विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (तेईस) एक कुख्यात माँ की कुप्रतिष्ठित पुत्री

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
महाशक्तियों की साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के कारण कई राष्ट्रों को अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की कुर्बानी देनी पड़ रही है। वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पूंजीवाद और साम्यवाद के कारण महाशक्तियों द्वारा अपनी श्रेष्ठता सिð करने के संघर्ष से दो-चार हैं। रचनात्मक विरोध के स्थान पर ‘विरोध के लिए विरोध’ का सिद्धांत खुलेआम अपनाया जा रहा है। विश्व के कई राष्ट्र अभी तक संघ की सदस्यता से वंचित हैं। जिससे संघ सार्वदेशिक संगठन का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। संयुक्त राष्ट्रसंघ के चार्टर के अनुसार आत्मरक्षा के लिए युद्ध को वैधानिक माना गया है। परन्तु आत्मरक्षा और आक्रमण के बीच भेद स्पष्ट नहीं किया गया है और न ही ये परिभाषित है। चार्टर के अनुसार आक्रमण का अर्थ शक्ति के अवैधानिक प्रयोग से है परन्तु शक्ति का अवैधानिक प्रयोग क्या है, यह विवादास्पद है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की दोषपूर्ण कार्यविधि के कारण शीघ्रता से निर्णय नहीं होते। समय की बर्बादी के साथ-साथ समस्यायें भी जटिल हो जाती हैं। संघ के अस्तित्व में होने के बावजूद महाशक्तियों द्वारा स्वतन्त्र रूप से सैनिक संधियां किये जाना क्या मतलब रखता है? सीटो, नाटो, वार्षा तथा सेन्टो आदि संधियों में संघ का कोई रोल नहीं है। इससे संघ के सामुहिक सुरक्षा के सिद्धांत की कोई हैसियत बाकी नहीं रह जाती। महाशक्तियों ने संघ की महासभा और सुरक्षा परिषद् को अपने हितों के लिए एक प्रचार माध्यम बना कर रख दिया है।
इससे स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने तथा सर्वमान्य न्याय प्रणाली को स्थापित रखने में पूर्णतया असफल रहा है।
नोर्मन बैन्टविच (Norman Bentwich) छवतउंद ठमदजूपबीद्ध के शब्दों में महासभा और सुरक्षापरिषद का प्रयोग झगड़ों को सुलझाने के लिए नहीं अपितु, झगड़ों को बढ़ाने के लिए किया गया है।
इण्डियन्स आर नाॅट अलाउड
नैनीताल के पुराने बुजुर्गों और बाशिन्दों से मैंने सुना था कि लाट साहब की नगरी नैनीताल के माल रोड पर ‘हिन्दुस्तानियों और कुत्तों’ का प्रवेश वर्जित था। इतिहास में अन्य स्थानों का भी उल्लेख मिलता है। जहां कुत्तों के अलावा हिन्दुस्तानी नहीं जा सकते थे। मगर यह बीती बात है और उस दौर को तकरीबन 70 वर्ष का जमाना गुजर चुका है। भारत से अंग्रेज जा चुके हैं और सम्पूर्ण भारतवर्ष मंे कोई स्थान ऐसा नहीं है जहां उपरोक्त वर्जित, बेहूदा और अमानवीय परम्परा मौजूद हो। मेरे आश्चर्य की इन्तहा यहां पर खत्म हो गयी कि अभी भारत में एक स्थान ऐसा है जहां भारतवासी प्रवेश नहीं कर सकते। हम आजाद हैं। हमारा अपना संविधान है। हम सार्वभौमिक और सम्पूर्ण भू-भाग के स्वामी हैं। कहीं भी आने-जाने पर किसी भी व्यक्ति पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। सिवाय इसके कुछ विशेष श्रेणी के धार्मिक स्थल हैं जहां अन्य धर्म के लोगों का प्रवेश परम्परागत रूप से प्रतिबन्धित है। हम सहर्ष इन परम्पराओं का न केवल निर्वाहन करते हैं बल्कि उनका सम्मान भी करते हैं।
हमारे देश का एक खूबसूरत प्रान्त हिमाचल प्रदेश है। वहां ‘कसोल’ नाम सुदूरवर्ती खुबसूरत क्षेत्र है। क्षेत्र शानदार भांग और नशे की बूटियां उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। वहां एक रेस्टोरेन्ट ऐसा मौजूद है जहां हिन्दुस्तानी नहीं जा सकते। यह कैफे ‘इस्राईल’ के निवासी ने खोला है।
इस क्षेत्र विशेष में इस्राइली नौजवान लड़के-लड़कियां आते हैं। यह वह लोग हैं जो इस्राइल की फौज में कम्पलसरी आर्मी सर्विस के तहत 2 वर्ष की ट्रेनिंग लेते हैं और लगातार सरहद पर ड्यूटी देकर दो माह का अवकाश ग्रहण करते हैं। इस दो माह के अवकाश में इस्राइली नौजवान लड़के-लड़कियां यहां आते हैं ताकि खुलकर ‘इन्ज्वाय’ कर सकें। मौज-मस्ती करके अपनी थकान उतार सकें। सामान्यता भारतीयों को इसकी कम जानकारी है क्योंकि भारतीय पर्यटक अधिकतर शिमला, कोफरी और रोहतांग तक ही जाते हैं। कसोल में डालरों की भरमार के कारण भी भारतीय पर्यटक खर्च का सामना नहीं कर पाते और महंगा स्थल होने के कारण घबराते हैं।
इस स्थान का विवरण अचानक इसलिए सामने आ गया कि एक अंग्रेज संगीतकार मिस्टर स्टीफन वहां अपनी भारतीय पत्रकार मित्र के साथ घूमने गये। कैफे में भारतीय महिला को नजर अंदाज कर दिया गया और उसे खाने-पीने को कुछ नहीं दिया गया। कारण पूछने पर बताया गया कि इस रेस्टोरेंट में भारतीयों का प्रवेश वर्जित हैं एतराज करने पर कैफे का मालिक मरने-मारने पर उतारू हो गया।
क्षेत्र के स्थानीय निवासियों का कहना है कि जबसे यह रैस्टोरेन्ट खुला है यहाँ नग्नता, अश्लीलता और ट्रग्स का बोल-बाला है।