लन्दन भेजे गये साथ ही अपने उधोगों को कच्चा माल भेजने और उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हजारों वर्ग किमी. क्षेत्र नीम की खेती के लिए बंजर बना दिया वह हमारी तबाही की दास्तान की रौशन इबारत है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या क्या लुटा है तीरा-नसीबी के दौर में,
घर में कोई चिराग जले , तो पता चले!!
तीरा -नसीबी, बद-नसीबी को कहते हंै।