विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (दस)

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
इसी दौरान जबलपुर (म0 प्र0) के अतिरिक्त जिलाधिकारी (ए0 डी0 एम0) ने एक मामले में यह फरमान जारी किया था ‘आपातकाल में जीने का अधिकार सुरक्षित नहीं रहता।’ इस प्रकरण के साथ-साथ राजनैतिक नजरबन्दियों के अनेक प्रकरण देश के 9 विभिन्न उच्च न्यायालयों में गये। सभी उच्च न्यायालयों ने लोकतन्त्र में नागरिक अधिकारों को छीनने के किसी भी आदेश को गैर कानूनी ठहराया और नजरबन्द किये गये लोगों की रिहाई के आदेश दिये।
1976 में सर्वोच्च न्यायालय के 5 जजों की बैंच ने एक जज को छोड़कर शेष 4 जजों ने उच्च न्यायालयों के पूर्व निर्णयों पर असहमति व्यक्त करते हुए ए0 डी0 एम0, जबलपुर के फरमान को एक प्रकार से सही ठहरा दिया। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आपातकाल को जायज ठहराने के निर्णय का आधार राष्ट्रपति का वही 27 जून 1975 का आदेश था जिसके अनुसार संविधान की धारा 226 के तहत नागरिक अधिकारों के हनन की कानूनी हैसियत को किसी भी न्यायालय में चेलेंज नहीं किया जा सकता था।
सर्वोच्च न्यायालय ने अटार्नी जनरल की इस दलील पर अपना सिर झुका दिया था कि ‘‘अपने उच्चाधिकारी के आदेश के तहत यदि किसी पुलिस अहलकार द्वारा किसी को गोली मारनी हो, यहां तक कि सुप्रिम कोर्ट के किसी जज को गिरफ्तार करना हो तो वह कानूनी होगा तथा गिरफ्तार व्यक्ति की राहत की कोई सूरत नहीं होगी।’
संवैधानिक अधिकारों के हनन का जो वाक्य तथाकथित ए0 डी0 एम0, जबलपुर से शुरू हुआ था वह सर्वोच्च अदालत के निर्णय पर समाप्त हुआ।
न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर सहितअनेक विधि विशेषज्ञ आज भी सर्वोच्च अदालत के तत्कालीन निर्णय की आलोचना करते हैं जिसमें नागरिक अधिकार सीज कर दिये गये थे। साथ ही शर्मनाक फैसलों की तुलना 1942 में इंग्लैण्ड के ‘‘लियोवर्सेस बनाम एण्डरसन’’ के मामले में हाउस आफ लार्डस के एक निर्णय पर अदालती-मुहर लगाने से की है। एक मात्र सदस्य लार्ड एटफिन की आलोचना को आगे चलकर समर्थन मिला। 1963 में लार्ड रेडकल्फ ने भी उस निर्णय को गुमराह फैसला ठहराया था। अन्ततः ब्रिटेन की अदालतों ने उक्त फैसले पर इतनी शर्म महसूस की कि सर्व सम्मति से उसे कूड़ेदान में डालने योग्य ठहरा दिया।
कई बार देखा गया है कि इस प्रकार के चापलूस महानुभावों के पौ बारह हो जाते हैं। या तो उन्हें राज्यपाल बना दिया जाता है या किसी आयोग अथवा किसी संवैधानिक संस्था का अध्यक्ष बना दिया जाता है। इस प्रकार के पुरूस्कार या उपकार हमारे लोकतन्त्र की विशेषता हैं। भला हम कोई ब्रिटेन हैं जो शर्म महसूस करें। रह गया सुकरात का मामला तो उसके हिस्से में जहर का प्याला ही आयेगा। चलते-चलते दुश्यंत कुमार का शेर सुन लीजिए-
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। क्रमशः