विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (पन्द्रह) सरहद के इधर-उधर का जश्ने - आज़ादी

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
अंग्रेजों ने अपनी नीति-रीति से उपमहाद्वीप में एक लकीर खींचकर दो-भाग बना दिये थे। यह लकीर कब तलवार के रूप में परिवर्तित हो गयी, आम लोगों को पता ही नहीं चला और जब बारूदी धमाकों ने जगाया तो बहुत देर हो चुकी थी। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के नाम से दुनिया की एक बड़ी हवेली दो भागों में विभाजित हो गयी थी। एक ही खानदान, एक ही जबान, एक ही संस्कृति, एक से रस्मो-रिवाज और रोटी-बेटी के रिश्ते सब कुछ तार-तार हो चुके थे। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे किसी विधवा की आहें और सिसकियाँ शमशानों में गूँज रही हों। दो फाड़ करने वाले और ताजे-शाही पहनकर लाशों पर अट्टहास करने वाले फना हो चुके हैं। मगर नस्लों को नफ़रतों का ऐसा तबाहकुन तोहफा दे गये हैं जिसका जहर कभी खत्म नहीं होगा। नफ़रत और संदेह का यह मांसाहारी डायनासोर अब तक लाखों बेगुनाहों का खून पी चुका है।
मैं जब अपने वतन के प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल का विद्यार्थी था तो अपने स्वतंत्रता दिवस के जोश में तीन रोज पहले से झण्डा बनाना शुरू करता था। उस जमाने में रेडीमेड प्लास्टिक झण्डे वगैरह नहीं होते थे। पतंगी कागज की रंग बिरंगी बेल कैंची से तैयार करके साफ सुथरी लकड़ी पर चिपका दी जाती थी। लकड़ी के चूल्हे पर घुऐंदार लकड़ी जलाकर आटे या मैदा की लेई बनायी जाती थी। पूर्व संध्या पर मेरे मित्र ओम प्रकाश, तफसीर और हरिबाबू मेरे घर आ जाते थे और हम सब बैठक में मिट्टी के तेल की रौशनी में हाथों से खूबसूरत तिरंगा बनाते थे। सुबह को स्कूली बच्चों का जोश देखने लायक होता था। आज भी जब याद आती है तो जश्ने-आजादी के जोश में खून गर्म हो जाता है।
स्वत ंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ा तो पता चला कि कपड़े के जिस तिरंगे झण्डे के हथियार से उपमहाद्वीप को फिरंगियों से आजादी मिली थी, हमने उसे भी बांट लिया। पाकिस्तान को कभी नहीं भूलना चाहिए कि तिरंगे की शान बरकरार रखने के लिए उसकी सरज़मी पर सिन्धी, बलौची और पख़तून पठानों ने अपना खून बहा दिया था। बदनसीबी से आज उसके झण्डे की शक्ल दूसरी है।
मेरे एक पत्रकार मित्र ने कई वर्ष पूर्व पाकिस्तान से लौटकर एक बार बतलाया था कि पाकिस्तानी तीन बड़े त्यौहार बड़े जोश से मनाते हैं। ईदुल फितर, ईदुल-जुहा और पाकिस्तान का जश्ने आजादी (पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।)।
वहाँ के स्वतंत्रता दिवस की तैयारी पर प्रत्येक बच्चे पर लगभग तीन हजार रूपये खर्च आता है जो अभिभावक उठाते हैं। नये कपडे़ सिलवाये जाते हैं। अगस्त का महीना शुरू होते ही झण्डे, बैनर, पोस्टर, टी-शर्ट, बैज, आजादी से सम्बन्धित गानों-गीतों के कैसेट, इलेक्ट्रोनिक झालरंे, गाडि़यों पर लगाने के लिए स्टिकर आदि हर जगह मिल जाते हैं। हर सड़क को झण्डों से सजा दिया जाता है। नौजवान पाकिस्तानी झण्डे की टी-शर्ट पहनकर सैर-सपाटा करते हैं। दावतें होती हैं, चहल-पहल होती है। (दुर्भाग्य से हमारे यहाँ विशेषकर पर्वतीय क्षेत्र में दावत का अर्थ शराब है।)
मेरे मित्र जब यह सब बयान कर रहे थे तो मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे वतन में अब वह जोश क्यों नहीं है? न हमारी सड़कें सजती हैं। न हमारे नये कपड़े बनते हैं और न हम इसे त्यौहार की तरह जोशों-खरोश से मनाते हैं। हमारी विशेषता यह है कि हम इसे त्यौहार के स्थान पर बोझ और बोरिंग दिवस समझते हैं। स्वतन्त्रता दिवस को झण्डा रोहण में शरीक होना अपनी तौहीन समझते हैं। नौकरी पेशा मजबूरी में दफ्तर जाते हैं। हमारे यहाँ शराब की दुकानें बन्द रहती हैं मगर पिछले दरवाजे से आम दिनों की अपेक्षा ज्यादा शराब बिकती है। हमारे यहाँ जश्ने आजादी की आम सभायें नहीं होतीं। शहीद स्मारक पर जाना गुनाह समझा जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर कोई संस्था ‘जश्ने आजादी’ का कोई कार्यक्रम नहीं करती। (हमारी गैर सरकारी संस्थाऐं, देशी-विदेशी चन्दा बटोरने के लिए बनती हैं।) नई-नस्ल अपने स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की दास्तान को सुनना पसन्द नहीं करती। मोटर साइकिलों पर लड़कों के पीछे स्किन टाइट जींस और खुले गले के टाॅप पहनकर कमसिन लड़कियाँ चिपककर मौजमस्ती करते हैं। जंगलों की तरफ निकल जाते हैं और तन्हाइयाँ ढूंढ़ते हैं।
कराची की सड़कों पर तीन चीजंे नजर नहीं आयंेगी-
(1) सड़कों पर पेशाब करता हुआ व्यक्ति। (2) मोटर साइकिल पर लड़कोें के साथ चिपकी लड़कियाँ और (3) वह इस्लाम, जिसकी बुनियाद पर पाकिस्तान बना था।
अच्छा चलो, छोड़ो। आबाद जाफरी एहसानमन्द रहेगा अगर तुम अपने गांव, शहर या बस्ती के आस-पास किसी शहीद स्मारक पर जाकर दो मिनट का मौन धारण कर सलाम कर लिया करो। जय-हिन्द।