विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (तैतीस) मुमताज़ महल का ‘ताजमहल’

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली के विशाल पुस्तक संग्रहालय को 1972 में डाक्टर जाकिर हुसैन लाइब्रेरी के रूप में स्थापित किया गया। इस पुस्तकालय में कई लाख पुस्तकें हैं। इन्हीं में विभिन्न विषयों की 2000 फारसी भाषा की पाण्डुलिपियां हैं। प्राचीन साहित्य और हस्तलिखित प्राचीन पाण्डुलिपियों का अध्ययन मेरा विषय और लेखन का कार्यक्षेत्र है। अपनी इसी रूचि और दिलचस्पी ने मुझे एक अजीबो-गरीब पाण्डुलिपि तक पहुंचा दिया। इस पाण्डुलिपि (फारसी) का नाम ‘‘अहवाल मुमताज महल ताजमहल’’ है। डा॰ जाकिर हुसैन लाइब्रेरी नई दिल्ली में 90 पृष्ट की इस पाण्डुलिपि का क्रमांक सी-77 है। इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले और अनेक इतिहास लेखकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें लिखित जानकारी अन्य संदर्भ ग्रन्थों में भी उपलब्ध नहीं है।
इसका लेखक मिर्जा मुगल बेग निवासी कटरा आब्रेशम ताजगंज (आगरा) है। जिसने कड़ी मेहनत और शोध से इस पुस्तक को अगस्त 1879 (सोमवार) को पूरा किया।
लेखक के अनुसार मुमताज महल का जन्म 1000 ई॰ में हुआ। 21 वर्ष की आयु में 1021 ई॰ में उसका विवाह शाहजहां से हुआ और 1040 ई॰ में उसकी मृत्यु हो गयी।
‘शाहजहां’ के चार बेटे और चार बेटियां थी। उसके बड़े बेटे का नाम ‘दाराशिकोह’, दूसरे बेटे का नाम ‘शाहशुजा’ तीसरे बेटे का नाम ‘मुरादबख्श’ और चैथे बेटे का नाम ‘औरंगजेब आलमगीर’ था। अंजुमन आरा बेगम, गीतीआरा बेगम, जहां आरा बेगम तथा दहरआरा बेगम उसकी बेटियां थीं। चैथी बेटी की पैदाइश के वक्त मुमताज महल को अपनी मृत्यु का अहसास हो गया था। उसने शाहजहां को अपने पास बुलाकर बड़े दर्दनाक अंदाज में जो वसीयत की उसे सुनकर शाहजहां की आंखों से आसुओं की लगातार बारिश होने लगी। उसने शाहजहां को दूसरी शादी न करने और अपने नाम पर एक अद्भुत महल का निर्माण करने की वसीयत की। चुनांचे चैथी बेटी की पैदाइश पर मुमताज महल की मृत्यु हो गयी।
शाहजहां ने वसीयत के अनुसार ताजमहल का निर्माण कराया। इसमें लगने वाले पत्थरों के नाम इस प्रकार है: अक़ीक़ बगदाद और यमन से मंगाया गया फीरोजा, तिब्बत से (मूंगा) जाजवर्द, सुलैमानी, गौरी, संगे तिलाई, संगे मूसा, संगे ग्वालियार, संगे अम्बरी और संगे सुर्ख आवश्यकतानुसार जहां जहां से मगाया गया, पाण्डुलिपि में सबका उल्लेख है। हर पत्थर का साइज, वजन सब मौजूद है।
ताजमहल का आर्किटेक्ट उस्ताद ईसा था जो रोम का निवासी था। अमानत खां शीराजी ताजमहल पर लिखी गयी लिपि का डिजाइनर था। गुम्बद का निर्माण करने वाले कारीगरों का मुखिया इस्माईल खां था। मुहम्मद खां बगदादी सुलेखक था और राज-मिस्त्रियों का निरीक्षक मुहम्मद हनीफ़ था।
मेरे विचार में इतिहास के शोधकर्ताओं को इस पाण्डुलिपि तक पहुंचकर व्यापक शोध करना चाहिए मगर यह मुश्किल है क्योंकि हमारी तंगनजरी की दास्तान यहीं से शुरू होती है। भारत में कई लाख पाण्डुलिपियां हैं। जिन्हें शोध का विषय बनाया जा सकता है। मगर हमारे विश्वविद्यालयों के गुरूघंटाल आज भी शोध के नाम पर साहित्य में आधुनिक उपन्यासों, कहानियों और तथाकथित प्रगतिशील लेखकों के ‘लिट्रेचर’ को ही तरजीह देते हैं। इतिहास में भी ऐसा ही है। रामायण और गीता की कई सौ प्राचीन पाण्डुलिपियां अपनी ओर आकर्षित होने वाले शोधार्थियों के इन्तेजार में हैं।