अवर्गिकृत

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (छीयालीस)

‘‘जन्नत’’ जल रही है
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
‘‘शहंशाह नूरूद्दीन मोहम्मद सलीम जहाँगीर’’ का एक शेर बहुत मशहूर हैः-
‘‘अगर फिरदौस बर-रूएजमीं, अस्त।
हमीं अस्त-ओ, हमीं-अस्तओे, हमीं-अस्त।’’
;अर्थातः यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं ;कश्मीर द्ध पर है, यहीं पर है, यहीं पर है।द्ध
इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीर जन्नत नजीर है। उसकी खूबसूरती बेअंदाजा है, उसकी खूबसूरती पर सैकड़ों स्तरीय लेख हैं। पुस्तकेें हैं और बेशुमार नज़्में हैं।
अब जन्नत नजीर कश्मीर पर बदरूहों का साया पड़ चुका है, उसकी खूबसूरती बदरौनक़ी का गिलाफ़ ;कवरद्ध ओढ़ चुकी है। कश्मीर जल रहा है। कश्मीरियत की विशेषताएंे समाप्त हो गयी हैं। राजनीति की दीवारें इतनी ऊँची हो चुकी हंै कि किसी को कुछ भी नजर नहीं आता। बेताललुकी के धुऐं की चादर तन गयी है। गोद मंे खिलाए हुए चेहरे अजनबी हो गये हैं। एक संगठित, दरियादिल, संवेदनशील और पारस्परिक सम्मान की भावनाओं से ओत-प्रोत समाज का तानाबाना इस कदर बिखर जायेगा, किसी को अंदाजा नहीं था।
छप्ज् की घटना को राजनीति के चश्मे से देखा जाये तो यह क्रिया-प्रतिक्रिया के बीच की स्थिति नजर आयेगी। विश्लेषण कुछ भी हो, वहां का सम्पूर्ण समाज बर्बाद हो चुका है।
कश्मीर का सबसे स्वर्णिम युग 15वीं शताब्दी में हुए राजा जैनुन अबिदीन का माना जाता है। वह एक आदर्शवादी और इंसाफ़ पसन्द शासक था। व्यक्तिगत खर्च के लिए सरकारी खजाने को छूना हराम समझता था।
अभी कल की बात है कि शायरे कश्मीर के नाम से विख्यात शायर गुलाम अहमद ‘महजूर’ की तूती बोलती थी। उसकी शायरी लोगोें के दिलों पर हकूमत करती थी। उसकी तमाम शायरी शान्ति और भाईचारे के संदेश से लबरेज है। जैसे-
;भावार्थद्ध ‘‘मुसलमान दूध हैं और हिन्दू चीनी हैं, इन्हें आपस में घुल जाने दीजिए। घृणा को त्यागिए और एक दूसरे को प्यार कीजिए।’’
कश्मीर के महानतम सूफी-संत नूरूद्दीन शेख को वहां के लोग ‘नन्द )षि के नाम से भी जानते हैं। उनकी लोगों से की गयी यह अपील-‘तलवार को तोड़कर हंसिया बना लो।’ आज भी प्रसंगिक है। यह केवल कश्मीर केे सन्दर्भ में ही नहीं अपितु यह आज के विश्व संदर्भ में भी उचित ही है।
कश्मीर के महानतम कवि जिन्होंने हजारों श्लोकों की रचना की है, ने अपने एक श्लोक में भी यही बात कही है-
शिव चुप थलि थलि रोज़ान
मो ज़न हिन्दू ता मुसलमान
त्रुक अय चुक पान पनुन परजानव
सोय चय साहिबस सत ज़ानिय ज़ान।
;शिव अथवा अल्लाह हर कहीं विद्यमान है। हिन्दुओं को मुसलमानों से अलग मत करो। अपने ज्ञान चक्षुओं को खोलो और अपने को पहचानो, ईश्वर प्राप्ति का यही सच्चा मार्ग है। द्ध
इस तरह के श्लोक कश्मीरी लोकगीत का ही एक अंग हैं, उसे कश्मीरी में ‘वाख्स’ कहा जाता है। मुसलमान उस विभूति को ‘लल्ला आरिफा’ के नाम से जानते हैं, हिन्दू उन्हें ‘लल्लेश्वरी’ के नाम से पुकारते हैं। आश्यर्च है 800 वर्ष गुजरने के बाद भी वह ‘कश्मीरियत’ की प्रतीक है।
कश्मीर की विरासत, आध्यात्म, सूफीइज़्म के जामे से निकलकर जब जुबान पर आती है तो ज़ुबान से खुशबू और लबों से गुलाब झड़ते हैं।
सम्पूर्ण भारत में कश्मीरी विरासत स्वयं में एक अदभुत उदाहरण है मगर जाहिलों ने उसे धर्म में बांट दिया है।
हम चालाक हो गये हैं। हमने कुछ खास नारे और नये शब्द गढ़े हैं। हमने आचरण बदल दिया है और एक दूसरे को चिढ़ाने के गुर सीख लिए हैं। बदजुबानी और बेलगामी जब इन्तेहा को पहुंचती है तो अंजाम खून-खराबे तथा आग और धुएं की शक्ल में होता है जैसा कि भारत की जन्नत में हो रहा है।
इस तबाही का इल्जाम किसके सिर जायेगा?