विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? - दो

पत्रकारिता....  एक नजरिया या जरिया? - दो
द्वेष रहित पत्रकारिता की सीमाऐ
आबाद जाफ़री, नैनीताल-

याशद बखैर !! (अच्छी याददाश्त का शुभसूचक शब्द वर्ष 1988 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में कुछ लोगों ने दिल्ली के पत्रकार राजनैतिक चापलूसों को बिना पेंदे का लोटा कहते हैं आपस में खिचड़ी पकाई कि प्रेस )पत्रकारिता को किसी विधेयक के माध्यम से कानूनी खूंटे से बांध दिया जाये और पत्रकारों के दहशत की नकेल डाल दी जाये। रातों रात विधेयक का ड्राफ्ट तैयार हुआ और राजीव गांधी के विदेशी दौरे से लौटने के बाद उसी दिन शिवशंकर, पी0 चिदम्बरम तथा सतीश शर्मा ने उनसे रात में 3 बजे दस्तखत करवा लिये। इसके मूल मेें बोर्फोस तथा पनडुब्बी दलाली कांड का घोटाला था। ‘राजीव गांधी खुश - दलाल चुस्त’ के तहत कुछ विशेष लोगों ने अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने का रास्ता ढूंढ़ लिया। इसी जहनियत के कई लोगों ने कुछ वर्ष पहले रामलीला ग्राउण्ड में बाबा रामदेव के आन्दोलन को नेस्तो-नाबूद करने के लिए जनरल डायर की शैली अपनायी थी जो चंद रोज में सामने आ गई। उस समय कुछ चाटुकार चाहते थे कि ‘काला कानून’ बनाकर पत्रकारों को ‘खोजी पत्रकारिता’ से दूर कर दिया जाये।
समाचार पत्र हमारे विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है। संयोग से या दुर्भाग्य से वह अर्थ व्यवस्था के उस क्षेत्र के हाथ में है  जो गैर सरकारी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। आज भी विधान मण्डलों की कार्यवाहियों को प्रभावित करना संभवतः सबसे जोखिम का काम है क्योंकि जरा सी चूक होने से दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार की कार्यवाहियों का मार्ग खुला हुआ है।
हमारे देश में विकसित राष्ट्रों की भांति अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है। मगर इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि इस स्वतंत्रता का फायदा उठाकर किसी का बखिया उधेड़ कर उल्टी सिलाई कर दी जाये।
फ्रांस जैसे देश में जहां सिविल विधि प्रणाली महत्वपूर्ण है  प्रतिवादी को पीनल पनिश्मेंट देने की प्रक्रिया अमल में लायी जाती है। इग्लैण्ड, अमेरिका, आस्टेªलिया तथा भारत जैसे देशों में रांग्ला-सेकशन प्रक्रिया के तहत हर्जाने का प्राविधान मौजूद है। इग्लैंड में अपराधिकवाद चलाने का भी प्राविधान है।
यह एक विचित्र तथा हास्यास्पद स्थिति है तथा विडम्बना भी कि पत्रकारिता से जुड़े तथा लोकहित कर्ता भी आज तक अभिव्यक्ति की लक्ष्मण रेखा पार करने अथवा कोई संतुलित कानूनी व्यवस्था के उद्देश्य निर्धारित करने में असमर्थ रहे हैं। एक ओर पत्रकारिता के हवाले से कुछ भी लिख देना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों, नेताओं और लोकहितकारियों का विशेषाधिकार है जो सजा देने की पूरी ताकत रखता है। एक फाड़ने में माहिर है, दूसरा लताड़ने में सक्षम है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1) में प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। उच्चतम न्यायालय ने भी इस बात में कोई संदेह नहीं रखा है कि उक्त उपबन्ध में प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है परन्तु अनुच्छेद 19(2) में अंकुश भी है। यही कारण है कि भारत सहित विश्व के लगभग 50 राष्ट्रों ने अभिव्यक्ति/प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु ‘प्रेस काउन्सिलें’ बना रखी हैं परन्तु यह सभी एक सीमा तक ही हैं। निश्चित संतुलन बनाये रखने की दिशा में यह जरूरी है कि उन लोगों की शक्तियों पर नियंत्रण रखा जाये जो स्वयं मीडिया पर नियंत्रण रखते हैं।
पत्रकारिता के सम्बन्ध में आज भी कोई निश्चित मापदण्ड नहीं हैं। हमारी प्रेस काउन्सिल निन्दा कर सकती है। डांट-डपट कर सकती है, चेतावनी दे सकती है और सरकार के आचरण के बारे में अपने निर्णयों में टिप्पणी कर सकती है। इसके आगे कुछ नहीं।
सरकार को कोई मार्ग अवश्य खोजना चाहिए और साथ ही ऐसी पत्रकारिता जो द्वेष और भेद-भाव से प्रेरित होती है और जिसमें अपराधिक आशय प्रतिबिम्बित होता है या सिद्ध हो जाता है, का भी समाधान ढूँढ़ना होगा अन्यथा बिना अनुशासन और लक्ष्मण रेखा के पत्रकारिता के नाम पर शोषण करने वाले भी होंगे और शोषित भी।
क्रमशः